पंडित सोहनलाल द्विवेदी के काय्य में राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक जागरण-डाॅ. मुकेश कुमार

संस्कृति मानव जीवन को संस्कार प्रदान करने वाली एक निरन्तर प्रक्रिया है। वह एक ऐसी चेतना है जो जीवन के समस्त व्यापारों एवं गतिविधियों में अन्तःसलिला की तरह प्रवाहमान रहती है। वह मानव को एक विशिष्ट जीवन-दृष्टि प्रदान करती हुई व्यक्तिगत एवं समाजगत नैतिक जीवन-मूल्यों व आदर्शों की ओर अग्रसर करती है। इसी प्रकार से भारतीय संस्कृति विश्व की अन्य संस्कृतियों की तुलना में अपना विशिष्ट महत्त्व रखती है। वह मानव-प्रेम एवं करूणा पर आधारित लोकमंगल के उदात्त तत्त्व को सँजोये हुए है। डॉ. विजयदत्त शर्मा के अनुसार, “भारतीय संस्कृति ऋणमूलक संस्कृति है अर्थात्‌ भारतीय समाज की एक अभिन्‍न पहचान है। उसे जो भी जो कुछ भी देता है वह उसके प्रति कृतज्ञता का भाव इतना रखता है कि उसे देवता मानकर उसकी उपासना, सेवा, सुरक्षा करता है । इसका जीवन्त प्रमाण है कि हमने 84 करोड़ देवी-देवता माने हैं। किसी भी अज्ञात शक्ति के मानसिक वैचारिक अवदान के प्रति भारतीय कृतज्ञता की अनुभूति रखता है| यह कृतज्ञता ही नहीं हमारी सहिष्णुता एवं गुणात्मकता भी है।”

साहित्य जीवन-मूल्यों एवं आदर्शों का चित्रण करता है| जीवन-मूल्य युग सापेक्ष होते हैं तथा साहित्य मूल्य ऐसे भी होते हैं, जिन्हें जन जीवन का युगों तक विश्वास प्राप्त होता है। वे चिरस्थायी आदर्शों के रूप में शाश्वत कहे जाते हैं। निःस्वार्थ मानव-प्रेम, करूणा, नैतिकता, निःस्वार्थ त्याग एवं बलिदान की भावना, आत्म-संयम आदि ऐसे ही शाश्वत मूल्य हैं जो युगीन सीमाओं का अतिक्रमण कर मानव समाज के व्यावहारिक जीवन में आदर प्राप्त करते रहते हैं।

राष्ट्रीय-जागरण का शंखनाद करने वाले महान राष्ट्रीय भक्त कवि पंडित सोहन लाल द्विवेदी जी ने भी सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों की पुन: प्रतिष्ठा के उक्त प्रवाह में यथोचित योगदान देने का प्रयास किया है।

पंडित सोहन लाल द्विवेदी ने “वासवदत्ता’, ‘कुणाल और विषपान नामक सांस्कृतिक रचनाओं के अन्तर्गत चित्रित चरित्रों-नायिकों का वैयक्तिक जीवन ऐसी ही उदात्त चारित्रिक विशेषताओं से सम्पन्न है। वासवदत्ता उपाख्यान में चित्रित तथागत का चरित्र अतुलनीय ऊँचाई तक उठाया गया है। वह सांस्कृतिक दृष्टि से नैतिक-जीवन की प्रतिष्ठा का द्योतक है-

“गौतक यह देखकर

माया सब लेखकर,

चकित-से विस्मित-से, भ्रमित-से, अवाक–से,

लगे देखने सभी लीला वासवदत्ता की,

शांत हो बोले साधु

देवी, क्या कहता हो ?

सावधान होकर जरा सोचो तो

क्या कहती ?

किससे फिर

आज मैं अतिथि नहीं बनूँगा इस गृह में”?

बड़े-बड़े चक्रवर्तियों को भी क्षुब्ध करने वाला उसका यौवन-रूप तथागत को नहीं विचलित कर पाता | उसके रूप-यौवन के आकर्षण का चित्रण खींचते हुए द्विवेदी जी कहते हैं-

“यौवन यह, रूप, जिसे प्राप्त करने को,

यती यत्न करते, तपी तापते पंचाग्नि नित्य ।

बड़े-बड़े चक्रवर्ति मुकुट विसर्जित कर,

चाहते अधर का दान, चाहते भूकुूटि का दान ||”

