पं. श्यामनारायण पाण्डेय के काव्य में राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक जागरण-डाॅ. मुकेश कुमार

बहु आयामी प्रतिभा के स्वामी पारगामी ऋतसम्भरा प्रज्ञा के अनुयायी कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभा के धनी सरस संत गुनग्राही, भारत जननी के सपूत, राष्ट्र भक्त, वीर रस के मूर्घन्य कवि पं. श्यामनारायण पाण्डेय का राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक काव्यधारा में उदात्त स्थान है।

राष्ट्रीय और संस्कृति एक दूसरे की पूरक है। संस्कृति की सम्यक्‌ समझ से ही राष्ट्रीयता की भावना प्रबल होती है। आधुनिक तथा कथित राष्ट्रवादी बिना संस्कृति के ज्ञान से स्वयं को स्वयंभू राष्ट्र निर्माता घोषित करने लगे हैं जो कि बिना श्वास का शरीर ही कहा जा सकता है। वस्तुतः राष्ट्रीयता का चर्मोत्कर्ष ही राष्ट्र प्रेम की श्रेणी है। राष्ट्र प्रेम एवं संस्कृति स्नेह का सच्चा पाठ उच्चकोटि का साहित्य ही सिखाना है। भारतीय उत्कृष्ट साहित्यके सुष्टा ऋषि, महर्षि इस सोपान के निर्माता हैं| अतः भारतीय साहित्य की मूर्डामणि वेद ब्राह्मण, आख्यक उपनिषद, दर्शनशास्त्र, रामायण, महाभारत, पुराण एवं स्मृति शास्त्रादि का गहन अध्ययन ही भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रीयता का परिचायक है। पं. माखनलाल चतुर्वेदी को तो राष्ट्रकवि नाम से ही सम्बोधित किया जाता है। उनकी काव्य रचना से स्वतंत्रता आन्दोलन में जितनी सक्रिया, प्रेरणा और शक्ति मिलती है, उतनी ही उनके व्यक्तिगत त्याग एवं स्वार्थ, अदम्य साहस और हँसते हँसते जेलमाणा स्वीकार करने से भी मिलती है। उनके व्यक्तित्व और रचनाओं का सारे देश के युवा वर्ग पर गहरा प्रभाव पड़ा। मातृभूमि के लिए बलिदान करने वालों के प्रति राष्ट्रप्रेमे कवि की अभिलाषा देखिए जो इस प्रकार है-

मुझे तोड़ लेना वनमाली, इस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृ भूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ पर जावें वीर अनेक ||”

राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने कविता में आदर्शवादी और नीतिवाद पर बल दिया जो इस प्रकार है –

“केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए,

उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।।”

पं. श्यामनारायण पाण्डेय का काव्य विषयक दृष्टिकोण भारतीयों का राष्ट्र प्रेम, जातीय गौरव, संस्कृति रक्षा, लोकमंगल, मानवता, रीति-नीति-भक्ति, त्याग, सदाचार, धर्म-कर्म-शील-शक्ति-सौन्दर्यनिष्ठता तथा पर धर्म सहिष्णुता का महान संदेश पहुँचाना है। अपने काव्य में उन्होंने समष्टि के लिए व्यक्ति बलिदान, अलत का तिरस्कार कर सट की स्थापना, स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ की श्रेष्ठता, नारी के प्रति उदात्त भावना, अन्यायी और अत्याचारी के विरुद्ध युद्ध आदि की आवश्यकता प्रतिपादित की है। उन्होंने अपने प्रत्येक कृति में राष्ट्र और संस्कृति के लिए कार्य करने का, स्वतन्त्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का आह्वान किया है-

“स्वतन्त्रता के लिए मरो, राणा ने पाठ पढ़ाया था,

इसी वेदिका पर वीरों ने, अपना शीश चढ़ाया था।

तुम भी तो उनके वंशज हो, काम करो, कुछ नाम करो।।”

राष्ट्रकवि पं. श्यामनारायण पाण्डेय जी के हृदय में जन्मभूमि के प्रति अगाध श्रद्धा का वास है। उनका राष्ट्र प्रेम किसी प्रकार की दलीय,प्रादेशिक, धार्मिक, जातिगत संकीर्णता से सम्बन्ध न होकर पूर्णतः राष्ट्रीय चेतनापर प्रतिष्ठित है। राष्ट्रीय सांस्कृतिक विचारधारा में मातृ-पितृ देश प्रेम को अधिक महत्त्व दिया गया है। माता जीजाबाई अपने शूरवीर पुत्र शिवाजी से कहती है-

