कमल सुनृत वाजपेयी के काव्य में बसंत ऋतु का चित्रण-डॉ. मुकेश कुमार

बहुआयामी  प्रतिभा की धनी कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी का जन्म 10 फरवरी, सन् 1947 ई. में यवतमाल (मध्यप्रदेश) में पं. अंबिका प्रसाद व माता श्रीमती कमला देवी त्रिवेदी के घर में हुआ। आपका विवाह डॉ. सुनृत कुमार वाजपेयी जी के साथ हुआ, जो हिन्दी साहित्य के महान आलोचक, निबन्धकार, पत्रकार आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी जी के पुत्र हैं। साहित्य की गंगा में आपकी भी डुबकी लग गई।
कमल सुनृत वाजपेयी की कविताओं में बसंत ऋतु का सुंदर चित्रण मिलता है। बसन्तोत्सव का महत्व किसानों के लिए काफ़ी अहमियत रखता है, क्योंकि इन दिनों किसानों के घर में लक्ष्मी का आगमन शुरू होता है। इन दिनों किसानों के घर में लक्ष्मी का आगमन शुरू होता है। इन दिनों प्रकृति धानी साड़ी पहन कर फूलों से लदकर मोहक और मादक रूप धारण करती है। किसानों के घर में अगहनी धान की फसल लक्ष्मी के रूप में तैयार रहती है और इस प्रकार आर्थिक चिन्ताओं से मुक्त होकर तथा परिश्रम से विरत होकर ऋतुराज के मादक आगमन से कृषक उन्मुक्त हो जाता है और खुलकर प्रकृति के साथ खेलता है।
माघ शुक्ल पंचमी से बसंत ऋतु का प्रारम्भ होता है। यह दिन शुभ कार्यों के लिए अच्छा माना जाता है। इसे बसंत पंचमी कहते हैं। माघ शुक्ल पंचमी से वसंतोत्सव का प्रारम्भ होता है। जो फाल्गुन कृष्ण पंचमी को पूर्ण होता है। इस अवसर पर नर–नारी सुंदर वस्त्रों में सुशोभित होकर नृत्य गीत गाते बसंत ऋतु का स्वागत करते हैं। कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी ने अपने काव्य में बसंत ऋतु एवं वसंतोत्सव का वर्णन कई जगह प्रस्तुत किया है। बसंत तो ऋतुओं का राजा कहलाती है। जिसका प्रभाव सभी कवियों पर रहा है जो इस प्रकार है–
“आज की सुबह आज की रात।
नैनों में भरा सुबह का भोर।।
हे बसंत का शुभ आगमन रे।
आज है पुलकित तन–मन रे।
आज की सुबह आज की रात।
ले आये बासती लहँगा चुनर रे।
डाली–डाली अंबुआ बोरे।
कोयलिका कुँहकी–डाली–डाली रे।।
पीली–पीली सरसों रंग रंगीले रै।
आई–आई बसंत बहार रे
आज की सुबह।
आज की सुबह आज की रात।।”1
कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी ने बसंत का वर्णन अपने हृदय की गहराई से किया है। वह बसंत में शीत लहर, रंगों, मन का मयूर नाचना आदि का वर्णन करती हैं–
“मदमस्त बसंत की शीत लहर में।
हम सब मिल गाना गाये एक स्वर में।
बसंत ऋतु ने धरा का घूंघट खोला।
लजीली धरा पर मानो प्यार उड़ेला।
मदमस्त बसंत की शीत लहर में।
धरती ने हरा बिछैना ओढ़ा है।
अगुआ की डालियाँ महकी हैं।
महुआ के रस बरसाया है।।”2
बसंत में लहरों के साथ–साथ गेहूँ की फसल का भी बहुत ही सुंदर ढंग से कवयित्री ने वर्णन किया है। वन–तालाब, नदी, नाले, झरने आकाश आदि का वर्णन बहुत संयोग पक्ष को लेकर किया है–
“मदमस्त बसंत की शीत लहर में।
लहराती खेतों में गेहूँ की बाली है।
हम जाने बसन्त ऋतु आई है।
मन–मयूर नाच उठा है।
गूंज रही बसंत घर–घर शहनाई है।
मदमस्त बसंत की शीत लहर में।।”3
भारतीय समाज में वसंतोत्सव की तरह शरदोत्सव का भी काफी महत्त्व रहा है। यह भी बसंत ऋतु का ही हिस्सा माना जाता है। इसमें कवयित्री ने बसंत ऋतु का वर्णन किया है–
“नाचत गरजत बरसत बसंत आयो रे।
हाथों में मेहंदी माड़ी रे।
पाव में मेहंदी माड़ी रे।
सतरंगी साड़ी लाये संजना रे।
सतरंगी साड़ी पहनी संजना तोरी अगना रे।।”4
सारांश रूप में कहा जा सकता है कि 21वीं सदी की महान कवयित्री कमल सुनृत वाजपेयी के काव्य में प्रकृति कोयल की सुन्दर वाणी, सरसों का खिलना, गेहूँ की बालियों का दिखना, पेड़ों पर नये पत्तों का निकलना आदि बसंत ऋतु का सुन्दर चित्रण मिलता है।
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संदर्भ :
1.    कमल सुनृत वाजपेयी, पल–पल याद आती है, पृष्ठ 10
2.    कमल सुनृत वाजपेयी, यादों की गठरी, पृष्ठ 40
3.    वही, पृष्ठ 40
4.    वही, पृष्ठ 41

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