छायावादी काव्य में राष्ट्रीय चेतना के स्वर -डॉ. मुकेश कुमार

वैदिक साहित्य से निःसृत यह राष्ट्रीय चेतना व सांस्कृतिक धारा रामायण व महाभारत में निरंतर प्रवाहित होती रही। कालांतर में कालिदास के साहित्य में पल्‍लवित तथा हर्षवर्धन के साहित्य तक पुष्टित एवं विकसित होती रही। भले ही खुद अनिवार्य कारणों से उसके प्रवाह में व्याघात उपस्थित हुआ हो किन्तु वह अवरुद्ध नहीं हुआ। आधुनिक युग में अनेक समाजों की स्थापना के साथ-साथ स्वामी विवेकानंद के द्वारा यह विश्व विजयी राष्ट्रीय सांस्कृतिक जयघोष पुनः पूरे वगे से मुखरित हुआ। तत्पश्चात्‌ यह स्वर बुलंद हो गया।

ऐतिहासिक दृष्टि से जिसे गाँधीयुग कहा जाता है। साहित्यिक दृष्टि से उसी को छायावादी युग की संज्ञा दी जाती है। तात्पर्य यह है कि छायावादी काव्य गाँधी युग की मिट्टी में ही अंकुरित पुष्टित और पल्‍लवित हुआ। गाँधीयुग राष्ट्रीय चेतना का उत्कर्ष काल था। उस समय भारतीय जनमानस में राष्ट्र प्रेम का समुद्र हिलोरें भर रहा था। अतः छायावादी काव्य से यह आशा करना स्वाभाविक ही था कि वह अपने युग का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय चेतना की पूर्ण अभिव्यक्ति करें किन्तु छायावादी काव्य के सम्बन्ध में यह आम धारणा है कि उसने अपने युग को प्रतिनिधित्व करने के बजाय उसकी अपेक्षा ही की है। इस धारणा की पुष्टि करते हुए कहा जाता है कि जिस समय देश की जनता स्वतंत्रता संग्राम में जूझते हुए अंग्रेजों के अत्याचारों की पीड़ा झेल रही थी, छायावादी कई कवियों ने रंगीन चित्र की कल्पना में लीन थे इसलिए छायावादी काव्य को पलायनवादी भी कहा जाता है।

1920 से 1935 के बीच के हिन्दी कविताओं को आलोचकों ने दो धाराओं में देखने का प्रयास किया है – एक राष्ट्रीयता की धारा और दूसरा छायावादी कविता की धारा। लेकिन इस अंतराल के कवियों का यह बंटवारा तार्किक नहीं है। डॉ. नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक छायावाद में इसे दिखाया है। यह अलग बात है कि इस समय लिख रहे कवियों की भावभूती अलग-अलग है। यह भिन्‍नता व्यक्तिनिष्ट है जो कि इस अंतराल की सामाजिक, राजनैतिक स्थिति की विविधता है न कि भिन्‍नता। माखनलाल चतुर्वेदी बालकृष्ण शर्मा “नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर आदि कवियों की भावधारा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद आदि राष्ट्रीय कवियों की भावधारा में दृष्टिकोण का फर्क है। लेकिन इनकी राष्ट्रीयता की भावना का धरातल समान है।

इस युग में सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की भावना कई रूपों में अभिव्यक्त हुई है। प्राचीन गौरव की पुनरुत्थानवादी भावना आर्य संस्कृति के ही जयकारे है, लेकिन यह कहीं से भी संकीर्ण एवं साम्प्रदायिक नहीं है। भारतवासियों ने पराधीनता के अपमान के अतीत का सहारा लिया। अतीत की यह पुनरुत्थानवादी भावना जयशंकर प्रसाद में सर्वाधिक थी। अपने ऐतिहासिक नाटक – चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त आदि के द्वारा उन्होंने जागरण के प्रसार में सहयोग दिया। छायावादी युग में राष्ट्रीयता की प्राथमिकता अभिव्यक्ति उन नेताओं की प्रशंसा के रूप में प्रकट हुई, जिन्होंने देश का नेतृत्व किया था। सत्याग्रही वीरों की प्रशंसा में कवि अतीत के स्वाधीनतावादी नेताओं को नहीं भूल सके। रामधारी सिंह दिनकर ने उन नेताओं की ओर संकेत किया-“देखा, शून्य कुंवर का गढ है, झाँसी की वह शान नहीं है। दुर्गादास-प्रताप बली का प्यारा राजस्थान नहीं है। समय माँगता मूल्य मुक्ति का देगा कौन माँस की बोटी। पर्वत पर आदर्श मिलेगा, खायें चलो घास की रोटी |”

