अज्ञेय के काव्य सर्जना : परम्परागत प्रतीकों का नया प्रयोग-डाॅ. मुकेश कुमार

तार सप्तक के जन्मदाता अज्ञेय ने अपनी कविता में प्रतीकों के स्तर पर भी अपनी परम्परा के साथ प्रयोग किये हैं| उन्होंने परम्परागत प्रतीकों का प्रयोग नये संदर्भों में किया है। जिससे पुराने प्रतीक नये-भाव बोध को व्यक्त करने में सफल हुए हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अज्ञेय ने पारम्परिक प्रतीकों का सर्जनात्मक प्रयोग किया है।

इस विषय में यहां यह बताना हम आवश्यक समझते हैं कि अज्ञेय ने परम्परागत प्रतीकों का प्रयोग रूढ़ ढंग से नहीं किया बल्कि उन्होंने पुराने प्रतीकों में निहित अवधारणा या चिन्तन को आधुनिकता की कसौटी पर कसकर देखा है। पुराने प्रतीकों में निहित चिंतन को प्रयोग के जरिये जांचा-परखा है, तब उन प्रतीकों का प्रयोग किया है बल्कि कई बार तो अज्ञेय ने अपनी कविता में भी इस बात का खुलासा किया है। जैसे ‘क्रौंच’ पक्षी का प्रयोग कविता में प्रेम और वियोग के रूप में किया है क्योंकि आदि कवि वाल्मीकि ने ‘क्रौंच वध को एक खास संदर्भ में स्थापित कर दिया था लिहाजा ‘क्रौंच’ मर्माहित बिछोह का प्रतीक बन गया। अज्ञेय ने पहली बार इस संदर्भ को तोड़ा और कहा-

“क्रॉंच बैठा हो कभी वाल्मीकि पर

तो मत समझ

वह अनुस्टुप बांचता है संगिनी के सारण के

जान ले, वह दीमकों की टोह में है।”

अज्ञेय जी ने नदी के इस परम्परागत प्रतीक का प्रयोग अपनी नई अवधारणा को व्यक्त करने के लिए किया है। व्यक्ति और समाज के आधुनिक रिश्ते की अवधारणा को व्यक्त करने के लिए अज्ञेय ने ‘नदी’ और ‘्वीप’ के परम्परागत प्रतीक को लिया बल्कि कहना चाहिए कि इस परम्परागत प्रतीक के साथ प्रयोग किया और अपनी नई अवघारणा को अभिव्यक्ति दी। नदी को उन्होंने विशाल समाज के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया और द्वीप को अपनी अस्मिता के परिपूर्ण व्यक्ति के रूप में। इस अवधारणा को लेकर उनकी यह कविता प्रस्तुत है-

हम नदी के द्वीप हैं,

हम नहीं कहते कि हम को छोड़कर स्त्रोतस्विनी बह जाए।

वह हमें आकार देती है।

हमारे कोण, गलियां, अन्तरीय, उभार, सैकत कूल,

सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह। है, इसी से हम बने हैं।

किन्तु हम हैं द्वीप।

हम धारा नहीं है।

स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप है स्त्रोतस्विनी के।

किन्तु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहता रेत होना है,

हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।

पैर उखड़ेंगे | प्लवन होगा बहेंगे | सहेंगे बह जायेंगे ||”

अज्ञेय नदी और द्वीप के प्रतीक के जरिये स्पष्ट करते हैं कि बेशक समाज व्यक्ति को आकार देता है, उसे गढ़ता है लेकिन फिर भी व्यक्ति व्यक्ति है, उनकी अपनी एक इयत्ता है जिसे नकारा नहीं जा सकता। वह सम्पूर्ण होकर अपनी इयत्ता बरकरार रखकर ही समाज के लिए समर्थक हो सकता है। व्यक्ति अपनी पहचान खोकर समाज के लिए सार्थक नहीं हो सकता। जैसे द्वीप का आकार नदी ही गढ़ती है लेकिनन द्वीप नदी में रेत होकर सार्थक नहीं हो सकते यहां हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अज्ञेय नदी और द्वीप को प्रतीक के रूप में ही प्रयोग करते हैं, रूढ़ि के रूप में नहीं | प्रतीक और रूढ़ि का विवेक अज्ञेय को सदैव बना रहता है।

