अज्ञेय के काव्य में वात्सल्य भावना -डाॅ. मुकेश कुमार

आधुनिक कविता के जनक प्रयोगवादी कवि अज्ञेय जी ने अपनी कविताओं में माँ की ममता, बालक की हठ, भविष्य में उन्नति, भावुकता, चंचलता, माँ की करूणा, बालक का भगवान जैसा रूप, माँ के प्रति सेवा भावना आदि का वर्णन करके समाज में युवा वर्ग को उजागर करने की प्रेरणा दी है।

प्रयोगवाद के प्रवर्त्तक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय का जन्म 7 मार्च 1911 ई. में हुआ है। वे प्रयोगवादी कवि हैं। उन्होंने तारसप्तक का सम्पादन किया। वे महान रचनाकार थे।

वात्सल्य का अर्थ-माता-पिता के हृदय में होने वाला अपने बच्चे के प्रति नैसर्गिक प्रेम | बच्चों के प्रति स्नेह और लाड प्यार का अर्थ वात्सल्य से सम्बन्धित है। मनुष्य जीवन के प्रारम्भ होते ही रिश्तों के बंधन बनने लगते हैं। सबसे पहले बीजरूप बनते ही माता-पिता से सम्बन्ध बन जाता है और इसके बाद भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी आदि से बन्धन जुड़ते हैं। महाकवि सूरदास वात्सल्य रस के पुरोधा माने जाते हैं। उन्होंने कहा है-

“यशोदा हरि पालने झुलावै

हलरावै दुलराई मंगावै जोई सोई कछु गावै

यशोदा हरि पालने झुलावै |॥”

प्रयोगवादी कवि अज्ञेय ने अपने काव्य में बच्चे और माँ के समझौते का खुलकर वर्णन किया | इसमें माता की ममता सी लगती है। इस प्रकार पाठक को यह कविता अपने ऊपर घटित सी लगती है। इसी प्रकार कवि ने अपने शब्दों में कहा है-

“माँ हम नहीं मानते

अगली दीवाली पर मेले से

हम वह गाने वाला, टीन का लटूदू

लेंगे ही लेंगे –

नहीं हम नहीं जानते –

हम कुछ नहीं सुनेंगे।

कल गुड़ियों का मेला है, माँ

मुझे एक दो पैसे वाली

कागज की फिरकी तो ले देना,

तुम दो पैसे दे देना।

 अच्छा, माँ, मुझे खाली मिट्टी दे दो-

मैं कुछ नहीं मांगूगा

मेले जाने की हठ नहीं ठानूँगा

जो कहोगी मानूंगा |”

माँ और बच्चे के बीच हठ का बहुत सुंदर चित्रण अज्ञेय जी ने किया है। बच्चे का हठ खिलौने से आरम्भ होता है परन्तु माँ की असमर्थता ही शायद बच्चे को विवश कर रही है | जब माता से उसके प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता तो वह अन्त में मिट्टी की ही मांग करता है। यहाँ पर कवि ने बच्चे की हठ को इन पंक्तियों में दर्शाया है। लेकिन वह हठ भी माता के प्रेम को दर्शाती है।

इसी प्रकार नन्‍्हें बुलबुल की लुभावनी अदाएं कवि को मुग्ध कर देती हैं और वह उसके साथ एक नया सम्बन्ध बना लेता है। इस प्रकार कवि कहता है कि –

“अनार कच्चा था

पर बुलबुल भी शायद बच्चा था

रोज फिर-फिर आता,

टुक! टुक! दो चार चोंच मार जाता।

..- तेरे साथ ओ बच्चा बुलबुल

एक नये सम्बन्ध में बहता है।*

प्रयोगवादी कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय बालक पर अनावश्यक निषेध लगाने का विरोध करते हैं| परन्तु वह बालक को प्रात: काल के सूर्य की भांति लाल देखना चाहता है। पे कहते हैं कि मा-बाप बच्चे को दबाकर रखते हैं जिससे बालक की आशा व्यर्थ होती है। अगर बालक को दबाव बनाकर नहीं रखा जाए तो वह भविष्य में उन्‍नति के शिखर पर पहुँच सकता है। इसी प्रकार कवि कहता है-