छायावाद नवजागरण की चेतना से सम्पन्न काव्यांदोलन है। छायावादी आंदोलन भारतीय राजनैतिक धरातल पर स्वाधीनता संघर्ष के चरमोत्कर्ष का दौर है। कई आलोचकों ने छायावाद को गाँधीवाद की कव्याभिव्यक्ति माना है। छायावाद के युगीन भावबोध के विषय में विश्वनाथ त्रिपाटी का विचार है कि-“छायावाद भक्तिकाव्य के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण काव्यांदोलन है। भक्तिकाव्य का आघार छायावाद का स्वाघीनता आंदोलन था। छायावादी युग के साहित्य में हिन्दी प्रदेश का विषय यर्थाथ और विषमता से रहित स्थिति का स्वप्न दोनों सह स्थिति एवं अभिव्यक्ति है। इसलिए इस दौर में प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, शुक्ल जैसी विभूतियाँ समकालीन है। विषम यथार्थ प्रेमचंद के कथा साहित्य का चित्रण है तो स्वप्न छायावादी काव्य है। सप्निल सप्न नहीं, यथार्थ सप्न है। पराधीन भारत का स्वातंत्र्यसप्न |?

राष्ट्रीयता के विकास के लिए जयशंकर प्रसाद ने अतीत की ओर दृष्टि दौड़ाई। अपनी कविताओं तथा नाढकों में उन्होंने भारत के स्वप्रेम इतिहास को चित्रित किया। स्कवदगुप्त, चंद्रगुप्त तथा श्रुवस्वामिनी आदि नाटकों के माध्यम से वर्तमान सामाजिक चुनौतियों के सामने अपना प्रतिरोध व्यक्त कराया। प्रादेशिकता और विभिन्‍न विचारधाराओं के तनाव से जुजर रहें। भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को इससे अधिक प्रेरणा संदेश कौन दे सकता है जो चंद्रगुप्त नाटक के माध्यम से चाणक्य कहता है कि – “मालवा और मगघ्च को भूलकर जब तुम आर्यवर्ता का नाम लोगे, तभी वो मिलेगा” अर्थात्‌ आर्यवर्ता की स्थापना विभिन्‍नता को छोड़कर स्वाधीनता के केन्द्रीय लक्ष्य के ओर प्रयत्न करके ही मिलेगा। यहाँ आर्यवर्ता अखंड भारत का प्रतीक है इस नाटक में अनेक गीत प्राचीन भारत से युक्त है। छायावादी कवियों ने स्वाधीनता के लिए गीत लिखे –

“हिमाद्वि तुंग श्रंग से

प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयंप्रभु समुज्वला

स्वतंत्रता पुकारती |”

अकेली सिक्‍खों के शौर्य और गीत के वाणी का स्मरण कराते हुए निराला ने लिखा-

*शेरों की मुद्रा में

आया है आज सायार

जागों फिर एक बार |”

छायावादी कवि हर तरह से जाति भेद और देश-भेद के विरुद्ध थे। उसने केवल प्रेम-राज्य में ही रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया, बल्कि जीवन के जिस क्षेत्र में उसे विषमता पराधीनता और अन्याय दिखाई पड़ा। वही उसने संघर्ष आरंभ कर दिया। इसीलिए जब उसने सुना कि इंगलैंड के सम्राट अष्टम एड्वर्ड ने एक सामान्य विधवा स्त्री के प्रेम के लिए सिंहासन छोड़ दिया तो वह उसके इस आचरण को दर्ज करता है। छायावादी कवियों के मन में प्राचीन सीमाओं का बोध था लेकिन नवीन क्षितिज की कोई स्पष्ट रूपरेखा न थी। पूरा युग की आने वाली नयी संस्कृति के प्रति स्वप्रदर्शी बना हुआ था। यदि एक ओर गाँघी रामराज्य की कल्पना कर रहे थे तो दूसरी ओर रवीन्द्र विश्वमानस का सपना देख रहे थे। नए मानवीय मूल्यों की स्थापना, व्यक्ति स्वतंत्रता की घोषणा और आत्म प्रसार की ललकती कवियों के व्यक्तित्व को अनंत के प्रति जिज्ञासु बनाया।