‘उर्वशी’ एवं ‘तिष्यरक्षित’ के व्यवहार से वासवदत्ता की-सी चरित्रगता उदात्तता की अनुभूति नहीं होती । इन दोनों की प्रति घृणा एवं तिरस्कार का भाव उदित होता है। ऐसी घृणित एवं विपरीत स्थिति में भी ‘अर्जुन’ तथा ‘कुणाल’ दोनों चरित्र नायक अप्रोध, सहिष्णुता एवं आत्मसंयम जैसे उदात्त वैयक्ति गुणों रूपी मुक्तमणियों से वे विभूषित न होते और केवल विविध-निषेध युक्‍त मर्यादा के सामने लक्ष्मण रेखाओं का अतिक्रमण वार देने वाली उर्वशी एवं तिष्यरक्षिता का या तो स्वयं भी मर्यादाओं का अतिक्रमण कर प्रणय-निवेदन सहर्ष स्वीकार कर लेते और क्षणिक ऐन्द्रिय लाभ उठा लेते अथवा कम से कम अनुचित एवं अनैतिक व्यवहार करने वाली उन कामांध दोनों नायिकाओं के प्रति प्रतिशोधात्मक व्यवहार करते हुए उन्हें यथोचित दंड देते। वह आत्मग्लानी पश्चाताप व्यक्त करते हुए वह कहती है-

“क्षमा माँगू कैसे मैं आज?

किया मैंने हा, कितना पाप?

देव दुर्लभ सुत को पा गोद,

दिया था मैंने इनको शाप।

क्यों न यह धरा हुई सी खंड

उसी में धँस मैं होती चूर्ण,

आह। विधि ने मेरे ही ब्याज,

कौन सी इच्छा की निज पूर्ण।

बढ़ी जब तिष्य लगाने अंक,

झुके पदतल कांचना कुणाल,

वह उठी नयनों से जलधारा,

न रानी निज को सकी सँभाल।

कह चिरजीवी देवी। देव

क्षमा दो मुझ पापिन को आज ४

यहाँ कवि का यह अभिप्रेत है कि अहिंसात्मक एवं क्षमाशील व्यवहार के द्वारा निर्दय एवं कठोरतम व्यक्ति का भी हृदय-परिवर्तन कराया जा सकता है तथा उसमें देवत्व जागृत कराया जा सकता है। कुणाल के व्याख्यान के द्वारा राष्ट्रीय पुनर्जागरण के युग में गाँधीवादी चिंतन प्रणाली के आधार पर कठोरतम व्यक्ति के हृदय-परिवर्तन कराने की प्रक्रिया की ओर कवि संकेत करता है। वस्तुतः कुणाली का चरित्र उदात्त चरित्र है जो क्षमा, धृति, परोपकार, अहिंसा तथा सर्वस्व परित्याग करने की शुभकामनाओं से परिपुष्ट जीवन दृष्टि लिए हुए है।

राष्ट्र कवि सोहनलाल द्विवेदी जी भी राष्ट्र के लिए त्याग की बलवती भावना से प्रेरित होकर काव्य-साधना में संलग्न रहे हैं। उनकी राष्ट्रीय रचनाओं के अतिरिक्त सांस्कृतिक रचनाओं में भी यह भावना सर्वत्र परिलक्षित होती है। त्याग एवं प्रेम भारतीय संस्कृति के दो आधार बिन्दु हैं। मानव मात्र के प्रति प्रेम व्यक्ति में करूणा उत्पन्न करता है। किसी भी व्यक्ति का कष्ट उसके लिए असहाय बन जाता है। ‘वासवदत्ता’ रचना में सरदार चूड़ावत ‘एक बूँद, कर्ण और कुन्ती’ जैसे आख्यानों में तथा ‘विषपान’ जैसी रचना में भी विषम परिस्थितियों में ग्रस्त समाज व राष्ट्र के लिए उत्कट त्याग भावना दृष्टिगोचर होती है। संकटग्रस्त मातृभूमि की सुरक्षा के लिए युद्ध का संचालन करने वाले वीर सरदार चूड़ावत अपनी नवविवाहित पत्नी, जिसके साथ मधुर क्षणों का विषय सुख भी प्राप्त नहीं किया है | तभी वीरांगना पत्नी स्वयं अपने कर्त्तव्य-कर्म उत्कृष्ट त्याग-भावना का प्रमाण प्रस्तुत करती है-

उस क्षत्राणी ने,

निज शिर को किया छित्र,

धड़ से उसे किया भिन्‍न,

दिया उसे हाथ में

अनुचर के साथ में,

सो गई परिणय की इस सुहागरात में,

सो गई मिलन के विरह प्रभात में |

वह पत्नी का विच्छित्र मस्तक देखकर चूड़ावत के शरीर में मानो विद्युत प्रवाह का-सा वीरत्व उत्पन्न हो गया और पत्नी के छिन्‍न मस्तक को माला की भाँति कण्ठ में धारण कर सोत्साह वह युद्ध के लिए निकल पड़ता है-

