डॉ० मुकेश कुमार : व्यक्तित्व और कृतित्व

किसी भी रचनाकार के साहित्य अनुशीलन से पहले उसके व्यक्तिगत जीवन, स्वभाव, युग विशेष, वातावरण परिवेश आदि पर दृष्टि डालना आवश्यक है। क्‍योंकि इन्हीं से उसका व्यक्तित्व विकसित होता है। लेखक की कुछ व्यक्तिगत विशेषताएँ भी उसके साहित्य को समझने में सहयोगी होती है। अपने साहित्य के लिए वह इसी युग और समाज से सामग्री ग्रहण करता है, किन्तु अपनी कृतियों में अपने व्यक्तित्व की थोड़ी बहुत छाप जरूर छोड़ जाता है,और जो उसे अमर बना देती है।

पश्चिम के विद्वान और विचारक भारत को दार्शनिकों का देश कहते हैं। प्राचीन काल से ही इसी देश में अनेक ऋषिमुनि सन्त, भक्त, साधक, विद्वान, कवि और साहित्यकार उत्पन्न हुए है। जिनके चरित्र व साहित्य का अध्ययन करके अपने जीवन में धारण किया जाता है। उनके साहित्य, चरित्र का प्रभाव डॉ0 मुकेश कुमार जी के व्यक्तित्व पर झलकता दिखाई देता है।

डॉ0 मुकेश कुमार का जन्म कृषक परिवार में हुआ। आपका विशेष लगाव संत समाज से है, अतः इसी कारण से आपके जीवन, व्यक्तित्व, कृतित्व पर सत्संगति और साधु समाज का सर्वाधिक प्रभाव दिखाई देता है।

डॉ0 मुकेश कुमार की प्रारम्भिक शिक्षा ननिहाल में गाँव प्योंत के राजकीय माध्यमिक विद्यालय में हुई। यह बालक बाल्यावस्था से अब तक पढ़ने-लिखने में रूचि रखता है और अपनी माता व शिक्षकों का आज्ञाकारी है।उच्च शिक्षा (पीएच0डी0) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से प्राप्त की।

डॉ0 मुकेश कुमार जी का जन्म हरियाणा प्रदेश के जिला करनाल के प्योंत गाँव में 26 सितम्बर सन्‌ 1988 ई0 उनके ननिहाल में माता मुरती देवी के गर्भ से हुआ। प्रमाण पत्र में इनकी जन्म तिथि 05 मई सन्‌ 1988 है। उनका पैतृक गाँव हथलाना है। जो कि करनाल जिले में पड़ता है। आपके पिता स्व0 चौधरी कर्ण सिंह जी एक किसान थे। जो अपना जीवन सादगी में व्यतीत करते थे। आपकी वंशावली इस प्रकार  है-

 

 

 डॉ० मुकेश कुमार जी बड़े सद्‌गृहस्थी हैं इनका विवाह श्रीमती शीतल रानी कमोदा जिला- कुरुक्षेत्र निवासी स्व0 चौधरी बलबीर सिंह की सुपुत्री के साथ 7 नवम्बर सन्‌ 2012 ई में हुआ। इनका गृहस्थ जीवन बहुत ही सुखमय और सफल है। धर्मपत्नी श्रीमती शीतल रानी जी का स्वभाव सरल, सहज एवं सादगी सा है। वह बहुत सादगी में अपना जीवनयापन करती है। पहली सनन्‍्तान कन्या हुई थी जो एक सप्ताह के बाद परलोक चल बसी। दूसरी सनन्‍्तान पुत्र रूप में प्राप्त हुई जिसका जन्म 4 मई, सन्‌ 2016 ई मेंहुआ। उसका नाम अविश चौधरी है। जो कि नटखट व होनहार है।

किसी भी व्यक्ति के दो रूप होते हैं- बाहरी व्यक्तित्व और आन्तरिक व्यक्तित्व। इसी आधार पर डॉ० मुकेश कुमार जी के व्यक्तित्व के दोनों रूप प्रस्तुत है

सरल स्वभाव और विनम्रता

डॉ0 मुकेश कुमार जी सरलता और विनम्रता के आकार स्वरूप हैं। उनमें कुटीलता और बनावटीपन थोड़ा सा भी नहीं है। आधुनिक युग में देखा जाता है कि व्यक्ति की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अन्तर होता है। उनके व्यक्तित्व में इस प्रकार का दोहरापन बिल्कुल नहीं है। चाहे विद्यार्थी हो या उनका साथी एवं सहकर्मी हो। वे सब के साथ निश्छल व्यवहार करते हैं। वह कभी झूठे आश्वासनों में विश्वास नहीं करते, जो कार्य संभव है, व्यावहारिक है, उसको स्वीकृति प्रदान कर देते हैं। जो कार्य वश से बाहर है और अव्यवहारिक है उसको स्वीकृति प्रदान नहीं करते हैं। वे अहंकार को व्यक्ति की सबसे बड़ी कमी मानते हैं। घर और बाहर उनका व्यवहार एक समान रहता है।

