कमल सुनृत वाजपेयी के काव्य सर्जना में चित्रित भारतीय संस्कृति -डाॅ. मुकेश कुमार

संस्कृति शब्द का अर्थ इतना विस्तृत है कि उसे सीमित शब्दों में परिभाषित करना असंभव सा है। फिर भी संस्कृति का सम्पूर्ण अर्थ परिभाषित करने में वे नाकामयाब रहे हैं | सामान्यत: संस्कृति का अर्थ नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नति रहा है। वैसे संस्कार शब्द से संस्कृति का सर्जन हुआ है | संस्कारों द्वारा व्यक्ति के जीवन को सुसंस्कृत किया जाता है | जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों की योजना ‘संस्कृति’ कहलाती है। समाज में संस्कृति के तत्त्व पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं।

संस्कृति विचार एवं ज्ञान दोनों, व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक का समूह है जो केवल मनुष्यों के पास ही हो सकता है।

संस्कृति उन तरीकों का कुल योग है जिनके द्वारा मनुष्य अपना जीवन व्यतीत करता है जो सीखने की प्रक्रिया द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता है|”?

इसी प्रकार से आधुनिक कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी जी के काव्य सर्जना में भारतीय संस्कृति के बिन्दू निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया है- जग प्रेम की अभिव्यक्ति-

पाशविक शक्तियों से प्रतिरोध करने का एक मात्र अद्वितीय साधन प्रेम ही है और कवयित्री ने अपने काव्य में जग प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया है। उन्होंने जग वन्दन किया है क्योंकि उनका मानना है कि अगर जग की वन्दन में उस परम पिता परमात्मा का ध्यान भी सर्वोत्तम है-

तन सुधा हो

मन साफ हो

वाणी मीठी हो

स्नेह से भरा घर आंगन हो।

जग करता वंदन है

परम पिता है जीवनदाता

जीवन का आधार तुम ही हो

सब के मन के भाव यही हो

सब के तुम भाग्य विधाता हो |”

भारतीय संस्कृति की पोषक कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी जी नेअपनी काव्य यात्रा में पति के प्रति प्रेम भाव को दर्शाया है। वैदिक काल से हमारी यह परम्परा है कि भारतीय नारी का पति ही परमेश्वर होता है। सच्चे अआर्थो में वही गुरु है। वाजपेयी जी ने अपनी कविता में इस प्रकार कहा है-

द्वारे तुम्हारे जब मैं उतरी

पति गुरु के रूप मैं तुम्हें पाया

तुम ने सरल ज्ञान दे मुझे अपनाया

है महान चरित्र संपदा हमारी

निर्मल भावों की गंगा तुम्हारी ||

धन्य भाग्य मेरे है।

पति के रूप में तुम्हें पाया है

यही मैंने मन को समझाया है

यही है मेरी नियति।

यही है जीवन की गति।।

ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मनुष्य रात दिन प्रार्थना रत रहता है। मानों उसकी साँस-सॉाँस ईश्वर के प्रति व्याकुल हो। हम सोते जागते मौन प्रार्थना करते रहते हैं। इसी प्रकार से कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी जी ने ईश्वर की वंदना को इस प्रकार से प्रस्तुत किया-

करें स्तुति आपकी

दया करो हे नाथ

सिद्धि के तुम हो दाता

दो हमें बुद्धि और ज्ञान

हे उमापति भगवान

है जगत के पालन हारे

सुख शांति वैभव का वर दो

हे जग के पालन हारे

होय मनोरथ पूर्ण हमारे

देवताओं का उल्लेख

भारत विविध संस्कृतियों, विविध जातियों, विविध सम्प्रदायों एवं विविध भाषाओं का संगम क्षेत्र रहा है। जिनके जन समूह में समय-समय पर अनेक बाहरी संस्कृतियाँ समन्वित होती रही हैं। इसलिए इसका धार्मिक क्षेत्र काफी विस्तृत रहा है। रचनाकार ने विभिन्‍देवताओं की स्तुति की है।

शुभ नवरात्रि आई।

माँ उतारू तेरी आरती

निराश कुंठा तेरे दर हरती

दिल से तुम्हें मैं पुकारती

तुम दौड़ी चली आती।।

भक्तों ने माँ को पुकारा

माँ ने उनको दिया सहारा

सदा खुश हो वर देती है

भक्तों का दु:हर लेती है।॥

विभिन्‍देवताओं में शिव की पूजा आज भारत में सर्वव्यापक है। उत्तर में कैलास मान सरोवर से लेकर दक्षिण में श्री फैला और कितने रूपों में शिव शिवा की आराधना होती है, यह कहना संभव नहीं है। यहाँ तक कि योगीजनों ने इन्हें हृदय में देखा और शिखोडहं कहने में परमानंद प्राप्त किया। भोगियों ने इसमें भोग पाया और साधनों ने गुरु पाया देव, असुर, यक्ष, किन्नर, नाग, पुरुष, स्त्री, महर्षि, शुद्र आदि सबने समान श्रद्धा से इनकी आराघना की। कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी जी ने सम्पूर्ण यात्रा द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर समाज के सामने साहित्य को प्रस्तुत किया।

