अज्ञेय के काय्य में प्रयोगधर्मिता -डाॅ. मुकेश कुमार

आधुनिक कविता के जन्मदाता अज्ञेय जी का पूरा नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय’ है। हिन्दी की काव्यधारा में अज्ञेगय जी एक ऐसे विलक्षण और विदग्ध रचनाकार हैं जिन्होंने भारतीय भाषा और साहित्य को भारतीय आधुनिकता और प्रयोगधर्मिता से सम्पन्न किया है। कवि अज्ञेय जी ने काव्य में नए-नए प्रयोग किये। नये प्रतीक, बिम्ब, भाषा-शैली आदि उन्होंने राजभाषा से हटकर लोकभाषा को समाज के सामने रखा। अज्ञेय ने साहित्य सृजन में मानव की आन्तरिक पीड़ा को समझा | अज्ञेय जी ने रचनाकार को राहों का अन्वेषी कहा है। वे कहते हैं नयी राह खोजना ही रचनाकार का दायित्व है। “अज्ञेय जी उन महान भारतीय रचनाकारों में से एक हैं जिन्होंने बीसवीं शताब्दी में भारतीय संस्कृति, भारतीय परम्परा, भारतीय आधुनिकता के साथ साहित्य कला, संस्कृति, भाषा की बुनियादी समस्याओं, चिन्ताओं, प्रश्नाकुलताओं से प्रबद्ध पाठकों का साक्षात्कार कराया है। व्यक्ति की खोज, अस्मिता की तलाश, प्रयोग-प्रगति परम्परा, आधुनिकता, बौद्धिकता, आत्म सजगता, कवि कर्म में जटिल संवेदना की चुनौती, रागात्मक सम्बन्ध गों में बदलाव की चेतना, रूढ़ि और मौलिकता, आधुनिक संवेदना और सम्प्रेषण की समस्या, रचनाकार का दायित्व, नयी राहों की खोज, पश्चिम से खुला संवाद, औपनिवेशिक आधुनिकता के स्थान पर देशी आधुनिकता का आग्रह, नवीन कथ्य और भाषा-शिल्प की गहन चेतना, संस्कृति और सर्जनात्मकता आदि तमाम सरोकारों को अज्ञेय जी किसी न किसी स्तर पर रचना कार्य को केन्द्र में लाते रहे।*

महाकवि अज्ञेय जी ने काव्य में प्रयोग करके नयी अवधारणा को प्रस्तुत किया। उन्होंने व्यक्ति और समाज के रिश्ते को नयी अवधारणा में व्यक्त किया | कवि ने नदी और द्वीप को प्रतीकात्मक बनाकर नयी अवधारणा दी | नदी को विशाल समाज के रूप में प्रयुक्त किया द्वीप को अपनी अस्मिता के व्यक्ति के रूप में |

“हम नदी के द्वीप हैं,

हम नहीं कहते कि हम को छोड़कर स्त्रोत किनी दहज                         

वह हमें आकार देती है।

हमारे कोल, गलियां, अनरीय उभार, सैकल कूल,

माँ है वह है इसी से हम बने हैं

किन्तु हम हैं द्वीप

हम धारा नहीं हैं

स्थिर समर्पण हैं हमारा हम सदा से द्वीप हैं स्त्रोतस्विनी के

किन्तु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहता रेत होना है,

हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं

पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। बहेंगे। सहेंगे बह जायेंगे ||”

अज्ञेय जी ने ‘सांप विषैलेपन का प्राचीन प्रतीक है। कवि ने सांप का प्रयोग महानगर की वर्तमान धोखाधड़ी और समाज और विहीन मूल्य का जो परिवेश चारों तरफ हो रहा है उसका वर्णन किया है।

“सांप।

तुम सभ्य तो हुए नहीं

नगर में बसना

भी तुम्हें नहीं आया

एकबात पूछ (उत्तर दोगे?)

तब कैसे सीखा डसना

विषय कहाँ पाया?”