असल में अज्ञेय प्रतीक का मात्र विधान ही नहीं करते बल्कि वह उसका अन्त तक निर्वाह करना जानते हैं। परम्परागत प्रतीकों में ‘दीपक’ भी एक ऐसा ही प्रतीक है जिसका हिन्दी काव्य परम्परा में भरपूर प्रयोग हुआ है। अज्ञेय ने ‘द्वीप’ का प्रयोग आधुनिक संदर्भ में करके उसे एक नया अर्थ भी प्रदान किया है। जिस प्रकार “नदी’ और ‘द्वीप’ व्यक्ति और समाज की चेतना को परिभाषित करते हैं उसी प्रकार अज्ञेय की कविता में ‘द्वीप’ भी व्यक्ति की इयत्ता और पहचान का प्रतीक बनकर आता है | उनकी कविता में इससे महसूस किया जा सकता है-

यह द्वीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर

इसको भी पंक्ति को दे दो।

यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघूुता में भी कांपा,

वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा

कुत्सा, अपमान, अवजा के धुधुआते कड़वे तम में

यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,

उल्लम्ब-बाहु यह चिर–अखण्ड अपनाया।

जिज्ञासु, प्रबद्ध, सदा श्रद्दामय

इसको भक्ति को दे दो :

यह द्वीप अकेला, स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर

इसको भी पंक्ति को दे दो।”

इसी प्रकार से ‘सांप’ विषैलेपन का प्राचीन प्रतीक है। प्राचीन कविता और लोकोक्तियों में चहुं और इसका प्रयोग हम देख सकते हैं लेकिन अज्ञेय ने ‘सांप’ का प्रयोग नितान्त समसामयिक संदर्भ में किया जिससे महानगर की वर्तमान धोखाघड़ी और मूल्य विहीन जिन्दगी और उसका परिवेश उजागरहो उठा है-

सांप!

तुम सभ्य तो हुए नहीं

नगर में बसना

भी तुम्हें नहीं आया।

एकबात पूंछ.-(उत्तर दोगे?)

तब कैसे सीखा डसना

विषय कहां पाया?

अज्ञेय जी ने पहली बार आकाश’ को आकाश मानने से इंकार कर दिया, उसे उन्होंने मात्र रूपहीन आलोक ही माना। इससे ‘आकाश’ की पुरानी अवधारणा टूट गई और एक नया वैज्ञानिक तथ्य कविता के जरिए उद्घाटित हुआ | इससे पहले की काव्य परम्परा में इस वैज्ञानिक तथ्य से हम अवगत नहीं हो पाते हैं। इसी तरह एक अन्य कविता में ‘द्वीप: और ‘आकाश’ के प्रतीकों का विचारों की आधुनिक कश-म-कश के रूप में प्रयोग किया गया-

मेरा विचार है द्वीप

मेरा प्यार? वह आकाश है।

वे नहीं देते उसे आलोक

वह भी स्नेह उन को नहीं देता।

अलग दोनों की इयत्ता है।

किन्तु उनकी ओट ही

गहराइयां उसकी झलकती हैं

और उसके सामने सत्य उनका रूप

दिखता है विशद

सहसा अनिर्वचनीय!

मेरा प्यार? वह आकाश है।

‘वृक्ष’,, ‘महावृक्ष भी अज्ञेय की कविता में ऐसे प्रतीक हैं जिनका प्रयोग हिन्दी यह अन्य भारतीय भाषाओं की कविता में अत्यधिक मिलता है। अज्ञेय ने इन प्राचीन प्रतीकों को अपने चिन्तन में अभिव्यक्ति देने के लिए प्रयोग किया है और यह प्रयोग उनकी कविता में अनेक जगह मिलता है। उनकी कविता में, महावृक्ष, पेड़ रूख परम्परा की विशालता और उसके विकास के प्रतीक के रूप में आते हैं। जिस प्रकार महावृक्ष में से शाखाएँ, कोंपलें, फूल और फल निकलकर नित नवीनता को धारण करते हैं उसी प्रकार परम्परा विकास की प्रक्रिया में विभिन्‍न प्रकार के परिवर्तन में से गुजरती है| इस परम्परा के साथ व्यक्ति का क्‍या संबंध है-यह अज्ञेय वृक्ष, रूख के रूप में प्रतीक से व्यक्त करते हैं। अज्ञेगय की कविता ‘महावृक्ष के नीचे’ में यह देखा जा सकता है-

जंगल में चले हों?

चलो, चलते रहो?

