द्विवेदी युग प्रवर्त्तक : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी-डाॅ. मुकेश कुमार

बहुआयामी प्रतिभा के स्वामी पारगामी ऋतसम्भरा प्रज्ञा के अनुयायी, सरसंसत गुनग्राही महान विचारक, आदर्श व्यक्तित्व, महान संपादक आचार्य bमहावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने भाषा का परिष्कार किया और महान साहित्यकार, गद्य के महान शिरोमणि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने भाषा (हिन्दी) को संस्कार की भाषा बनाया। ‘सरस्वती पत्रिका’ के द्वारा आधुनिक खड़ी बोली की कविता को प्रतिष्ठा ही नहीं प्राप्त हुई, उसका आशातीत प्रचार भी हुआ। द्विवेदी जी इस बात के उत्सुक रहते थे कि अपने पाठकों को संसार में होने वाली नयी-नयी बातों से अवगत कराकर उनके ज्ञान को यथासंभव अद्यतन रखने का कार्य किया।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और सरस्वती पत्रिका

 किसी भी साहित्यकार के समग्र साहित्य का अवलोकन करने से पूर्व उनके व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त करना आवश्यक होता है। क्‍योंकि व्यक्तित्व की झांकी उसके साहित्य में किसी न किसी प्रकार से प्रतिबिंबित होती है। साहित्यकार के साहित्य में उनके विचार और व्यक्तित्व की प्रमुख भूमिका होती है। साहित्यकार एक संवेदनशील और सामाजिक प्राणी है। इसलिए समाज के सुख-दुः:ख, उत्थान-पतन आदि का अधिक प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ता है और वही उनके साहित्यकार के माध्यम से प्रतिबिंबित होता है। इसलिए वो कहते हैं कि “साहित्य और समाज एक सिक्‍के के दो पहलू हैं|” किसी साहित्यकार के साहित्य को पहचानने के लिए हमें उनके जीवन और परिवेश दोनों को जानना आवश्यक है।

द्विवेदी जी का व्यक्तित्व –

किसी साहित्यकार के व्यक्तित्व की व्याख्या सरल नहीं है। किसी का बाहरी व्यक्तित्व देखकर उनके आतंरिक व्यक्तित्व का अन्दाजा लगा देना कठिन है। अर्थात्‌ व्यक्तित्व जीवन की एक ऐसी इकाई है, जिसके आतंरिक और बाहय दो पक्षों में विभाजित नहीं किया जा सकता। परन्तु अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से उनके आकृति और प्रकृति, व्यवहार और स्वभाव अथवा चरित्र और शील के आधार पर अंतरंग और बहिरंग भेद किये जा सकते हैं। आकृति, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान, व्यवसाय-व्यवहार, ह्यस-परिहास, बोल-चाल आदि व्यक्तित्व के बाह्य उपकरण कहे जा सकते हैं। जबकि स्नेह सद्भाव, विविध मनोवृत्तियाँ और स्वभाव आदि व्यक्तित्व के आंतरिक उपकरण हैं। मन मानव पर व्यक्तित्व की जो छाप सम्पूर्ण रूप से पड़ती है वह प्रायः अभिभाज्य होती है।

द्विवेदी जी का जीवन परिचय –

बहुआयामी, प्रतिभा के स्वामी, पारगामी ऋतम्भरा प्रज्ञा के अनुयायी, कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभा के धनी, सरसंसत गुनग्राही, महान विचारक, कर्मण्ठ, ईमानदार, सच्चे साहित्यकार, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, महान संपादकत्व, ज्ञान के सागर, हिन्दी सेवक, भाषा चिंतक, महान शिरोमणि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन्‌ 1864 ई. में रायबरेली के दौलतपुर ग्राम में श्रीरामसहाय द्विवेदी जी के घर में हुआ। आप रेलवे विभाग में नौकरी करते थे। सन्‌ 1900 ई. में सरस्वती पत्रिका निकली और सन्‌ 1903 से 1920 तक सरस्वती

पत्रिका का सम्पादनत्व किया। 24 दिसम्बर सन्‌ 1938 ई. में आप प्रभु चरणों में दिवंगत हुए।

मौलिक काव्य ग्रंथ –

“देवी स्तुतिशतक, कान्यकुब्जावली वृत्तम, समाचार सम्पादकस्तव नागरी, कान्य कुब्ज अबला विलाप आदि। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रमुख कविताओं के शीर्षक इस प्रकार है-वलीवर्द, विधि विडम्बना, हे कविते, नागरी तेरी यह दशा, अयोध्या का विलाप आदि |”

शिक्षा –

वर्ष 1933 ई. में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अभिनन्दन का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर आचार्य द्विवेदी जी ने अपने उद्‌गार व्यक्त किए थे, उनमें उन्होंने अपने जीवन्त के अंतरंग प्रसंगों का उल्लेख किया था। उनके ये उदगार 1933 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में आत्म-निवेदन’ शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। उन्होंने शिक्षा सम्बन्धित अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए-

