कवि केदार नाथ अग्रवाल के काव्य : चित्रित मानवीय संवेदनाएँ-डाॅ. मुकेश कुमार

कवि केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 1911 ई. में कमासिन (बांदा) में हनुमान प्रसाद पिता व माता घिसट्टो के घर में हुआ। इनकी पत्नी का नाम पार्वती था। केदारनाथ अग्रवाल आरम्भिक दौर में ‘बालेंदु/ उपनाम से रचनाएँ लिखते थे। इनकी रचनाएँ निम्न प्रकार से हैं– युग की गंगा (1947), नींद के बादल (1947), लोक और आलोक (1957), फूल नहीं रंग बोलते (1965), आग का आईना (1970), गुलमेंहदी (1978), पंख और पतवार (1979), बम्बई का रक्‍त स्नान (1984), हे मेरी तुम (1984), मार प्यार की थापें (1984), कहे केदार खरी-खरी (1983), अपूर्वा (1984), जमुना जल तुम (1984), बोले बोल अबोल (1985), जो शिलाएं तोड़ते हैं (1985), आत्मगंध (1988), अनहारी हरियाली (1990), खुली आँखें : खुले डैने (1993), पुष्पदीप (1994), बसंत में हुई प्रसन्न पृथ्वी (1996) |

बहु आयामी प्रतिभा के स्वामी पारगामी ऋतम्भरा प्रज्ञा के अनुयायी, कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभा के धनी, प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल मार्क्सवाद से बहुत अधिक प्रभावित रहे। उनकी आरम्भिक रचनाओं में छायावाद का प्रभाव दिखाई देता है लेकिन धीरे-धीरे उनका रुझान जन मानस की पीड़ा और संघर्ष की ओर बढ़ा। उनके काव्य में जो शोषण राजनीतिक कारणों से बड़े-बड़े महाजनों के कारण, किसानों, गरीबों, मजदूरों का हुआ। उन्होंने उनके प्रति संवेदना प्रकट की और अपने काव्य में मार्मिक प्रसंगों को उजागर किया।इन्होंने अपने काव्य में कल्पना को छोड़कर यथार्थ में जन की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर उसे व्यक्त किया।

किसी भी रचनाकार के समग्र काव्य का अवलोकन करने के पूर्व उनके व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त करना आवश्यक है। क्‍योंकि व्यक्तित्व की झाँकी उसके काव्य में किसी-न-किसी प्रकार से प्रतिबिम्बित होती है। रचनाकार के काव्य में उनके विचार और व्यक्तित्व की प्रमुख भूमिका होती है। रचनाकार (कवि) एक संवेदनशील और सामाजिक प्राणी है। इसलिए समाज के सुख-वुःख, उत्थान-पतन आदि का अधिक प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है और वही उसके काव्य के माध्यम से प्रतिबिम्बित होता है। इसलिए किसी भी रचनाकार के काव्य की पहचान के लिए हमें उनके जीवन और परिवेश दोनों को जानना आवश्यक है। किसी रचनाकार के व्यक्तित्व की व्याख्या सरल नहीं है। किसी का बाहरी व्यक्तित्व देखकर उनके आतंरिक व्यक्तित्व का अंदाजा लगा देना कठिन है। अर्थात्‌ व्यक्तित्व जीवन की एक ऐसी इकाई है जिसको आतंरिक और बाह्य दो पक्षों में विभाजित नहीं किया जा सकता। परन्तु अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से उनकी आकृति और प्रकृति, व्यवहार और स्वभाव अथवा चरित्र शील के आधार पर अंतरंग और बहिरंग भेद किये जा सकते हैं। आकृति, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान, व्यवसाय-व्यवहार, हास-परिहास, बोलचाल आदि व्यक्तित्व के बाह्य उपकरण कहे जा सकते हैं। जबकि स्नेह, सद्भाव, विविध मनोवृत्तियाँ और स्वभाव आदि व्यक्तित्व के आन्तरिक उपकरण हैं। मानव-मन पर व्यक्तित्व कीछाप सम्पूर्ण रूप में पड़ती है, वह प्रायः अविभाज्य होती है। प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख रचनाकार कवि केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 4 अप्रैल 1911 को बांदा जिले की बबेरू तहसील के कमासिन नामक ग्राम में हुआ है। केदारनाथ के पिता श्री हनुमान प्रसाद काव्य रसिक थे। ‘मान’ नाम से ब्रजभाषा में कविताएँ लिखा करते थे। माता श्रीमती घसिटो देवी थी। पेशे से केदारनाथ जी वकील हैं।