अज्ञेय जी प्रकृति के रागात्मक कवि माने जाते हैं। उन्हें प्रकृति से बहुत प्यार था। वे प्रकृति को अनेक रूपों में देखते हैं। जैसे समुद्र और ज्योत्सना माघ, फाल्गुन, चैत्र, सावन, क्वार, भादों, फल वचनार आदि जो कविताएँ हैं उनमें प्रकृति का प्रेम है। उन्होंने सहज प्रतीकों में ‘दो ओस बूँद’ (नयन), ‘प्यार’ (गगन), ‘नदी’ (दद्र की रेखा), झरता पत्ता (नश्वरता हेतु), ‘द्वीप’ (दीपक), ‘अहेरी’ आदि प्रतीकों का प्रयोग किया। वह प्रतीकों में स्वप्न, यौन आदि मिथकीय प्रतीकों का प्रयोग करते हैं।

 “ओ विशाल तरू

शत-सहस्त्र पललवन-पतझरों ने

जिस नित रूप सँवारा,

कितनी बरसातों, कितने खद्योतों ने आरती उतारी

दिन भौरे कर गए गुंजरित

रात में झिल्ली ने

अनथक मंगल-गान सुनाए

सांझ-सवेरे अनगिन

अने चीन्हें खग-कुल की मोदभरी क्रीडाकाकीस

डाली-डाली को कँपा गई

ओ दीर्घकाय

ओ पूरे झारखण्ड के अग्रता

तात, सखा, गुरु, आश्रय

त्रया, महच्छाय,

ओ व्याकुल मुखरित वन ध्वनियों के

वृन्दावन के मूर्त-सा

मैं तुझे सुनूँ

देखेँ ध्याऊँ

अनिमेष स्तब्ध, संयत, संयुक्त निवाक्‌ |”

अज्ञेय जी “नदी’ और ६्वीप’ के प्रतीक के जरिये यह स्पष्ट कर देता है कि भले ही समाज व्यक्ति को आकार देता है, उसे गढ़ता है लेकिन फिर भी व्यक्ति व्यक्ति नहीं है, उनकी अपनी एक इयत्ता होती है उसे नकारा नहीं जा सकता। व्यक्ति अपनी पहचान खोकर समाज के लिए सार्थक नहीं हो सकता।

जैसे द्वीप का आकार नदी ही गढ़ती है। लेकिन द्वीप नदी में रेत होकर सार्थक नहीं हो सकता।

“यह वह विश्वास नहीं, जो अपनी लघूुता में भी कांपा

वह पीड़ा जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,

कुत्सा, अपमान, अवजा के धुधुआते कड़बे तम में

यह सादा द्रवित, चिर जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,

उल्लम्ब-बाहु यह चिर अखण्ड अपनाया |”

प्रयोगधर्मी कवि अज्ञेय जी की कविताओं में प्राकृतिक, ग्रामीण, पौराणिक, वैज्ञानिक लोक विश्वासों एवं उस युगीन परिवेश और जटिलताओं के विविध प्रतीक उपलब्ध हुए हैं। उन्होंने सागर और मछली का निम्न प्रयोग किया।

हमारा ज्ञान जहाँ तक जाता है-

“जो अर्थ हमें बतलाया है

वह सागर में नहीं

हमारी मछली में है

जिसे सभी दिशा में

सागर घेर रहा है।।”

अज्ञेय की कविताओं में ‘तारा’ कई स्थानों पर आता है। क्योंकि यह पहले भी अज्ञेय की कविता से पूर्व खूब मिलता है| अज्ञेय की कविता में यहतारा प्रकृति का प्रतीक ही नहीं है। यह तारा व्यक्ति की सम्पूर्णता, उसकी इयत्ताऔर अस्मिता का भी प्रतीक है-

“उगा तारा

मैंने देखा नहीं कि कब

बुझ गया

लाल आलोक सूर्य का। पर जब देखा

देखा नहीं

कि पेड़ों चट्टानों में उलझी

हारी हुई |”

अतः अज्ञेय जी ने अपने काव्य में विभिन्‍न प्रयोग किये क्‍योंकि प्रयोग तो पहले ही काव्य में हुए हैं लेकिन अज्ञेय जी ने पुरानी परम्परा को त्यागकर काव्य में नये-नये प्रयोग किये। जैसे भाषा, छन्द, प्रतीक, बिंब आदि | वह छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता के समन्वित संस्कारों से तो प्रेरित रहे परन्तु प्रयोगधर्मिता से ओत-प्रोत रचनाकार भी है।

संदर्भ :-

  1. सम्पा. कृष्णदत्त पालीवाल, अज्ञेय रचनावली (पूर्वा) पृद्दठ 254
  2. वही, इन्द्रधनुष रौंदे हुए थे, पृष्ठ 253
  3. तारासप्तक, पृष्ठ 285
  4. बावरा अहेरी, पृष्ठ 254-55
  5. कितनी नावों में कितनी बार, पृष्ठ 455
  6. महावृक्ष के नीचे, पृष्ठ 432

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