“मैं एक ऐसे देहाती का एकमात्र आत्मज हूँ, जिसका मासिक वेतनसिर्फ दस रुपए था। अपने गाँव के देहाती मदरसे में थोड़ी सी उर्दू और घर पर थोड़ी सी संस्कृत पढ़कर तेरह वर्ष की उम्र में मैं 36 मील दूर रायबरेली के जिला-स्कूल में अंग्रेजी पढ़ने गया। आटा-दाल घर से पीठ पर लादकर ले जाता था। दो आने महीने फीस देता था। दाल ही में आटे के पेड़े या टिकियाँ पकाकर पेट-पूजा करता था। रोटी बनाना तब मुझे आता ही न था। संस्कृत-भाषा उस समय, उस स्कूल में वैसी ही अछूत समझी गई थी, जैसी कि मद्रास के नंबूदरी ब्राह्मणों में वहाँ की शूद्र जाति समझी जाती है। विवश होकर अंग्रेजी के साथ फारसी पढ़ता था। एक वर्ष किसी तरह वहाँ कटा। फिर पुखा, फतेहपुर और उन्‍नाव के स्कूलों में चार वर्ष काटे। कौटुंबिक दुरव्यवस्था के कारण मैं उससे आगे न बढ़ सका। मेरी स्कूली शिक्षा की वहीं समाप्ति हो गई।*

सरस्वती पत्रिका के सम्पादन में आदर्श विचार –

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेजी जी ने “सरस्वती पत्रिका’ का सम्पादन बड़ी ईमानदारी से किया और अपने आदर्श विचारों को जीवन के अन्त समय तक निभाया। वे अपने आत्म-निवेदन में लिखते हैं-“सरस्वती’ के सम्पादन का भार उठाने पर मैंने अपने लिए कुछ आदर्श निश्चित किए। मैंने संकल्प किया कि ॥) वक्‍त की पाबन्दी करूँगा 2) मालिकों का विश्वास पात्र बनने की चेष्टा करूँगा, 3) अपने हानि-लाभ की परवाह न करके पाठकों के हानि-लाभ का सदा ख्याल रखूँगा और 4) न्याय पथ से कभी न विचलित होऊँगा।”

सरस्वती पत्रिका –

हिन्दी भाषा के परिमार्जन, परिवर्द्धन/ और विकास में “सरस्वती’पत्रिका की अप्रतिम भूमिका रही है। सन्‌ 1899 ई. में इंडियन प्रेस’ के स्वामीबाबू चिन्तामणि घोष ने नागरी प्रचारिणी सभा, काशी में एक प्रस्ताव किया किसभा एक मासिक पत्रिका प्रकाशित करे।

चिंतामणि घोष जी ने स्वयं अपने मित्रों की सलाह से इस प्रस्तावितमासिक पत्रिका का नाम सरस्वती” रखा। पहली जनवरी सन्‌ 1900 ई. में बाबूचिन्तामणि घोष ने हिन्दी में “सरस्वती” नामक सचित्र सुन्दर मासिक पत्रिकानिकाल कर उसे देश की राष्ट्रभाषा’ के मार्ग पर प्रशस्त करने का महान्‌ कार्यकिया।

“पहली जनवरी 4900 ई. को ‘सरस्वती’ का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ। इसका अवरण इकरंग था। इसके चारों कोनों पर हिन्दी के चार प्रमुख रत्नों के छोटे रेखाचित्र दिए गए थे। आरम्भ में आर्ट पेपर पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का चित्र था|”

सरस्वती की नीति और उद्देश्य के सम्बन्ध में प्रकाशक की ओर को यह महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रकाशित किया गा था।

“परम कारूणिक सर्वशक्तिमान जगीदश्वर की अशेष अनुकम्पा से ही ऐसा अनुपम अवसर प्राप्त हुआ है कि आज हम लोग हिन्दी भाषा के रसिकजनों की सेवा में नये उत्साह से उत्साहित हो एक नवीन उपहार लेकर उपस्थित हुए हैं जिसका नाम “सरस्वती है।*

स्वामी बाबू चिन्तामणि घोष ने नागरी प्रचारिणी सभा से प्रस्तावकिया कि सभा ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार ले और उसे वे प्रकाशित करें। सभा ने इसका अनुमोदन किया पर सम्पादन का भार लेने में अपनी असमर्थता प्रकट की।