 छायावादी कवियों में भी अधिकांश ने इस आध्यात्मिकता के माध्यम से ही अपने विद्रोह का स्वर ऊँचा किया है। निराला का “जागो फिर एक बार’, “राम की शक्ति पूजा, प्रसाद जी की ‘कामायिनी’ आदि रचनाएँ इसका प्रमाण है।छायावाद पर आध्यात्मवाद का आरोप उसकी रहस्य भावना के कारण ही लगाया गया है। इन कवियों में जो अज्ञात और असीम की अभिलाषा है। वह वस्तुतः ज्ञातसीमाओं के असंतोष से ही उत्पन्न हुई है और यह असंतोष तथा अभिलाषा केवलदिमागी इच्छा नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक आधार है। यह असंतोष और महत्त्वाकांक्षा उसमध्यवर्गीय व्यक्त की है जो मध्ययुगीन पारिवारिक और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर उन्मुख वातावरण में साँस लेने के लिए आकुल हो रहा था।

राष्ट्रीय आंदोलन के मुख्यधारा से अलग-अलग जितनी धाराएँ थी, उनका आरम्भ ही यहीं से होता था कि परिवर्तन तो ठीक है लेकिन आजादी के बाद क्‍या होगा इसकी तैयारी अभी से कर ली जाए। प्रामाणिक भारतीय मानस (जो उस समय मुख्यधारा था) का एक ही उत्तर था – इस तरह के प्रश्न इस भारतीय एकता को धक्का पहुँचाते हैं। हमें सिर्फ उसका स्वप्न देखना चाहिए और वेग से आकर्षित होना चाहिए। जैसा कि कहा गया आध्यात्मिक तत्ववाद में परिवर्तन एक बार ही घटित होता है और यह परिवर्तन छायावादी काव्य (निराला और पंत के यहाँ) में घटित हो चुका था। इसलिए उसके बाद यह आशा करना कि वह और परिवर्तन होकर यथार्थ के धरातल पर अवतरित हो संभव नहीं था। अतः कहा जा सकता है कि प्रसाद, प्रेमचंद (छायावाद) की युगभूमी द्वंद्व न होकर बल्कि संतुलन स्थापित करने का था।

हिन्दी साहित्य में मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती ने समस्त उत्तरी भारत को राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता के उच्च नाद से गूंजायमान कर दिया। सियारामशरण गुप्त का भी इस दिशा में कोई कम योगदान नहीं है। इसके अनंतर अविच्छिन्न रूप से यह धारा प्रवाहित हुई। उत्तरी भारत में उक्त दो धाराओं का परिचय मिलता है-उत्तरायण राष्ट्रीय सांस्कृतिक अभियान और दक्षिणायण राष्ट्रीय अभियान है पर जिनका मिलन बिन्दू एक ही था कि राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता। इस धारा का उद्देश्य था – पराधीनता की तमिसा से बुरी तरह से आवृत्त छटपटाती हुई भारतीय आत्मा को अपनी अविर्जेयता का बोध कराना। दक्षिणायण राष्ट्रीय सांस्कृतिक अभियान के उन्‍नायक महाकवि सुप्रमण्यं भारती है। भारत के लिए यह एक ऐसी सामाजिक सांस्कृतिक धरोहर है जिस पर हम सब भारतीयों को गर्व होना चाहिए। बालकृष्ण शर्मा “नवीन’ के कविता पर राष्ट्रीय आंदोलनों, सामाजिक घात-प्रतिघातों, दार्शनिक अनुभूतियों पर स्वच्छंदतावादी काव्य एवं प्रगतिवाद के अनेक प्रभाव पड़े हैं। किन्तु हिन्दी जगत में इनकी प्रतिष्ठा क्रांतिकारी कवि के नाते है। आरम्भ में इनके काव्य में छायावादी काव्य की जो प्रवृत्तियाँ उदबुद्ध हुई थी, वे यथेष्ट रूप में विकसित न हो सकी | इनकी ‘कुंकुम के गीत’ में राष्ट्रीयता, गाँधीवाद और प्रगतिवाद का प्रभाव स्पष्ट है। इनका व्यक्तित्व इन गीतों में राष्ट्रीयता के पथ पर अग्रसर होता हुआ दृष्टिगोचर होता है-

*मैं हूँ भारत के भविष्य का

मूर्तिमान विश्वास महान |

मैं हूँ अटल हिमालय सम थिर

मैं हूँ मूर्तिमान बलिदान |”