महारूख के साथ अपना नाता बदलते रहो।

उसका आयाम

उसका है बहुत बड़ा है।

पर वह वहाँ खड़ा है।

और तुम चलते हो, चलते हुए भी भले हो |*

अज्ञेय जी ने ‘महारूख’ विशाल को जातिगत अनुभव का प्रतीक माना है। लेकिन इस जातिगत अनुभव यानी परम्परा का जड़ होकर अनुकरण नहीं करना चाहिए | देश, काल, परिस्थिति के अनुसार परम्परा का दोहन करना चाहिए। परम्परा के महारूख के साथ अपना नाता बदलते रहो। क्योंकि वह विशाल जातिगत अनुभव वहां खड़ा है और तुम चलते हो, चलते हुए भी भले हो। “यह महारूख’ अज्ञेय की परम्परा की अवधारणा को व्यक्त करने वाला प्रमुख प्रतीक है जो परम्परा और आधुनिकता के चिन्तन को नये संदर्भ में व्यक्त करता है। यह कहना अनुचित न होगा कि परम्परा और आधुनिकता स्वीकार के स्तर पर अधुनातन मुद्दे हैं जिनमें आज का व्यक्ति सीधे टकरा रहा है | यह एक नया सवाल है जिसे अज्ञेय ने अपनी कविता में बार-बार उठाया है-

ओ विशालतरू!

शत-सहस्त्र पललवन-पतझरों से जिसका निज रूप संवारा,

कितनी बरसातों, कितने खद्योतो ने आरती उतारी,

दिन भौरे कर गये गुंजरित,

रातों में झिल्ली ने

अनथक मंगल- गान सुनाये,

सांझ-सवेरे अनगिन

अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा काकली

डाली-डाली को कंपा गयी-

ओ दीर्घकाय!

ओ पूरे झारखण्ड के अग्रज

तात, सखा, गुरू, आश्रय,

त्राता, महच्छाय,

ओ व्याकुल मुखरित वन ध्वनियों के

वन्दगान के मूर्त रूप

में तुझे सुनूँ

देखूँ, ध्यान

अनिमेष, स्तम्ब संयत, संयुत निर्वाक्‌

कहाँ साहस पाऊं,

छू सक्‌ तुझे।”

अज्ञेय जी की चेतना में परम्परा का प्रवाह प्रवाहित हो रहा है। परम्परा की यह नदी उनकी चेतना में अनायास ही सरक रही है जिसमें पुराने ठहते हुए जीवन मूल्यों की छायाएँ निष्कम्प और जड़ होकर लटकी हुई है। स्मृतियों की इस नदी से कवि का वर्तमान अनुभव टकरा रहा है। नदी पर आधुनिक मन की छाया पड़े बिना नहीं रह सकती-

नदी की बांक पर

छाया

सरकती है

कहीं भीतर

पुरानी भीत

धीरज की

दरकती है

कहीं फिर बध्य होता हूँ |

अज्ञेय जी की कविता में ‘तारा’ कई स्थानों पर आता है। यह तारा अज्ञेय से पूर्व की कविता में भी खूब मिलता है। लेकिन अज्ञेय की कविता में तारा मात्र प्रकृति चित्रण या प्रकृति अवलोकन के लिए नहीं आया है। यह तारा व्यक्ति की सम्पूर्णता उसकी इयत्ता और अस्मिता के प्रतीक के रूप में आया है। अज्ञेय महसूस करता है कि आकाश में फैले हुए सूर्य के लाल आलोक में भी तारे की क्षमता बरकरार हैं-

उगा तारा,

मैंने देखा नहीं कि कब

बुझ गया

लाल आलोक सूर्य का। पर जब देखा

देखा यही

कि पेड़ों चट्टानों में उलझी

हारी हुई

लालिमा में द्योतित है शुक्र

अकेला तारा।

शुक्र अकेला तारा,

तब से चमक रहा है

कितने हार चुके है सूरज |”

निष्कर्ष :

सारांश रूप में कहा जाता है कि अज्ञेय ने अपनी प्रयोग परम्परा को खूब मथा है और उसे समसामयिकता से जोड़ा है चिंतन के धरातल पर भी और शिल्प के धरातल पर भी | इनके काव्य में नये-नये प्रयोग मिलते हैं।

संदर्भ :

  1. अज्ञेय, पूर्वा, पृ. 23
  2. वही, पृ. 254
  3. वही, बाबरा अहेरी, पृ. 54-55
  4. वही, इन्दुधनु रौंदे हुए ये, पृ. 29
  5. वही, पृ. 45
  6. वही, महावृद्वा के नीचे, पृ. 32
  7. वही, आंगन के पार द्वार, पृ. 70
  8. वही, नदी की बांक पर छाया, पृ. 36
  9. वही, बावरा अहेरी, पृ. 23-24

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