सुख शांति, वैभव का वर दो।

हे जग के पालन हारे

होंय मनोस्थ पूर्ण हमारे

तीन शब्द में सृष्टि सारी

ओम नमः शिवाय ।।

त्योहार दो प्रकार के होते हैं धार्मिक त्योहार एवं राष्ट्रीय त्योहार | धार्मिक त्योहार में गणेश चतुर्थी, राम नवमी, होली, मकर संक्रांति, दीवाली, नवरात्रे आदि | राष्ट्रीय त्योहारों में पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी, राष्ट्रीय नेताओं की जन्म ज्यंतियाँ, शिक्षक दिन आदि को स्थान दिया जाता है| महान कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी जी ने भारतीय संस्कृति को जीवित इन त्योहारों और उत्सवों का आयोजन युगों से होता चला आया है | कभी-कभी विशेष ऋतुओं के स्वागत में भी उत्सव मनाये जाते हैं | हमारे धर्म का सार तत्व त्योहारों में ही देखा जाता है| जनता के हृदय में और समाज के व्यवहार में धर्म त्योहारों के रूप में जीता है। उत्सव, मेले, रथयात्रा, यज्ञ और व्रत आदि में ही हमारा धार्मिक जीवन विकसित हुआ है| त्योहार के दिन सभी के मन की कसक और कुढ़न भूलकर भक्ति और आनंद के सम्मिलित भावों से उल्लासित होते हैं। उत्सव और त्योहार मानव मन की किचित उदास भक्ति भावना को जागृत कर उसे पवित्र करते हैं। उत्सवों और त्योहारों से मानव मानव के बीच का अन्तर कम होता है। सभी एक ही रंग में एक ही भाव में निमग्न होकर जीवन की कठुता, दुःख और कसक भूलने की कोशिश करते हैं। इसी प्रकार से त्योहारों में माता नवरात्रों का वर्णन कवयित्री ने इस प्रकार से किया है-

भक्तों ने माँ को पुकारा

माँ ने उनको दिया सहारा

सदा खुश हो कर देती है

भक्तों का दु:हर लेती,

शुभ नवरात्रि आई

माँ आप अर्न्तयामी है।

करूणामयी ज्ञान है।

सदादया दृष्टि रखती है

माँ आप जगत्‌ जननी है।।*

ऐसी सुन्दर प्राकृतिक सुषमा की अधिष्ठामी भारतीय नदियों का बहुत महत्त्व है। चारों तरफ हरियाली भारत की संस्कृति की लहर गगा नदी को माना गया है। कहीं उसकी प्राकृतिक सुषमा चिहित है तो कहीं उसके पुण्योज्ज्वल दर्शन का महत्त्व अंकित है

रखने का सबल प्रयास समाज के सामने प्रस्तुत किया है-

प्रकृति की अद्भूत लीला है।

सरिता इठलाती बहती है।

झरने भी मधुर गीत गाते हैं

सावन की रिमझिम फुहार है।

पानी बरसे बिजली भी चमके है।”*

सारांश रूप में कहा जाता है कि कमल सुनृत वाजपेयी जी ने अपने काव्य संस्कृति शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है। वे संस्कृति को मानवीय पदार्थ मानती है। जिसमें अध्यात्म, धर्म, सामाजिक रूढ़ि, रीतियों तथा व्यवहारों का सौंदर्य आलोकित है। आज के इस भौतिकवादी युग में नव अपनी भारतीय संस्कृति से वंचित होती जा रही है। उनके हृदय में रचनाकार ने सांस्कृतिक आन्दोलन जगाने का प्रयास किया है।

 

संदर्भ-

  1. डॉ. मोहिनी टाया, हिन्दी काव्य में भारतीय संस्कृति, पृष्ठ 453
  2. वही, पृष्ठ 434
  3. कमल सुनृत वाजपेयी, “यादों की गठरी’ काव्य संग्रह, पृष्ठ 9
  4. वही, पृष्ठ 44
  5. वही, इक्यावन शक्तिपीठों का वर्णन एवं सती माता के अंग, पृष्ठ 55
  6. वही, पृष्ठ 44
  7. वही, पृष्ठ 55
  8. वही, चरणों की अभिलाषा, पृष्ठ 44
  9. वही, पृष्ठ 27

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