“बेटा मुझसे पहले रखना,

जन्मभूमि का ध्यान

बेटा मुझको पहले करना

संस्कृति का सम्मान।॥”

हर मानव के हृदय में मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम समाया रहता है। उनकी यही श्रद्धा पूंजीभूत होकर देश को देवत्व को पवित्रता की प्रतिमा के रूप में साकार कर देती है। पाण्डेय जी ने इसी श्रद्धा से जन्मभूमि की प्रशस्ति आई है और सम्पूर्ण देश में स्वदेश की पवित्र उदार भावना जताई | कवि ने महाराष्ट्र की भूमि का गुणगान किया है-

“आगे महाराष्ट्र है,

रुको

विनीत भाव सेवदो

कर्मशील सूरया

शिषा क कर्मभूमि है

संत तुकाराम की

समर्थ रामदास की

अकाम ज्ञानदेव नामदेव

एकनाथ की

पवित्र धर्मभूमि है,

झुको

नमस्कार करो |”

मातृभूमि के लिए सर्वस्थ अर्पण करना प्रत्येक भारतीय का परम कर्त्तव्य बनता है। वीर रस के राष्ट्र कवि श्यामनारायण पाण्डेय जी को मातृभूमि के लिए आत्मोत्सर्ग करने वालों के प्रति विशेष आदर है। मातृभूमि के लिए बलिदान करने वाला नवयुवक कहते हैं-

“हम माता के गुण गाएँगे,

बलि जन्मभूमि पर पाएँगे,

अपना झंडा फहराएँगे,

हम हाहाकार मचाएँगे ||

मातृभूमि का प्रेम धार्मिक स्थलों के कारण अवश्य बढ़ता है परन्तु राष्ट्रीयता की भावना धर्मस्थल से भी अधिक महत्त्व कर्मस्थल को देती है। कर्मभूमि के उच्चारण मात्र से श्रद्धा के भाव जागृत होते हैं। कर्मभूमि ही हमारी वंदनीय है-

“मुझे न जाना गंगा सागर

मुझे न समेव पर, काशी।

तीर्थ राज चितौड़ देखने को

मेरी आँखें प्यासी।

सुंदरियों ने जहां देशहित,

जौहर का करना सीखा।

स्वतंत्रता के लिए जहाँ

बच्चों ने भी मरना सीखा।।”

अपने राष्ट्र के प्रति पवित्र प्रेम एवं कर्त्तव्य | व्यक्तियों को राष्ट्र प्रेम निभाने के लिए अनेक संकट तथा कष्ट झेलने चाहिए | राष्ट्र धर्म के लिए कवि इस प्रकार प्रेरित करता है-

“जन्मभूमि के संरक्षण का

भार वहन करना होगा।

राष्ट्र धर्म रक्षा वेला में,

कष्ट सहन करना होगा।॥*

पं. श्यामनारायण पाण्डेय जी मातृभूमि के लिए उत्सर्ग हो जाने में ही अपने जीवन की सार्थकता मानते हैं| लेकिन वह सोचते हैं कि बलिदान कर्म विरहित नहीं होना चाहिए | कर्म ही जीवन का आधार है। कर्म ही पूजा है, कर्म ही प्राण है, इसलिए उस कर्म ही लोकाहितार्थ बलि जाने का भाव उन्होंने अपने काव्यों में अभिव्यक्त किया है। लेकिन मरने से पहले यदि कुछ अच्छा काम करें तो नाम अमर हो जाता है। यही भावना शिवाजी द्वारा व्यक्त करते हैं-

“इस धरती पर तो क्षणे-क्षणे

नित लोग जनमते-मरते हैं।

पर पूज्यपाद वे धन्य पुरुष

जो नाम उजागर करते हैं।»

अपने देश पर होने वाला अन्याय और अत्याचार वीरों के हृदय को वेदना विहबल कर देता है और वे उसके प्रतिकार के लिए, स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए माता के परवशता के बंधन उखाड़ने के लिए उत्तेजित होते हैं। कविवर श्यामनारायण पाण्डेय जी देश रक्षा के लिए युद्ध और बलिदान करने वालों की प्रशंसा करते हैं और उनको सहारा देते हैं-

