भारतीय संस्कृति के उन्नायक पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय “हरिऔध’-डाॅ. मुकेश कुमार

भारतीय संस्कृति बहुत व्यापक और विस्तृत है। भारतीय संस्कृति की गौरव गाथा अत्यन्त उज्ज्वल एवं महान है। सृष्टि की अन्य संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति महानतम है। इसमें मानवतावाद और विश्व बन्धुत्व की भावना निहित है। यह विश्व बन्धुत्व एवं “वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना से ओत-प्रोत है। महाकवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा है-

प्रात: काल उठि के रघुनाथ। मातु पिता गुरु नावाहि माथा

मातु-पिता अग्या अनुसरहीं।।

अर्थात्‌ प्रतिदिन प्रात:काल उठकर माता-पिता एवं गुरु को प्रणाम करते हैं और उनकी आज्ञा का अनुसरण करते हैं। ये ही हमारे संस्कार होते हैं और भारतीय संस्कृति की यही पहचान है।

कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘“हरिऔध’ जी ने माता के आंचल की वेदनाव उसकी ममता को दर्शाया है। माता यशोदा बहुत गहरे शब्दों को कह रही है कि एक भारतीय संस्कृति की पहचान करवाती है अपने वात्सल्य प्रेम से-

प्रिय-पति वह मेरा प्राणप्यारा कहाँ है।

दुःख जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है।

अब तक जिसको मैं देख जी नहीं सकी हूँ।

वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है।

प्रत्येक राष्ट्र की निजी संस्कृति होती है जो उसको एक सूत्र में पिरोये रखती है। रीति-रिवाज, साहित्य, शिक्षा, कला, रहन-सहन-जीवन दर्शन एवं मान्यताओं का समाहार संस्कृति के अन्तर्गत हो जाता है। संस्कृति मानव जीवन वृक्ष का सुगन्धित पुष्प है|”

प्रोफेसर मोहिनी टाया, “संस्कृति विचार एवं ज्ञान दोनों व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक का समूह है। जो केवल मनुष्यों के पास ही हो सकता है।संस्कृति उन तरीकों का कुल योग है जिनके द्वारा मनुष्य अपना जीवन व्यतीत करता है। जो सीखने की प्रक्रिया द्वारा एक से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता है।

द्विवीदी युग के महान कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की रचनाधर्मिता में भारतीय संस्कृति का वर्णन गहनता के साथ हुआ है। जो इस प्रकार से है-

कवि सम्राट पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध’ का जन्म 45 अप्रैल 1865 ई. में आजमगढ़ के अन्तर्गत निजामाबाद के एक सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत परिवार में हुआ। हरिऔध जी वास्तव में एक अमूर्त भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। वे ऐसे साहित्यिक पुरोधा थे जिनकी रग-रग में उज्ज्वल भविष्य और देश भक्ति की भावना भरी हुई थी।

उन्होंने अपनी साहित्यिक वाणी के माध्यम से जन-जन में राष्ट्रीयता के भावों से ओत-प्रोत कर मातृभूमि के लिए सर्वस्व त्याग करने की अनुष्रेरणा प्रदान की। हरिऔध जी अपने मानवीय चिंतन द्वारा इस संदेश को एक राजनीतिक राज्य की बजाए एक राष्ट्र बनाने की ओर साहित्यिक प्रयत्न किए। उन्होंने अपने साहित्य सृजन में ऐसे चरित्रों का निर्माण किया जो लोक सेवक, राष्ट्रभक्त, लोक कल्याण, जाति प्रेम, भाषा प्रेमी, जन्मभूमि प्रेमी, देश प्रेमी आदि समाज में राष्ट्रप्रेम की शंखध्वनि का स्वर गूंज उठे। यही उनकी राष्ट्रीयता का आधारभूत सत्य है। इसी पंक्ति से उनके हृदय के भाव की राष्ट्रीयता के प्रति भावना दिखाई देती है। वे कहते हैं कि-

प्यारा है जितना स्वदेश,

उतना है प्राण प्यारा नहीं।

प्यारी है उतनी कीर्ति,

जितनी उद्धार की कामना।।

महाकवि हरिऔध जी ने देश जाति सम्बन्धी स्थाई साहित्य दिया है। और देश-जाति में परिव्याप्त विकारों, दोषों, रोगों का पूर्ण निदान और औषधि लिखने का स्तुत्य प्रयत्न किया है। देश हित कार्यो में लगे रहना इनका महान कार्य रहा है।

जहाँ देश हित प्रश्न सामने जाता है,

लाखों शिर अर्पित हो कटता दिखलाता है।

जाति-मुक्ति के लिए आत्मबलि दी जाती है।

परम अमंगल किया पुष्प कृति बहलाती है।॥”

श्रीकृष्ण में जन-सेवा एवं कर्त्तव्य परायणता की ही भाँति जाति हितैषणा तथा जन्मभूमि प्रेम भी कूट-कूट पर भरा हुआ था। वे ब्रज भूमि एवं ब्रज वासियों को कष्ट में पड़े देख नहीं सकते थे। उन्होंने जब जब उन्हें कष्ट में देखा तब अपने प्राणो को जोखिम में डालकर उनके कष्टों का निवारण किया। ऐसा करते हुए उन्हें जो वाक्य कहे हैं उनसे देशानुराग की भावना ही अभिव्यक्त होती है तथा वे युग-युग तक देश प्रेमियों को प्रेरणा देते रहेंगे। सबसे पहले कालिया नाग का प्रसंग आता है।