“वीर सरदार चूड़ावत छिन्‍न शिर हेर,

समझ गए सभी, किया पल भर कहीं न देर

रूद्र के समान, शीश कण्ठ में मालाकर

चला युद्ध करने, क्रुद्ध कर में भालाकर,

जाता जिस ओर, प्रलय घटा बन छाता उधर,

पाट-पाट भूमि, लक्ष-लक्ष नर मुण्डों से,

कोटि मुंडमाल रणचण्डी के चरणों में,

अर्पित समर्पित कर बना वह अजेय, नित्य गेय ||”

सच्चा प्रेम शरीर की नहीं आत्मा की शाश्वत तीव्र विरहानुभूमि में परिणत होता है। यहाँ उदात्त जीवन दृष्टि के कारण त्याग की अग्नि में जलकर क्षत्राणी का प्रणय स्वर्णवत्‌ विशुद्ध एवं पुनीत हो गया। प्रेम चाहे पारिवारिक हो अथवा समाज व राष्ट्र से सम्बन्धित त्याग ही उसे दिव्यता की परिसीमा तक पहुँचाता है। ऐसे ही दिव्य प्रेम की उपासना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। ‘एक बूँद” आख्यान भी त्याग सर्वोत्कृष्ट हैं क्योंकि सर्वप्रथम उसी ने त्याग किया और वही उसके लिए प्रेरणास्त्रोत बनी रही है। जीवनगत उदात्त दृष्टि ‘उर्वशी’ एवं ‘कुणाल’ आख्थानों में भी पार्थ तथा कुणाल के व्यवहार के द्वारा दिखाई गई है। उर्वशी के अभिशाप देने पर भी उसकी मंगलकामना करता हुआ पार्थ कहता है-

माँ शिरोधार्य शाप यह।

आप नित्य नंदन में सुख से विहार

अमर कीर्ति बनकर युग-युग विस्तार करें।।”

सम्राट अशोक अपनी प्रेयसी विष्यरक्षिता के घृणित कृत्य अपनी अत्यधिक क्रुद्ध होकर जब उसे मृत्युदण्ड देने के लिए उदात हो जाते हैं, तब अपने उदात्त चिंतन को प्रदर्शित करते हुए कुणाल पिता अशोक के चरणों में गिरकर माँ के प्राणों की भीख माँगते हैं और यदि वे माँ को जीवनदान नहीं दे सकते तो सर्वप्रथम अपने पुत्र कुणाल के प्राणों की आहुति स्वीकार करने की प्रार्थना भी करता है-

“महाराजा प्रथम हमारा

शीश कर लो छिन्‍्न

फिर, जननि का शीश होगा,

कण्ठ से विच्छिन्न

कण्ठ से विच्छिन्न |

या विनीत भिखारियों को

आज दो यह दान,

राजमाता को करो, या

आज क्षमा प्रदान।।”

मानव समाज की जाति-पॉति, ऊँच-नीच, धनी-गरीब आदि विशेदक रेखाओं को भूलकर निःस्वार्थ से ही मनुष्य का परम धर्म और कर्त्तव्य है। इसी प्रकार से “विषयान’ खण्डकाव्य का प्रणयन भी इसी भावना से ही हुआ है। प्रलयकारी शंकर आज सृष्टि अस्तित्व का ‘संरक्षण करने के लिए लोकमंगलकारी महान उद्देश्य से प्रेरित होकर समुद्रमंथन करते हुए अन्य रत्नों के साथ-साथ प्रलयकारी विष की उत्पत्ति तथा लोक कल्याण के निमित्त शिव को, सच्चे समाज सुधारक अत्यन्त निष्ठा के साथ सेवा कार्य में निरंतर रत रहना चाहिए ।

“तुम-सा प्रकर निज अधिनायक,

फिर मथे सिन्धु, हो अमृत पान।

हो सफल साधना का विधान |॥”*

पंडित सोहन लाल द्विवेदी ने अपने समस्त काव्य में उदात्त जीवन मूल्यों को प्रसंगानुसार व्यक्त किया है। स्वयं एक साधक होने पर वे स्वस्थ समाज निर्माण में वैयक्तिक उदात्त मूल्यों को महत्त्व प्रदान करते रहे।

उनकी सांस्कृतियों कृतियों में प्रायः सभी चरित्र नायक आवश्यक वैयक्तिक मूल्यों से सुसम्पन्न हैं| ‘युगधार’ के अन्तर्गत हमको’ ऐसे युवक चाहिए’ शीर्षक कविता में ऐसे ही आत्मसंयम को अभिव्यक्ति मिली है-

“ब्रह्मचर्य से मुख मंडल पर,

चमक रहा हो पेज अपरिमित |

जिनका हो सुगठित शरीर,

दृढ़ भुज दंडों में बल शोभित।

इस विलास के रहे न लोलुप,

जिनमें हो विराग वैभव का,

अतुत त्याग को छिपा देशहित,

जिन्हें गर्व हो निज गौरव का।

सदा सत्य-पथ के अनुयायी,

जिन्हें सत्य-पथ मन में भय हो।

दुर्बल के बल बनने के हित,

जिनमें शाश्वत भाव उदय हो ||” ऐसे ही आत्म संयम को “सत्यग्राह्दी’ शीर्षक कविता में भी देखा जा सकता है। ऐसा आत्मसंयमी सेनानी वैभव-विलासपूर्ण जीवन का परित्याग करता है। सादगी जीवन जीना पंसद करता है-

“तरूण! विश्व की बागडोर ले,

तू अपने कठोर कर में।

स्थापित कर रे मानवता,

बर्षर नृशंसा जग के डर में | [7

गांधीवादी सत्याग्रह हमेशा आत्मबल पर विश्वास करके ही हिंसावादी पशुबल पर विजय प्राप्त करता रहा है। आत्मबल पर विश्वास प्राय: कवि की समस्त राष्ट्रीय रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है-

“आज आत्मबल ऊपर उठता,

पशु बल पद-तल पर झुक आया।

आज जागरण है स्वदेश में

पलट रही है अपनी काया ||”

सामाजिक जीवन-दृष्टि के अन्तर्गत नैतिकता और जीवनगत उदात्तता में ‘वासवदत्ता,, ‘कुणाल’, तथा ‘विषपान’ के प्रायः सभी चरित्र नैतिकता से परिपूर्ण है। सामाजिक-जीवन में चरित्र गठन को महत्त्व प्रदान किया गया है। ब्रिटिश शासकों की कूटनीति के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आन्दोलन के युग में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक वैमनस्य की दृष्टि विकसित हो रही थी राष्ट्र की अखण्डता के लिए इस दिशा में प्रयास आवश्यक था-

फिर लड़ते हो क्‍यों आपस में,

कैसा बैर भरा नस-नस में,

तुम हो किस मानव के वश में,

यह षडयन्त्र सिखाया किसने,

तुम उनको जानो!

हिन्दू-मुस्लिम, सिक्‍्ख, ईसाई,

क्या न सभी है, भाई-भाई |

जन्म-भूमि है सबकी माई,

क्यों न कोटि काण्ठों से मिला।

फिर जय वितान तानो,

यह हठ और न ठानो।॥॥*

मानवीय-साम्य के उदात्त मूल्य के आधार पर युगीन आवश्यकतानुसार हरिजनोंद्वार का राष्ट्रीय कार्य परम आवश्यक समझा जानेलगा था। स्वस्थ समाज निर्माण के लिए समाज के उक्त वर्ग के सम्यक उत्कर्ष एवं उसका सामाजिक महत्त्व बढ़ाने के लिए गाँधी जी ने हरिजनोद्वार का राष्ट्रीय कार्य प्रारम्भ किया-

“खोलो मन्दिर-द्वार पुजारी,

मत ठुकराओ, चरण धूलि।

लूँ बार-बार जाऊँ बलिहारी,

सच मानो, तुमको न कभी मैं।

भूलूँगा, मेरे उपकारी,

प्रभु की सुधि के साथ-साथ |

आएगी प्रतिदिन याद तुम्हारी।

खोलो मन्दिर-द्वार पुजारी ||“

निष्कर्षत:

द्विवेदी जी के काव्य में स्वतन्त्रता प्राप्ति, राष्ट्रीयता, सत्याग्रह, साधन-शुद्धि आदि राजनीतिक जीवन मूल्यों का समावेश मिलता है।

संदर्भ-संकेत :

  1. डॉ. विजयदत्त शर्मा, सप्तसिंधु, राष्ट्रीयता विशेषांक, पृष्ठ संख्या सम्पादकीय
  2. पंडित सोहनलाल द्विवेदी-वासवदत्ता, पृष्ठ 3
  3. वही, 3
  4. वही, उर्वशी, आख्यान, पृष्ठ 28
  5. वही, कुणाल खण्डकाव्य, पृष्ठ 427
  6. वही, पृष्ठ 45
  7. वही, पृष्ठ 2
  8. वही, पृष्ठ 45
  9. वही, पृष्ठ 22
  10. वही, युगधार, पृष्ठ 42
  11. वही, भेरवी, पृष्ठ 73
  12. वही, युगधार, पृष्ठ 56
  13. वही, पूजागीत, पृष्ठ 92वही, हरिजनों के गीत, पृष्ठ 93

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