“केसरिया तन पर, वक्ष तान,

चल पड़े युद्ध में, नव जवान |

होली जल उठी जली सतियाँ,

अब भी कण-कण में विद्यमान ||

जौहरब्रत वाले चिरंजीव| हे रणमतवाले चिरंजीव | [7०

राष्ट्रकवि पंडित श्यामनारायण पाण्डेय जी बलिदान की महत्ता के गायक हैं। उन्होंने अपनी अदम्य राष्ट्रीय भावना से देश के कण-कण को उत्सर्ग के लिए प्रेरित किया है। वे लिखते हैं-

“भारत जननी का मान किया,

बलिवेदी पर बलिदान किया।

अपना पूरा अरमान किया,

अपने को भी कुर्बान किया।।”’

पंडित श्यामनारायण पाण्डेय का ध्यान पराधीनता पर प्रथम प्रहार करने वाले चित्तौड़ के महाप्रतापी राणा प्रताप की ओर आकृष्ट हुआ। स्वतंत्रता की चिर ज्योति को प्रज्ज्वलित रखने के लिए वह वन की खाक छानना रहा, मगर उसने अपने गर्वोन्‍नत मस्तक को हिमगिरि के समान ऊँचा उठाए रखा। महाराणा भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रेरणादायक रहे हैं-

“स्वतंत्रता के लिए मरो

राणा ने पाठ पढ़ाया था

इसी वेदिका पर वीरों ने

अपना शीश चढ़ाया था।।

तुम भी तो उनके वंशज हो

काम करो, कुछ नाम करो

स्वतंत्रता की बलिवेदी है,

झुककर इसे प्रणाम करो ||”

राष्ट्रकवि श्यामनारायण पाण्डेय जी भारतीयों को स्वदेश, स्वधर्म रक्षा के लिए अपना जीवन अर्पण करने के लिए प्रेरणा देते हैं। हमारा तन मन धन देश के लिए अर्पित हो। हमारी शिक्षा नीति सदाचार में स्वदेश प्रेम हो। कवि गुरुदेव से ऐसी सीख चाहते हैं-

“जिससे स्वदेश का मंगल हो

जिससे उद्धार धारा का हो

अब वही चाहिए विद्या धन,

जिससे सत्कार जरा का हो,

जिससे रक्षित हो शिखा सूत्र

जिससे स्वधर्म की जय जय हो

गुरुदेव चाहिए वही सीख

जिससे जनजीवन निर्भय हो।।५

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन भी नारी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसी प्रकार पं. श्यामनारायण पाण्डेय जी ने नारी के स्वतंत्रता प्रेम, राष्ट्रभक्ति, साहस, त्याग और बलिदान की अमर गाथाएँ प्रस्तुत की हैं। उन्होंने नारी को अबला रूप की अपेक्षा शक्तिस्वरूपा, तेजस्विनी और निर्भीकता की प्रतिमूर्ति के रूप में अधिक चित्रित किया है। नारी केवल चार दीवारी के अंदर बंद रहने योग्य अबला नहीं है। वह निर्भय समाज सेविका, राष्ट्र सेविका है। वह समाज के लिए गौरव का प्रतीक और देश रक्षिका है। साहसी एवं बहादुरी नारी का स्वरूप इस प्रकार है-

“इन्कार करो यदि तुम,

मैं बनुँ महाकाली-सी |

उत्साह न हो तो बोलो,

गरजूँ खप्परवाली-सी ||

मैं शेष नाग की कसुट

सी एक बार जग जाऊँ।

मैं आग बनूँ बैरी वन

मैं दावा सी लग जाऊँ।।४

राष्ट्रकवि पंडित श्यामनारायण पाण्डेय जनता के वास्तविकप्रतिनिधि कवि रहे हैं। जनशक्ति व राष्ट्र भक्ति पर उनका अडिग विश्वास है।क्रांतिकारी जनता की संगठित शक्ति से निर्माण होने वाली वह प्रतिक्रिया है, जो जनता को अधिकारों से वंचित किए जाने पर तथा अन्याय, अभाव और अत्याचारों के परिणाम स्वरूप एक दिन स्वयं ही फुट पड़ती है-