“अन्त में यह निश्चय किया कि सभा एक सम्पादक मण्डल बना दो। सभा ने इसे स्वीकार किया। सम्पादक मण्डल में कुल पाँच लोग थे। बाबू राघा कृष्णदास, बाबू कार्तिक प्रसाद, बाबू जगन्नदास, पंडित किशोरी लाल गोस्वामी तथा बाबू श्यामसुन्दरदास थे” यह एक पंचायती सम्पादक मण्डल था। पंचायती काम काफी कुछ “अपनी ढपली अपना राग’ की तरह होता है। किन्तु चिन्तामणि बाबू को हिन्दी मासिक पत्र निकालने का इतना उत्साह था कि उन्होंने इस सम्पादक मण्डल को स्वीकार कर लिया।

सम्पादन का कार्य काशी में होता था और सारी लिखा-पढ़ी सम्पादक मण्डल की ओर से बाबू श्यामसुंदरदास ही किया करते थे। सम्पादन कार्य के व्यय के लिए प्रेस 20 रुपए (बीस) देता था जो डाक व्यय आदि में खर्च होता था। इसका हिसाब प्रतिमाह प्रेस को भेज दिया जाता था।

जनवरी 1902 से बाबू श्याम सुंदरदास उसके एकमात्र सम्पादक हो गए। किनतु यह कार्य अवैतनिक था। बाबू साहब को इतना अवकाश नहीं था कि इस भाव को बहुत दिनों तक चला सके। अतएव उन्होंने 1902 के अन्त में भार से मुक्त होने के लिए लिख दिया।

बाबू श्याम सुंदरदास ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-“मेरे अलग होने का कारण समय का अभाव और मेरी आर्थिक कृच्छता थी।* बाबू श्यामसुंदरदास का त्याग पत्र पाने पर बाबू चिन्तामणि घोष ने बहुत सोच-विचार कर पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी से सरस्वती का वैतनिक सम्पादन होने का प्रस्ताव किया। आचार्य द्विवेदी जी ने जनवरी 4903 से ‘सरस्वती’ का सम्पादन आरम्भ किया।

प्रथम तीन वर्षों में ही ‘सरस्वती’ ने हिन्दी संसार में अपना स्थान बना लिया था। उस समय यह हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मानी जाने लगी थी। लेखों की उपादेयता स्वीकार की जा चुकी थी। द्विवेदी जी के सम्पादन में सरस्वती ने हिन्दी पत्रकारिता जगत्‌ में ही नहीं, अपितु अहिन्दी क्षेत्रों में भी सम्मान प्राप्त किया और वह हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका मानी जाने लगी। किन्तु आरम्भ में द्विवेदी जी को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे स्वभाव से बड़े खरे थे। वे स्पष्ट बात कहने में या साहित्यिक दोष की आलोचना करने में कभी मुरब्बत नहीं करते थे। इसके साथ ही उनमें आत्माभिमान की मात्रा भी औसत से कुछ अधिक थी। इस वजह से उनके समकालीन लोगों का व्यवहार भी उनके साथ बहुत अच्छा नहीं था। द्विवेदी जी में गम्भीरता की भी मात्रा अधिक थी। यह एक गुण भी था। क्‍योंकि वे प्रत्येक उत्तदायित्व को बड़ी गम्भीरता से ग्रहण करते थे। किन्तु उनके समकालीन लोग उस गम्भीरता कालोकप्रिय नहीं थे और जब उन्होंने सम्पादन कार्य लिया तब सरस्वती के पुराने लेखको ने उसमें लेख भेजना प्रायः बन्द कर दिया |

धीरे-धीरे द्विवेदी जी ने सरस्वती के लेखकों का एक मण्डल बना लिया जिसमें विविध विषयों के विशेषण थे। किन्तु वे नयी-नयी प्रतिभाओं की खोज में रहते और प्रसिद्ध व्यक्तियों से सरस्वती में लिखने के लिए आग्रह करते। द्विवेदी जी के ‘सरस्वती’ के पहले भाषा में एकरूपता नहीं थी, व्याकरण के मामलों में बड़ी शिथिलता थी। द्विवेदी जी की ‘सरस्वती’ ने भाषा का परिष्कार का बड़ा काम किया। द्विवेदी जी ने इसका कड़ाई से पालन किया। उनका प्रभाव ऐसा था और “सरस्वती” की पाक इतनी थी कि उन्होंने एक मानक भाषा के रूप में हिन्दी को स्थापित किया।

 “आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी उन थोड़े से लोगों में एक थे, जिन्होंने साहित्य जगत्‌ में न केवल एक रचनात्मक और वैचारिक आन्दोलन चलाया, बल्कि उन्होंने एक नई मानक भाषा को निर्मित किया। यही कारण था कि द्विवेदी जी रेलवे की सरकारी नौकरी छोड़कर “’सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक बने। आचार्य द्विवेदी जी ने हिन्दी भाषा के परिभार्जन, परिवर्द्धा और विकास के लिए जिस दक्षता से 1903 से 1920 तक ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन किया, उसके कारण वह कालखण्ड ही द्विवेदी युग” के नाम से जाना जाता है। आचार्य द्विवेदी जी एक प्रबुद्ध आलोचक भी थे। उन्होंने सर्जनात्मक आलोचना के नये प्रतिमान बनाये। उन्होंने मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन की नयी मीमांसा की, जोतात्त्विक और मौलिक थी। ‘सरस्वती’ पत्रिका केमाध्यम से द्विवेदी जी ने एक नई मानक भाषा निर्मित किया।”