मिलनसार एवं व्यवहार कुशल

आप कोरे एकांतवासी नहीं है। सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के बीच में रहना आपको अच्छा लगता है। बिना किसी भेदभाव और पक्षपात रहित होकर छोटे-बड़े, निर्धन-धनी, सुशिक्षित व अशिक्षित, विद्यार्थी व अध्यापक, किसान और मजदूर सबके साथ मिलते हैं। वह व्यक्तियों को परस्पर जोड़ते हैं।मन के वैरभाव को दूर करवाते हैं। वे ‘जियो और जीने दो’ की नीति में विश्वास करते हैं जो उनके मिलनसार स्वभाव के अनुकूल है।डॉ0 मुकेश कुमार जी किताबों को अपनी सच्ची मित्र मानते हैं। वे कहते हैं कि जिनके पास किताबे हैं वे सबसे अमीर है। विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के साथ बड़े सरल व सहज भाव से वार्तालाप करते हैं। उनके भाव व विचार बहुत ईमानदारी का प्रतीक है।

लोक व्यवहार में ऐसा कहा जाता है कि रचनाकार और शिक्षक विद्या व्यसनी होते हैं। यह उक्ति आपके व्यक्तित्व पर खरी उतरती है। विद्यारूपी व्यसन के कारण ही आपको विश्वविद्यालयों की उच्चतम उपलब्धियाँ प्राप्त हुई है। उनका मानना है कि “ज्ञान का कोई भी अन्त नहीं है, मानव जीवन पर्यन्त सीखना रहता है। एक आदर्श शिक्षक हमेशा विद्यार्थी बनकर ही रहता है।”

आप निरन्तर नई-नई पुस्तकें खरीदते हैं और उनको पढ़ते भी हैं। आप निरन्तर अध्ययनशील रहते हैं। साहित्य की अनेक विधाओं पर अध्ययन करके लेखन कार्य भी करते रहते हैं। हर वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला प्रगति मैदान दिल्‍ली में आयोजित होता है वहाँ का भ्रमण करते हैं और काफी पुस्तकें हिन्दी-साहित्य की खरीदते हैं। उस समय आपका मन बड़ा प्रसन्नतादायक होता है।

आप एक अच्छे शिक्षण के साथ एक अच्छे वक्ता भी हैं। आप विद्यालय एवं महाविद्यालय, यूनिवर्सिटी के शिक्षण कार्य से जुड़े हुए हैं। एक विद्यार्थी एवं शोधार्थी के शोध कार्य में काफी मार्गदर्शन भी देते हैं। विद्या निरन्तर अभ्यास से प्राप्त होती है और एक अच्छा शिक्षक लगातार विद्या प्राप्त करने का अभ्यास करता है। यही गुण आप में विद्यमान है।

बड़ों के आज्ञाकारी- आपका व्यक्तित्व सरल स्वभाव के कारण छोटों से प्रेम व बड़ों का सदैव आदर करता है। आप हमेशा सदैव अपने आप को अनुशासन में ही रखते हैं। आज्ञा का पालन आपके स्वभाव में विद्यमान है।

भारतीय संस्कृति के उपासक– आप हमेशा भारतीय संस्कृति में जीवन यापन करते हैं और विश्वास भी करते हैं। भारतीय संस्कृति की विशेषता “वसुधैव कुटुम्बकम्‌’ उसका आदर्श है। आप वेद, उपनिषद्‌, पुराण, रामायण, गीता, अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुयायी है। आप संस्कृत-हिन्दी साहित्य के पुजारी हैं।

ओजस्वी वक्ता– आपका जन्म ग्रामीण परिवेश व प्रकृति की गोद में हुआ। संत परम्परा के वचनों व उनकी वाणी का अध्ययन करके आपकी भाषा मधुर एवं पवित्र है। जब आप व्याख्यान देते हैं तो बड़ी ओजस्वी वाणी में अपने विचारप्रस्तुत करते हैं।

यात्रा-प्रेमी एवं उदारमना– आप यात्रा के बहुत प्रेमी है, साहित्यिक यात्रा आपको आनंद प्रदान करती है। प्रकृति की जहाँ सुंदर छटा विद्यमान हो वहा आप अधिक यात्रा करना पसंद करते हैं। राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनों और संगोष्ठियों में आप हमेशा भाग लेते हैं। धार्मिक स्थान पर बहुत खुश होकर यात्रा करते हुए भी आप उस ‘सरस्वती माँ’ का धन्यवाद कहना नहीं भुलते।

 राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रेमी- डॉ0 मुकेश कुमार जी हिन्दी भाषा के प्रेमी हैं। आप हिन्दी भाषा के प्रचार व प्रसार में लगे रहते हैं। आपका मानना है कि हिन्दी विश्व बाजार की भाषा बनने के कारण संसार के अन्य देशों में भी विकसित हो रही है।