छायावाद का सम्पूर्ण रचना कर्म स्वतंत्रता के केन्द्रीय चिंतन में युक्त है। ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे’ वंदना परालौकिक अर्थों से भिन्न आधुनिक संदर्भ से संपृक्‍त है। “प्रिय स्वतंत्र रव अमृत यंत्र नव भारत में भर दे। काट अंध उर के बंधन स्तर बहा जननी ज्योतिर्मयी निर्झरा  निराला स्वाधीनता के अमृत मंत्र को पराधीन भारत में उद्धोषित करते हैं। ब्रिटिश सत्ता के नियंत्रण में भारत की मानसिक मुक्ति का यह रचनात्मक साध्य है। निराला बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी समाज की वैचारिक जड़ता को समाप्त करने से ही लौकिक मुक्ति संभव है। उन्होंने जाति, सम्प्रदाय, भाषा और अनेक अनर्थकारी समतावादी हठ ढांचे को तोड़कर स्वाधीनता के निर्जर बहाने के लिए माँ भारती की वंदना करते हैं। निराला परम्परा के गहरे बोध के कवि हैं। उन्होंने सांस्कृतिक धरातल पर तुलसीदास कविता में नवजागरण के मूल आशय स्वतंत्रता को अभिव्यक्त किया है।

“जागो जागो आया प्रभात भीती वह भीती अंध रात

झरना भूर ज्योतिर्मय प्रभात पूर्वों चल बांधों बांधों किरणें चेतन

तेजस्वी है हम जिज्यीवना आती भारत की ज्योतिर्धन महिमाबल”

यहाँ पराधीनता के अंधकार से स्वाधीनता का प्रभात है। जागरण का स्वर भारतेन्दु के प्रबोधनी शीर्षक कविता का आधुनिक संस्करण है। वहाँ भारतनाथ को जगाने की चेष्टा है यह भारत के महिमा, बल और सांस्कृतिक परम्परा के माध्यम से आत्मगौरव के प्रसार का प्रयत्न। लोकजागरण के दौर में तुलसी की कविता ने सामंती बंधनों को तोड़कर लोकमंगल का प्रकाश फैलाया था। नवजागरण के दौर में वही प्रकाश तुलसी की प्रेरणा से साम्राज्यवाद के बंधनों को झटककर स्वाधीन भारत के सूर्य के अवतरण का उत्सव बन जाता है। छायावादी काव्य स्वतंत्रता को दुर्भल केन्द्रीयता प्रधान करता है। आत्मीयता का यह माध्यम जनतांत्रिक भावों का सूचक है। जो अपनी अभिव्यक्ति के लिए सामाजिक स्वाधीनता की मांग करता है। पंत, निराला, प्रसाद महादेवी की कविताएँ जनतांत्रिक भावों के विजय की सूचक है। निराला लिखते हैं-मैंने मैं शैली अपनाई। यह मैं निराला के आत्मा से आगे अंपूर्ण भारतवासी का मैं है। व्यक्ति स्वतंत्रता से आत्मप्रसार की चेतना जागी। यह चेतना सम्पूर्ण संकीर्णताओं से मुक्त है। आत्मप्रसर के भावना ने कल्पना और रहस्य को नवीन ज्ञान से आलोकित किया। नारी का रीतिकालीन सौंदर्ययोध सहज सौंदर्य में बदला। नारी भोग्या नहीं वरन्‌ देवी, माँ, सहचरी, प्राण बन गई। प्रसाद की कामायनी में श्रद्धा रागात्मक वृत्ति की प्रतीक बन गई। वह मनुष्य को मंगल और श्रेय के पथ पर ले जाने वाली नारी है। निराशा और थके मनु को श्रद्धा प्रेरणा देती है- शक्तिशाली हो विजयी बनो विश्व में गूंज रहा जयगान।