“दवाग्नि की तरह उठो,

चपेटते हुए बढ़ो,

समस्त गढ़ स्वबाहु में

लपेटते हुए बढ़ो।

किला-किला स्वतंत्र हो

स्वतंत्र पर्ण वेश हो,

स्वतंत्र जाति-जाति हो

स्वतंत्र यह स्वदेश हो ||

राष्ट्रभक्ति का उद्बोधन हुआ | उद्बोधन का अर्थ है, बोध या ज्ञान को जगाना, ज्ञान पाकर ही मानव या राष्ट्र किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सचेत होते हैं| वस्तुस्थिति से अवगत होकर राष्ट्रभक्त कवि ने जागरण का राग छेड़ा-

“जगो, तुम्हारी जन्मभूमि को

रौंद लुटेरे लूट रहे।

उठो तुम्हारी मातृ भूमि के

जीवन के स्वर दूट रहे।।

जगो, तुम्हारे नंदन को

वैरी शोणित से सींच रहे ।

उठो द्रोपदी का अंचल

सौ-सौ दुःशासन खींच रहे |।

जागो, सदल बल रावण आया

कहीं न चोंच डूबो पाए।

उठो, तुम्हारी पंचवटी में

सीता हरण न हो पाए।।

जगो तुम्हारी रतन राशि पर

अरि का कठिन लगो ताला।

उठो, डाकुओं ने जननी की

निधियों पर डाका डाला | [7०

भारतीय संस्कृति वर्ण व्यवस्था को उपयुक्त मानती है। पं श्यामनारायण पाण्डेय जी मानते हैं कि चारों वर्णों का समाज में उपयुक्त स्थान है। प्रत्येक वर्ग को अपने-अपने कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए। सामाजिक, धार्मिक जीवन की सुचारूता और सुविधा के लिए ही चारों वर्णों में कार्य विभाजन हुआ है। यदि कर्मों में पतन हो गया तो श्रेष्ठ वर्ण भी महत्त्वहीन, नीच माना जाएगा। जो शुद्ध ब्राह्मण है, सच्चा धार्मिक है, उसे वेद आदि धर्मग्रंथ पठन, जप-तप, साधना और विद्यादान अवश्य करना चाहिए-

“वेद पाठ किया नहीं, जप न किया

विद्यादान दिया नहीं, तप न किया।

वह नहीं ब्राह्मण, अधूत नीच है,

उसका निरादर समाज बीच है।”

भारतीय संस्कृति समन्वय प्रधान है। भारत में विभिन्‍न धर्म, जातियाँ, आचारनिष्ठा, विचारपद्धतियाँ प्रचलित रही हैं| यहाँ के ऋषि मुनि-मनीषि, महर्षि तथा समाज सुधारकों ने सदैव समन्वय के प्रयत्न किए हैं। यहाँ के धार्मिक, सांस्कृतिक पवित्र ग्रंथ वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत आदि में समन्वय भावना विद्यमान है। भारत की इसी समनन्‍्वयशीलता के कारण बहुविध देवी-देवताओं को एक परमात्मा का, परब्रह्म का रूप कहा गया है। भारत ने सभी धर्मों में निहित सत्य को स्वीकार करके, सभी के प्रति आदर के भाव अभिव्यक्त किए हैं। पं श्यामनारायण पाण्डेय जी मानते हैं कि यदि हमारे बीच अलगाववादी प्रवृत्ति बनी रहे तो उसका परिणाम हमें ही भोगना पड़ेगा। सभी मनुष्य समान हैं। यहाँ भले ही धर्म, वंश, जाति, भाषा, रहन-सहन अलग-अलग हो, परन्तु सभी एक ही भारत माता के सपूत हैं। वे इसी बात को स्पष्ट करते हैं-

“क्या फर्क है इन्सान में

क्या फर्क है वेद-कुरान में

दो राह मंजिल एक है

कुछ भी उसे न विवेक है।

मुस्लिम हुआ तो खैर है

सब हिन्दुओं से वैर है

यह आपसी विलगाव है

कब तक चलेगी नाव रे।॥”४

संस्कृति में नारी को शक्तिरूप, सौन्दर्यमयी, देवी, पूजनीया, माता सहकर्मिणी, मानव जीवन को समुन्नत बनाने वाली, उदार आदि कहा गया है। परन्तु बाद के काल में नारी की उपेक्षा होती रही | पं. श्यामनारायण पाण्डेय मानते हैं कि समाज में पुरुष की भाँति नारी का भी उन्‍नत स्थान है और उस स्थान पर उसे स्थापित किए बिना किसी भी समाज का कल्याण नहीं हो सकता | नारी केवल उपभोग्या नहीं है| वह पुरुष की अर्द्धांगिनी चिर संगिनी है।

“लाखों मरते, क्या दुनिया,

उस मरने पर रोई है?