केदारनाथ अग्रवाल की सहानुभूति दुनिया के उन तमाम राष्ट्रों के प्रति जो साम्राज्यवादी शक्ति के विरुद्ध संघर्षशील हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद का मुकाबला करने वाले वियतनाम पर केदार ने कविताएँ लिखीं। “कहे केदार खरी-खरी’ में उन्होंने डालर के खतरे के प्रति भी भारतीय राजनेताओं को अगाह किया। साम्यवादी बिगुल फूँकने के लिए वे हिंसा और अहिंसा दोनों साधनों का पयोग करने की सलाह देते हैं। जैसे-जैसे विचार उनकी संवेदना में गलता है वैसे-वैसे उनकी रचनाओं में नूतन सौन्दर्य निखरता है।

कविता और केदार एक ही व्यक्तित्व के दो पहलू हैं। मानवीसंवेदना को व्यापक भावभूमि तक ले जाने का प्रयास कवि केदार ने किया है। प्रस्थापित व्यवस्था के प्रति यह कवि बड़ा उदात्त था। धरती के पुत्र का काव्य बड़ा संवेदनशील है, धरती की ही भाषा में धरती के पुत्रों की वेदना को अभिव्यक्त करता है।

केदारनाथ अग्रवाल के काव्य जगत में सामाजिक विषमता, सरकारी अव्यवस्था, सामंती व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया है। आर्थिक, सामाजिक विषमता के चपेट में मानव समाज के स्नेहबंधा का हास हो रहा है। समाज अहं एवं न्यून के वर्ण में बंटता जा रहा है। मनुष्य के बीच संवाद कम हो रहा है। आपसी सम्बन्ध विकृत हो रहे हैं। एक तरफ बेशुमार समृद्धि, दूसरी तरफ अभाव से त्रस्‍्त तड़पता जीवन।| कवि की संवेदनाएँ उस व्यवस्था के प्रति चिंतित हैं –

“टैक्सों की भरमार, हमारी करती है सरकार,

जीवन का अधिकार, हमारी हरती है सरकार,

कोई देखे मेरा मनुष्य पत्थर हो गया,

बाहर के विनों में… |!”

इसलिए केदार के सामने अब क्रांति का मार्ग दिखाई देता है। वह सर्वहारा वर्ग से कुर्बानी करने तथा ‘लाल सवेरे के मुंह” की बात करता है। वह सामंती व्यवस्था का अन्त चाहता है। वह आशावादी है। मानव के भविष्य के प्रति असीम निष्ठा एवं श्रद्धा रखने वाला कवि कभी निराश नहीं होता। विशाल भारत की कोख से जन्मा यह कवि तूफानों से डरता नहीं, बल्कि लड़ने की बार-बार कोशिश करता है-

जो जीवन की धूल को चाटकर बड़ा हुआ है,

तूफानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है,

जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है,

जो रवि के रथ का घोड़ा है…

ऐसा धरती पुत्र मरेगा नहीं चिरंतन रहेगा।

केदारनाथ अग्रवाल परिवर्तनशील कवि है। वह केवल जीवन मूल्यों एवं संस्कार की कविता नहीं है, पठन-पाठन की कविता है। प्रारम्भिक कविता में प्रेम, सुख-दुः:ख, महंगाई, भूख, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता की कविता है। उनका पहला काव्य संग्रह ‘युग की गंगा’ सन्‌ 4947 ई. में प्रकाशित हुआ। वैयक्तिक नेत्र से विश्वबंधुता की ओर यह काव्य अग्रसर होता है। इसके बाद “नींद के बादल’ प्रकाशित हुआ |

केदारनाथ अग्रवाल व्यापक मानवतावाद एवं लोकचेतना के कवि हैं | उनका मानव प्रेम समाजवादी दर्शन से प्रभावित है। “दो जीवन’, “कली एवं बबूल’, ‘धन-जन’ आदि कविताएँ मानव मुक्ति की छटपटाहट को व्यक्त करती है।“कली एवं बबूल’ कविता में गहरी प्रतीकाशयता दृष्टव्य है-

“घन गरजे घर गरजे, बंदी सागर को लख कतार।

एक रोष से, गरजे, घर गरजे |”              

केदारनाथ अग्रवाल की कविता जन जागरण का अस्त्र है। जन-जन को संघटित करने के लिए ललकारती है। केदार का व्यक्तित्व प्रगतिशील होने के साथ सौन्दर्य एवं प्रेम से अछूता नहीं रह सकता। उनका प्रारम्भिक व्यक्तित्व “नींद के बादल’ में रोमानी भावुकता, कल्पना एवं प्रेम से ओत-प्रोत है। मानव प्रकृति और प्रेम इन तीनों का समन्वय ही कविता की शक्ति बनी है-