“सरस्वती” पत्रिका में जहाँ द्विवेदी जी ने नेहरू तक के लेख को अस्वीकृत कर दिया था, वहीं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ की कविता “जूही की कली’, 1946 लौटा दी थी। जो लौटाये जाने पर भी चर्चित हुई। इस तरह की सम्पादकीय प्रतिबद्धता आज नहीं दिखाई पड़ती। “सरस्वती” पत्रिका प्रयाग के जिस “इण्डियन प्रेस’ से प्रकाशित होती थी, उसके मालिक बाबू चिंतामणि घोष ने कभी द्विवेदी जी के सम्पादन में हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि आज के मालिक खुद ही सम्पादक बन बैठे हैं। द्विवेदी युग हिन्दी साहित्य जगत में एक स्वर्णिम युग था। उस समय की महत्त्वपूर्ण रचनाएँ जो बाद में कालजयी सिद्ध हुई वह “सरस्वती” पत्रिका में ही छपी। चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ जी ने 65 पृष्ठों की एक किस्त भेजी। द्विवेदी जी ने उसको पढ़ा और कांट-छांट करके लाल स्याही से केवल +१5 पृष्ठों की एक कहानी का रूप दिया “उसने कहा था’ 1945 ई. में प्रकाशित कहानी से ही “गुलेरी’ जी अमर हो गए। जयशंकर प्रसाद जो छायावाद के प्रवर्तक थे, उनका चर्चित महाकाव्य “कामायनी’ के कई सर्ग ‘सरस्वती’ में ही छपे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का चर्चित निबन्ध “कविता क्‍या है! ? सरस्वती में प्रकाशित हुए। सरदार पूर्ण सिंह के निबन्ध व प्रेमचन्द की कहानियाँ जो बाद में कालजयी सिद्ध हुई, वह भी “सरस्वती में प्रकाशित हुए।

सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला जी ने सरस्वती के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा-“जिसकी हिन्दी के प्रकाश से प्रथम परिचय के समय में आँखें नहीं मिला सका-लजाकर हिन्दी शिक्षा के संकल्प से कूछ दिनों बाद देश से विदेश, पिता के पास चला गया था और हिन्दी प्रांत में बिना शिक्षक के सरस्वती की प्रतियाँ लेकर पद साधना की और हिन्दी सीखी थी।”

द्विवेदी जी एक पत्र में लिखते हैं, “मेरा विश्वास है कि जन समुदाय की हित-चिन्तना से मेरा भला हो सकता है और परमात्मा मुझे अपनी दया का पात्र बना सकता है, क्‍योंकि आत्मरूप में वही घट-घट में प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराज रहा है। बस मेरी यही अन्तिम प्रार्थना है। अच्छा तो अब मैं विदा लेता हूँ”

द्विवेदी जी ने सेवा निवृत्ति के बाद द्विवेदी जी की इच्छानुसार बाबू पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी ‘सरस्वती’ के प्रधान सम्पादक बनाये गए। बख्शी जी के बाद पं. देवीदत्त शुक्ल जी ने कई वर्षों तक सम्पादन किया। फिर निशीथ कुमार राय ने सम्पादन का कार्य किया। आर्थिक संकटों की वजह से मई 1982 ई. के बाद सरस्वती का कोई अंक न निकल सका। इसके अन्तिम सम्पादक निशीथ कुमार राय थे।

संदर्भ –

  1. डॉ. रामचन्द्र तिवारी, हिन्दी का गद्य साहित्य, पृष्ठ संख्या 608
  2. डॉ. बच्चन सिंह, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, पृष्ठ संख्या 344
  3. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, सरस्वती पत्रिका-4933, पृष्ठ संख्या 22
  4. वही, पृष्ठ संख्या 23
  5. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, हिन्दी की विकास यात्रा, पृष्ठ संख्या 482
  6. वही, पृष्ठ संख्या 482
  7. आचार्य श्री नारायण चतुर्वेदी, सरस्वती हीरक जयन्ती समारोह 963,
  8. पृष्ठ संख्या 449
  9. बाबू श्यामसुंदरदास आत्मकथा, पृष्ठ प्रथम ।
  10. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, हिन्दी की विकास यात्रा, विवेक सत्यांशु के
  11. संदर्भ में, पृष्ठ संख्या 285
  12. वही, पृष्ठ संख्या 287

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *