कामायनी में भारतीय संस्कृति का चित्रण -डाॅ. मुकेश कुमार

भारतीय संस्कृति किसी जाति-विशेष की संस्कृति नहीं है। इसमें समय-समय पर आर्य-अनार्य तथा अन्य अनेक जातियों की संस्कृति का भी सम्मिश्रण होता रहा है। किन्तु यह सम्मिश्रण इस रूप में हुआ है कि अब उनका स्वतन्त्र व्यक्तित्व एवं रूप पृथक्‌ रूप में दिखाई नहीं देता। फिर भी, अध्ययन की सुविधा के लिए, भारतीय संस्कृति के विविध रूपों का उल्लेख किया जा सकता है, यथा-

(क) देव संस्कृति                    

(ख) मानव संस्कृति

(क) देव संस्कृति-

सांस्कृतिक दृष्टि से प्रथम विकास देव संस्कृति का हुआ था। देव का अर्थ है-वे जो दान करते हैं तथा दीप्तिमान कहते हैं| देवताओं की द्युति सम्पन्न, दीप्तिवान्‌ तथा दानशील माना गया है। पुराणों में देवताओं की संख्या तथा भेद-प्रभेदों का उल्लेख भी मिलता है। देव संस्कृति के सम्बन्ध में सामान्य रूप से यह कहा जा सकता है कि देवता अलौकिक शक्ति-सम्पन्न थे, इनमें ऐश्वर्य की प्रधानता थी । ये नृत्य तथा संगीत के प्रेमी थे। सुरापान करना इनका शौक था, तथा स्वभाव से ये विलासप्रिय थे। देवताओं में आत्मवादी भावना का आधिकय था, अर्थात्‌ अपने अतिरिक्त वे किसी अन्य सत्ता की शक्ति को स्वीकार नहीं करते थे। कर्मवाद की दृष्टि से से यज्ञों में आस्था रखते थे।

(ख) मानव संस्कृति-

मानव संस्कृति देव संस्कृति के विनाश के बाद शुरू होती है और इसी में अनेकानेक जातियों की संस्कृति का सम्मिश्रण मिलता है। इसी संस्कृति के भी दो भेद हैं-वैदिक और अवैदिक संस्कृति। मानव संस्कृति में संस्कार भावना, वर्णाश्रम-व्यवस्था, यम-नियम, विश्व-मैत्री, राष्ट्रीय भावना पारिवारिक व्यवस्था इत्यादि विशेषताएँ मिलती हैं।

अलौकिक शक्ति-

देव संस्कृति में देवताओं को अमित शक्ति से सम्पन्न बताया गया है| कामायनी में प्रसाद ने देवताओं के विध्वंस का उल्लेख करते हुए चिन्ता सर्ग में मनु के द्वारा देवताओं की शक्ति का उल्लेख किया है। देवताओं की कीर्ति तथा दीप्ति समस्त वातावरण में प्रतिबिम्बित होती थी-

“सब कुछ थे स्वायत्त, विश्व के

बल, वैभव, आनन्द अपार

उद्देलित लहरों सा होता, उस

समृद्धि का सुख-संचार |”

नृत्य एवं संगीत प्रेमी-देवताओं के जीवन में नाच-गाने तथा संगीत का महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसका कारण था अप्सराओं के साथ रहते हुए आमोद प्रमोद मनाना। कामायनी में प्रसाद ने नृत्य एवं गान का वर्णन किया है। उपवन एवं कुंजों में सामूहिक नृत्यों का आयोजन होता था। विविध प्रकार के वाद्यों का उपयोग किया जाता था-

“कुसुमित कुंजों में वे पुलकित

प्रेमालिंगन हुए विलीन,

मौन हुई हैं मूर्च्छित तानें

और न सुन पड़ती अब बीन।*

यज्ञों में आस्था-

देवताओं के धार्मिक जीवन में यज्ञ का महत्त्वपूर्ण स्थान था। इसलिए उनकी यज्ञों के प्रति आस्था थी। उनके जीवन में सभी महत्त्वपूर्ण क्षणों में यज्ञ का विधान होता था। कामायनी में प्रसाद ने देव-संस्कृति में यज्ञों का उल्लेख किया है। यज्ञ की सफलता के लिए पुरोहित का होना अनिवार्य माना जाता था। ये सभी यज्ञ बलि प्रधान होते थे। यज्ञ करने वाला मांस का भक्षण तथा सुरा का पान करता था। मनु के दो यज्ञों का कामायनी में उल्लेख किया है। पहला यज्ञ पाक यज्ञ है-

“पाक यज्ञ करना निश्चित कर

लगे शालियों को चुनने,

उधर वन्हि ज्वाला भी अपना

जगी धूम पट थी बुनने॥”

इसी प्रकार मनु का मैत्रावरुण यज्ञ है, जिसमें पशु-बलि का वर्णन है-

“यज्ञ समाप्त हो चुका तो भी

धधक रही थी ज्वाला,

दारुण दृश्य! रुधिर के छींटे!

अस्थि खण्ड की माला।”

मानव संस्कृति के विविध रूप

वर्णाश्रम व्यवस्था-वैदिक ग्रन्थों में वर्णाश्रम व्यवस्था का कठोरता से पालन करने का विधान मिलता है। इन ग्रन्थों में समाज में भिन्न-भिन्न वर्णों के व्यक्ति वर्ण के अनुसार कर्म करते थे। कुछ आचार्य तथा अवैदिक विचारघाराओं के प्रभाव से इसकी कठोरता अवश्य कम कर दी गई। कामायनी का सम्पूर्ण अध्ययन करने पर यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि प्रसाद ने यद्यपि वर्णाश्रम व्यवस्था का उल्लेख किया है, तो भी वे इसकी कठोरता के पक्षपाती नहीं थे-

तुम्हें तृप्ति कर सुख के साधन सकल बताये,

मैंने ही श्रम भाग किया फिर वर्ग बताये।”

नारी का महत्त्व-भारतीय संस्कृति में नारी को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। नारी मूलतः सौन्दर्यमयी, कल्याणमयी तथा मानव का उद्धार करने वाली मानी गई है। कामायनी में श्रद्धा के रूप में प्रसाद ने आदर्श गुणों से संयुक्त नारी की परिकल्पना की है। श्रद्धा को दया, ममता, सहानुभूति तथा विश्वास रूपिणी नारी के रूप में कामायनी में चित्रित किया गया है। अन्धकार तथा निराशा में डूबे मनु को जीवन-सागर में उतारने का श्रेय श्रद्धा को ही है-

‘डरो मत अरे अमृत सन्‍्तान

अग्रसर है मंगलमय वृद्धि

पूर्ण आकर्षण जीवन केन्द्र

खिंची आवेगी सकल समृद्धि |”

विश्व-बन्धुत्व की भावना-वैदिक संस्कृति में सम्पूर्ण विश्व को एक कुटुम्ब समझने की बलवती भावना मिलती है। वैदिक संस्कृति के अतिरिक्त बौद्ध संस्कृति में भी विश्व-बन्धुत्व का स्वर सुनाई देता है| कामायनी में प्रसाद ने इसी भावना का सुन्दर रूप में पुष्ट पोषण किया है। कामायनी में सर्वप्रथम मानव के अभ्युदय का सन्देश है-

“और यह क्‍या तुम सुनते नहीं

विधाता का मंगल वरदान-

“शक्तिशाली हो, विजयी बनो’

विश्व में गूँज रहा जय गान[

राष्ट्रीय भावना-

आधुनिक युग के प्रभाव-स्वरूप भारतीय संस्कृति में राष्ट्र-प्रेम की भावना भी मिलती है। कामायनी में अनेक स्थलों पर राष्ट्र के प्रति सम्मान एवं प्रेम भी व्यक्ति किया गया है। कामायनी से कतिपय उदाहरण दिये जाते हैं-

लोक सुखी हो अवश्य ले यदि उस छाया में,

प्राण सदृश तो रमो राष्ट्र की इस काया में |

वस्तुतः किसी देश की संस्कृति तथा साहित्य में जननी और जन्य का सम्बन्ध है। कामायनी में भारतीय संस्कृति का गत्यात्मक रूप प्रकट हुआ है। प्रसाद ने भारतीय संस्कृति के परम्परागत रूप तथा सामाजिक रूप दोनों का ही

कामायनी में सफल चित्रण किया है।

संदर्भ :

  1. प्रसाद, कामायनी, चिन्ता सर्ग, पृ. 8
  2. वही, पृ. 9
  3. वही, लज्जा सर्ग, पृ. 42
  4. वही, काम सर्ग, पृ. 35
  5. वही, पृ. 3
  6. वही, श्रद्धा सर्ग, पृ. 48
  7. वही, पृ. 48
  8. वही, पृ. 49

 

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