“माझी न बजाओ बन्सी, बसन्ती हवा, फूल नहीं बोलते हैं।”

वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था ने मानवी संवेदनाओं को तहस-नहस कर डाला है। पूरा जनमानस हिल गया है। केदार का काव्य संसार ऐसे ज्वलंत एवं शाश्वत समस्याओं पर भाष्य करता है। भूख, महंगाई, अभावा, दरिद्रता कितनी सारी भयावह समस्याएँ हैं, ऐसी स्थिति में केदारनाथ का कवि फैली अंधाधुंध समस्याओं पर प्रहार करता है| लोकततन्त्र की सच्चाई का उद्घाटन करता है-

“चलती राजनीति अब सहज नहीं चलती,

देश की राजनीति… |

बिना पानी के खिचड़ी पकाती है,

जनता हवा खाती है,

देश की राजनीति संसदीय प्रणाली,

लोकतन्त्र के पक्ष में डूबे सूरज पुकारती है।”

केदार की कविता जीवन मूल्यों के संस्कार की केवल कविता के साथ पठन-पाठन की भी कविता है। उनके प्रारम्भिक गीत वैयक्तिक-नारी प्रेम पर आधारित है। जिस प्रकार केदार का व्यक्तित्व परिवर्तनशील है उसी प्रकार उनकी कविता का आलेख भी परिवर्तनशील एवं विस्तृत फलक पर व्याप्त है। उनकी वैयक्तिक प्रेम सुख-दुःख की कविता उत्तरोतर सामाजिक सुख-दुःख की बात करती है। वैयक्तिक प्रेम, ईश्वर अनास्था, सामंती व्यवस्था का विरोध, मानवतावादी तथा राष्ट्रप्रेम की भावना को साकार करती है। अब हिन्दी में कविता न तो रस की प्यासी है और न अलंकार की इच्छुक और संगीत की तुकांतपदावली की भूखी है। वह अब चाहती है किसान की वाणी मजदूर की वाणी। कहीं पर अवध की लहुलूहान खेती के पौधे, चन्द्र-सूर्य, तारे, फूल, वनस्पति, नीला आकाश सारे-सारे पृथ्वी के आपादान हैं।

भारतीय किसान को गरीबी, कर्ज आदि पैतृक दाय के रूप में मिलती है। इस तरह से पीढ़ी विवशतापूर्ण दयनीय जीवन का क्रम चलता रहता है। जिन समस्याओं को प्रेमचन्दर अपने कथा साहित्य में अंकित करते हैं, उन्हीं समस्याओं को केदारनाथ अग्रवाल अपनी कविताओं में चित्रित करते हैं। केदारनाथ अग्रवाल कल्पना जीवी कवि नहीं, उन्होंने अपने आस-पास रहने वाले गरीबों की जिन्दगी को बहुत नजदीक से देख कर महसूस किया है-

जब बाप मरा जब पाया

भूखे किसान के बेटे ने

घर का मलबा दूटी खटिया

कुछ हाथ भूमि – वह भी परती

बनिया के रुपयों का कर्जा

जो नहीं चुकाने पर चुकता

दीमक, गोजर, मच्छर, माटा

ऐसे हजार सब सहवासी

बस यही नहीं जो भूख मिली

सौगुनी बाप से अधिक मिली।।”

केदारनाथ जी कहते हैं, “द्न्द्त में ही पड़ा आदमी निखरता है औरनिखार से ही संसार का निर्माण करता है।”

निष्कर्ष –

केदारनाथ अग्रवाल की कविता परिवर्तनशील है। छायावाद, प्रगतिवाद एवं नयी कविता इन तीनों युगों को स्पर्श करती वर्तमान में प्रासंगिक बनती है। उनकी कविताओं में मानवता के नये आयाम खुलते नजर आते हैं। इनमें मानव की वाणी, मजदूर एवं किसानों की वाणी में आते हैं-इसमें मानव की वाणी, मजदूर एवं किसानों की वाणी में अभिव्यक्त होती है।

संदर्भ –

  1. केदारनाथ अग्रवाल, पंख और पतवार, पृष्ठ 20
  2. केदारनाथ अग्रवाल, कहे केदार-खरी-खरी, पृष्ठ 23
  3. कंदारनाथ अग्रवाल, नींद के बादल, भूमिका
  4. .केदारनाथ अग्रवाल, जीवन की धूल, पृष्ठ 48

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