एक राष्ट्र भाषा हिन्दी हो, एक हृदय हो भारत जननी।

प्रकृति अन्य प्राणियों से प्रेम— आप प्रकृति के साथ-साथ अन्य प्राणियों से भी गहरा प्रेम करते हैं। उनको भी आप एक परिवार का हिस्सा मानते हैं।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी– आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। आप एक शिक्षक, साहित्यकार एवं शोध निर्देश भी हैं। आपकी रूचि साहित्य की अनेक विधाओं में है– जैसे कविता, कहानी, नाटक, एकांकी उपन्यास, आलोचना,पत्र-पत्रिकाएँ आदि। आप विभिन्न साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सहर्ष से भाग लेते हैं।

डॉ0 मुकेश कुमार जी का व्यक्तित्व बहुमुखी है इसलिए कृतित्व भी बहुआयामी है। आपने साहित्य की अनेक विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। जैसे – आलोचनात्मक साहित्य, सम्पादित साहित्य, सृजनात्मक, साहित्य आदि।

आलोचनात्मक साहित्य— आपने आलोचनात्मक साहित्य का सृजन बहुत ही सुंदर ढंग से किया है। वर्ष (2019) में ‘अज्ञेय की प्रयोगधर्मिता’ का सृजन किया जिसमें अज्ञेय के काव्य में जो नए-नए प्रयोग हुए है। उन सब पर विस्तारपूर्वक लिखा है। दूसरी पुस्तक- “चमत्कार एकांकी संग्रह” : संवेदना और शिल्प (वर्ष 2019) में प्रकाशित हुई। जिसमें “चमत्कार एकांकी संग्रह” पर अपनी लेखनी चाहिए। उसमें नारी जीवन, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-झरनें, तालाब, गुरुशिष्य परम्परा, भ्रष्टाचार आदि का संवेदनात्मक ढंग से वर्णन किया है ओर भारतीय संस्कृति को उजागर किया। तीसरी पुस्तक- खड़ी बोली हिन्दी के उन्नायक महाकवि हरिऔध (वर्ष 2020) में प्रकाशित हुई। जिसमें अयोध्या सिंहउपाध्याय “हरिऔध’ का जीवनवृत्त व उनके साहित्य के अनेक बिन्दुओं का विश्लेषण किया है।

सम्पादित साहित्य— डॉ0 मुकेश कुमार जी ने अनेक पुस्तकों का सम्पादन किया। जिसमें ‘हिंदी कविता : राष्ट्रीय चेतना एवं संस्कृति (वर्ष 2018) में प्रकाशित हुई। इसमें आदिकालीन हिन्दी कविता से आधुनिक हिन्दी कविता पर अनेक साहित्य प्रेमियों के शोध आलेख प्रकाशित हैं। यह पुस्तक बहुत उपयोगी है। इस पुस्तक का एक वर्ष में दूसरा संस्करण भी निकल चुका है। दूसरी पुस्तक– “लोक भाषाओं में रामकाव्य’ (वर्ष 2019) में प्रकाशित हुई इसमें रामकाव्य पर आधारित शोध आलेख प्रकाशित हैं। आपका सम्पादन एक सफलतापूर्वक सम्पादन रहा है।

 सृजनात्मक साहित्य— आपकी लेखनी सृजनात्मक साहित्य पर भी विद्यमान है। कहानी संग्रह व नाटक संग्रह आदि का लेखन कार्य हो रहा हैं। प्रकाशित आलेख एवं शोध पत्र- आपके अनेक आलेख शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी व कार्यशाला– आप ने अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में अपने शोध पत्रों का वाचन किया और अनेक कार्यशालाओं में भाग लिया।

 

देश विदेश की अनेक संस्थाओं से आपके अनेक सम्मान व उपाधियाँ मिल चुकी है। हरियाणा सरकार द्वारा हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला ने पहली बार (राज्य पाठक शिरोमणि” पुरस्कार की योजना लागू की। जिसमें आपको ‘राज्य स्तरीय पाठक शिरोमणि पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। आप अज्ञेय की इन पंक्तियों को जीवन में धारण करते हुए आगे बढ़ते हैं-

उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में यही अकेला ओछा तिनका

उषा जाग उठी प्राची में- कैसी बाट, भरोसा किन का।

शक्ति रहे तेरे हाथों में छुट न जाय यह चाह सृजन की,

शक्ति रहे तेरे हाथों में रुक न जाय यह गति जीवन की,

कॉप न, यद्यपि दसों दिशा में तुझे शून्य नभ हेर रहा है,

रूक न, यदपि उपहास जगत्‌ का तुझ को पथ से हेर रहा है,

तू मिट्टी था, किन्तु आज मिट्टी को तूने बाँध लिया है,

तू था सृष्टि, किन्तु स्रष्टा का गुर तूने पहचान लिया है।

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पुरस्कार एवं उपाधि

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कुछ यादगार लम्हे