मैं तो उस तरह मरूँगी।

जैसे न मरा कोई है।”*

भारतीय संस्कृति के अनुसार नाशी श्रद्धा की मूर्ति है। परायी स्त्री के प्रति आदर, मातृभाव तथा श्रद्धा होनी चाहिए | पं. श्यामनारायण पाण्डेय जी ने ‘शिवाजी’ में कल्याण के सूबेदार की नारी स्त्री के सम्बन्ध में लिखा है-

“कहा धन्य यह रूपमाधुरी

मन में घर करने वाली

किचित्‌ दर्शन से विरक्‍्त

का भी अन्त: हरने वाली।

लेकिन दिव्य रूप के भीतर

झाँक रही है माँ मेरी

छवि रक्षा के लिए भवानी

सदा दे रही है फेरी।।?

भारतीय महापुरुष केवल भारत के संकट दूर करने के लिए प्रयत्न नहीं करते, अपितु संसार भर के तापित, शापित, दीन-हीन, दुखियों के दुःख दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। साथ ही मानव जीवन में सुख और शांति स्थापना के लिए क्रांति करते हैं। छत्रपति शिवाजी का उदाहरण इस प्रकार है-

“तुम रघुकुल गौरव नाम बनो, खल रावण का संहार करो।

दुद्घर्ष अनायों से पीड़ित धरती, धन का उद्धार करो।|”

“हल्दी घाटी’ के नायक राणा प्रताप उद्धार, नीतिपालक, धर्मवीर,

दयावीर, क्षमाशील, परोपकारी तथा शरणागत वत्सव है| महाराणा पर आक्रमणकरने आए मान सिंह को राणा के भील साथी कैद कर लेते हैं। उसी वक्‍त वहाँ राणा पहुँचे दुश्मन का वध किया-

“अरि को भी धोखा देना

शूरों की रीति नहीं है।

छल से उनको वश करना

यह मेरी नीति नहीं है।

अब से भी झुक-झुक कर तुम

सत्कार समेत विदा दो।

कर क्षमा-याचना इनको

गल हार समेत बिदा दो ||”

अत: सारांश रूप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक काव्यधारा की पृष्ठभूमि में पं. श्यामनारायण पाण्डेय का महत्त्वपूर्ण योगदान है। वे राष्ट्रभक्त एवं भारतीय संस्कृति के महान कवि हैं| उनके काव्य सर्जना में वीरता, राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति की उपासना का परिचय मिलता है। इनकी रचनाएँ आज भी अमर हैं। क्‍योंकि युवा वर्ग को प्रेरणा देने का कार्य करती हैं।

संदर्भ —

  1. माखनलाल चतुर्वेदी, पुष्प की अभिलाषा, पृष्ठ 446
  2. मैथिलीशरण गुप्त ग्रंथावली, पृष्ठ 333
  3. पं. श्यामनारायण पाण्डेय, हल्दी घाटी, पृष्ठ 49
  4. वही, शिवाजी, पृष्ठ 44
  5. वही, पृष्ठ 443
  6. वही, हल्दी घाटी, पृष्ठ 45
  7. वही, पृष्ठ 443
  8. वही, परशुराम, पृष्ठ 463
  9. वही, शिवाजी, पृष्ठ 299
  10. वही, आरती, पृष्ठ 83
  11. वही, हल्दी घाटी, पृष्ठ 44
  12. वही, हल्दी घाटी, पृष्ठ 49
  13. वही, शिवाजी, पृष्ठ 24
  14. वही, जौहर, पृष्ठ 76
  15. वही, शिवाजी, पृष्ठ 68
  16. वही, पृष्ठ 33
  17. वही, परशुराम, पृष्ठ 34
  18. वही, शिवाजी, पृष्ठ 342
  19. वही, जौहर, पृष्ठ 427
  20. वही, शिवाजी, पृष्ठ 94
  21. वही, पृष्ठ 435
  22. वही, पृष्ठ 435

 

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