वहीं दूसरी तरफ राम की शक्ति पूजा का नायक राम साधारण मनुष्य है। पराधीन भारत को निराला शक्ति संकल्प से दृढ़ करते हैं-शक्ति की करो मौलिक कप्लना। छायावादी युग में प्रकृति प्रेम, देशप्रेम का पर्याय बन जाता है। निर्झरिणी, बादल, पर्वत, नदियाँ सभी मुक्त प्रेम के प्रेरणा पुंज बन जाते हैं। निराला की मुक्त छंद की अवधारणा मनुष्य के मुक्ति के आशय से युक्त है। पंत ने पल्‍लव की भूमिका में ब्रज भाषा का विरोध और खड़ी बोली का समर्थन किया। यह चेतना जागरण की पुकार है।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को छायावादी साहित्यिक क्षेत्र के अग्रणी माना जाता है, तथापि उनका राष्ट्रवाद अनेक कविताओं में तेजस्वी रूप से मुखरित होता है। उनकी कविताओं में राष्ट्रवाद के अन्तर्गत, राष्ट्र को केवल एक राजनैतिक  इकाई न मानकर, एक सांस्कृतिक और सामाजिक उन्‍नयन की इकाई माना गया। राष्ट्र कोई भौतिकवादी तुच्छ अवधारणा नहीं है, यह एक सनातन धर्म है जो अपने आप को उत्तरोत्तर सँवारता और पुनः परिभाषित करता रहता है। गाँधीजी कास्वराज जहाँ एक ओर वैदिक संस्कृति से भारतीयता को जोड़ता नजर आता है, दूसरी ओर वह पश्चिम के उदारवादी मानवतावाद से भी करीब दिखता है। उस पर भक्ति संत कवियों जैसे तुलसी, ज्ञानेश्व,, कबीर आदि का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। निराला जब काव्य क्षेत्र में पदार्पण करते हैं तो राष्ट्रवाद के बिखरे और धुँधले बिंब मुखर हो उठते हैं। साम्राज्यवादी राष्ट्र की कल्पना और एक अपरिभाषितकितु निश्चित राष्ट्रवादी भावना, जो भारतीय अस्मिता की सदा से ही पोषक रही है,मिलकर राष्ट्र की एक अपेक्षाकृत सुदृढ़ अवधारणा को जन्म देती है। कुक॒रमुत्ता,चतुरी-चमार, व कुलीभाट जैसी रचनाओं में निराला समाजवाद के करीब लगते हैंतो तुलसी, शिवाजी का पत्र आदि कविताओं में वे हिंदू राष्ट्रवादी प्रतीत होते हैं।

छायावादी युग का सबसे विश्वसनीय विश्लेषण नामवर सिंह ने सामनेरखा। उन्होंने इस युग के विषय में लिखा है कि – ‘छायावाद इस राष्ट्रीय चेतना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी पीढ़ी से मुक्ति चाहता है और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।’ छायावाद की इस सर्वमान्य परिभाषा में दो चीजें उभरकर सामने आती है पहला छायावाद राष्ट्रीय जागरण काव्य और दूसरा पुरानी पीढ़ियों और विदेशी पराधीनता से मुक्ति पाने का काव्य, यही उसका मूल लक्ष्य है। इस तरह देखा जाये तो राष्ट्रीय जागरण और पुरानी पीढ़ियों और विदेशी पराधीनता से मुक्त स्वाधीन भारत की प्राप्ति आदि सभी नवजागरण की विशेषता है। छायावाद प्रमुख रूप से राष्ट्रीयता का काव्य है। छायावाद में राष्ट्रीयता की मूल प्रवृत्ति पर ध्यान देते हुए आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी जी ने लिखे है कि-‘खेद और आश्चर्य की बात है कि हमारे कतिपय समीक्षकों ने इस अत्यंत सीथी और सच्ची बातों को कभी समझने की चेष्टा नहीं की कि – हमारे इस युग के साहित्य की मुख्य प्रेरणा राष्ट्र और संस्कृति है तथा इससे भिन्‍न और कुछ हो भी नहीं सकती थी |

निष्कर्षत;: यह कह सकते हैं कि – छायावादी युग एक ऐसा कालखंड है जिसमें कविता विविध विषयों के साथ अवतरित हुई। जिस प्रकार रीतिकाल में रीतिबद्ध श्रृंगार कविता के साथ-साथ वीर रस प्रधान काव्य धारा का प्रवाह होता रहा, उसी प्रकार आधुनिक काल के इस चरण में राष्ट्रीय काव्यधारा छायावादी और वैयक्तिक कविता के समानांतर प्रवाहित रही। इसमें द्विवेदी युग के मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी आदि कुछ कवि तो कार्यरत रहे ही, और अन्य अनेक सशक्त कवियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इन कवियों में माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा “नवीन’ जगन्नाथ प्रसाद मिलिंद, सुभद्राकुमारी चौहाण, सोहन लाल द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, उदयशंकर भट्ट, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि प्रमुख है। इन कवियों की रचनाओं में राष्ट्रीयता का बहुत बड़ा हाथ रहा है और उनमें भाषा का परिष्कृत रूप भी मिलता है।

संदर्भ –

  1. शिवकाुमार शर्मा – हिन्दी साहित्य का इतिहास
  2. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला – राम की शक्ति पूजा
  3. जयशंकर प्रसाद – कामायनी
  4. बालकृष्ण शर्मा नवीन – छायावादी काव्य
  5. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला – तुलसीदास
  6. जयशंकर प्रसाद – चंद्रगुप्त

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