“तरूण अरूण तो नवल प्रात में दिखलाई पड़ता लाल-

इसीलिए मध्याह में अवनि को झुलसाती उसकी ज्वाला।

मानव किन्तु तरूण शिशु को ही दबना-झुकना सिखला कर |

आशा करते हैं कि युवक का ऊंचा उठा रहेगा भाल |।”*

प्रयोगवादी कवि अज्ञेय ने बाल-सुलभ भावुकता, चंचलता को गहनता से परखा है। सदा प्रसन्‍न व हंसती हुई अस्वस्थ बालिका के प्रति अपने मनोदगारों को बड़ी भावुकता से प्रकट करते हैं –

“सीखा है तारे ने उमंगना जैसे धूप ने विकसना

हरी घास ने पैरों में लोट-पोट विछलना-विलसना

और तुम ने पगली बिटिया-हंसना, हंसना, हंसना,

सीखा है मेरे भी मन में उमसना, मेरी आँखों ने बरसना,

और मेरी भावना ने

आशीर्वाद के सुवास सा तुम्हारे आस-पास बसना।।”

बालक की सुंदरता को देखकर माँ की निःस्वार्थ ममता उजागर होती है। वह अपने बालक को देखकर माँ की ममता में डूब जाती है। ममतामयी माता की करूणा वाली तस्वीर देखकर कवि के मस्तिष्क स्पष्ट हो उठती है जिसकी आँखों में नीर बहता है और आंचल में युग्ध धारा। क्योंकि माँ की ममता स्वाभाविक तो होती ही है-

“मरू बोला, हाय यह हास्यास्पद ममता

झुलसेंगे, पाले से मरेंगे तुम्हारे पात-पात अंकुर

तब कैसा दर्द होगा।

मेरी मुझ अचंचल को देखो मेरी यह सीख है,

ममता ही सर्व दुःख मूल है

बीज मात्र वेदना का बीज है।।”

बच्चा भगवान का रूप होता है| उसे जाति, वर्ण-व्यवस्था आदि का कोई ज्ञान नहीं होता। कवि उस बालक की तुलना भगवान गोपाल से करनेलगता है-

“भैंस की पीठ पर

चार-पांच बच्चे

बोले गोपाल से

भगवान जैसे सच्चे

भैंस पर सवार

चार पांच बच्चे

उतरे जमीन पर

एक हुआ कोइरी

एक मुइंहारा

एक ठाकुर, एक कायथ, पांचवां चमार ||”

हमें माता-पिता की सेवा करनी चाहिए क्योंकि माँ की ममता वास्तव में बच्चों का ऋण है जिससे कभी उऋण नहीं हुआ जा सकता। परन्तु बच्चे माँ के उपकारों को स्मरण करते हैं और माँ की महिमा का गुणगान किया जाता है। क्योंकि इसकी ममता को कभी भुलाया नहीं जा सकता-

“माँ एक बार की जननी

और आजीवन ममता है

पर उनकी कल्पना, कृपा और करूणा से

हममें यह क्षमता है

कि अपनी व्यथा और अपने संघर्ष में

अपने को अनुक्षण जानते चलें

अनुक्षण अपने को परिक्रान्त करते हुए

अपनी नयी नियति बनाते चलें |॥*

सारांश रूप में कहा जा सकता है कि अज्ञेय के काव्य में वात्सल्य भावना का विस्तृत वर्णन तो नहीं मिलता परन्तु कहीं-कहीं माता की ममता और प्रेम दिखाई देता है। इसी प्रकार कवि ने अपनी रचनाओं में एक नया दृष्टिकोण उजागर किया है। क्योंकि अज्ञेय की कविताओं में वात्सल्य की भावना एक नया कार्य हुआ है परन्तु कहीं-कहीं थोड़ा बहुत वात्सल्य का चित्रण मिलता है।

संदर्भ –

  1. महाकवि सूरदास, सूरसागर, पृष्ठ 433
  2. सम्पा. कृष्णदत्त पालीवाल, अज्ञेय रचनावली, पृष्ठ 406
  3. वही, कच्चा अनार बच्चा बुलबुल, पृष्ठ 488
  4. वही, द चाइल्ड इडा द फादर ऑफ द मैन, पृष्ठ 439
  5. एक रोगिणी बालिका के प्रति, पृष्ठ 269
  6. मरू और खेत, पृष्ठ 267
  7. भैंस की पीठ पर, पृष्ठ 355
  8. पक्षधर, पृष्ठ 458

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