ब्रज के समीप ही यमुना के एक बड़े विस्तृत कुण्ड में कालिया नामक कई फणों का महान विषैला सर्प सहतस्त्रों सर्पिणयों के साथ रहता था। उसकी असंख्या विषतारू फूटकारों से कुण्ड का ही नहीं उसके आस-पास का जल भी विषाक्त हो गया था-

दिखा रहा सम्मुख जो कदम्ब है

कही इसे छोड़ एक वृक्ष था।।

लोकसेवक श्री कृष्ण जी ने जोखिम से पूर्णत, इस कार्य को किसी अन्य द्वारा करवाना अथवा दूसरों की सहायता से करने के स्थान पर स्वयं एकाकी करने का संकल्प करते हुए कह उठे-

सदा करूंगा अपमृत्यु सामना

समभीत हूँगा सुरेन्द्र ब्रज से

कभी करूँगा अवहेलना में

प्रधान धर्माणं परोपकार की ||”

इसी प्रकार से हरिऔध जी ने कृष्ण जैसे नायक को प्रियप्रवास’ महाकाव्य में रखा जिसने जनता की पीड़ा का निवारण किया और राष्ट्रीय प्रेम देश-प्रेम के प्रति अपने आप को समर्पित किया।

हरिऔध जी अपने देश के सच्चे देश भक्त थे। वे भारतीयों की दुर्दशा देखकर अत्यन्त खेद प्रकट करते हैं और उन्हें समय-समय पर चेतावनी देते रहते हैं कि वीरो उठो, जागो अपने देश की रक्षा करो क्‍योंकि अंग्रेज तुम्हें अपना गुलाम बनाए जा रहे हैं। तुम्हें आन्तरिक खोखला बना रहे हैं। अभी भी समय है तुम जागो-

पिस रहा है आज हिन्दुस्तान बहुत

हिन्दुओं में है बुरी रुचियाँ जगी

हे सपूतों तुम सपूती मत तजो

है तुम्हारी और ही आँखें लगी।।

महाकवि ‘हरिऔध’ जी के युग की कविता का मूल स्वर देशभक्ति ही रहा है। इस युग में देशभक्ति की लहर सम्पूर्ण साहित्य में प्रवाहित हो रही थी। हरिऔध जी की कविता भी उससे आप्लावित है। उन्होंने जहाँ अतीत भारत का गौरवगान किया। वे कहते हैं-

गुण गौरव था, गौरव महिमा का पता

था कभी हमारा धरा वसुधातल गाता। |?४०

हरिऔध जी का राष्ट्र प्रेम इतना अगाध था कि अगर कोई हिन्दूअहिन्दुओं का भी अहित करता था तो वे उसे प्रताड़ित किये बिना नहीं रहे थे। वे कहते हैं कि-

हरिऔध हिन्दू कैसे हिन्दू का करेंगे हित,

वे मुख अहिन्दुओं का देख-देख जीते हैं।

लोहा कैसे लेते हाथ काँपता है लोहा छुये।

आँखे कैसे लह्दू होती लहू घूँट पीते हैं।।

महाकवि हरिऔध जी ने ‘बोलचाल’ में भारत के नवयुवकों को अपनी शक्ति के द्वारा जागरूक करने का सफल प्रयास किया है। देश गुलाम हो, मन में स्वतन्त्रता का स्वप्न हो, अहिंसा और बलिदान का पथ हो तो देशभक्त कवि देश के हर एक व्यक्ति से त्याग की कामना करता है। इसकी सुंदर अभिव्यक्ति बोलचाल में हुई है-

झोंक दो उन मतलबों को भाड़ में।

उन पदों को तुम गिनो मुरदे सड़े

मान रखो अभिमानयों के पाँव पर,

सिर! तुम्हें जिनके लिए गिरना पड़े |”

विश्व कल्याण की भावना से वह अपने निजी दुःख से व्यथित होकर ब्रजवासियों के दुःख से दुःखी हो कृष्ण प्रेम की सार्थकता और सर्वव्यापकता स्थापित करती है-

मेरे जीवन में हृदय विजयी,

विश्व का प्रेम जागा,

मैंने देखा परम प्रभु को,

स्वीय प्राणेश में ही हो।॥7*

महाकवि हरिऔध जी ने भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्परा की धारा को प्रवाहित रखने का सफल प्रयास किया है। वे सत्यंवंद, धर्मचर, स्वाध्यायान्‌ मा प्रमद, मातृदेवो भवः पितृ देवोभव, आचार्य देवोभव को इस संस्कृति की आधारशिला मानते थे। उनके साहित्य में प्रकारान्तर से इन्हीं सिद्धांतों का अनुमोदन और प्रकाशन हुआ है। वे जीवन के सत्‌ पक्ष, रचनात्मक तथा लोकरंजनात्मक पक्ष पर विश्वास करते थे। परिणामतः: उनकी रचनाओं में ऐसे पात्रों का वर्णन बहुत कम मिलता है जिनके विचार कुत्सित हों अथवा जिसकी कुत्सित जीवन गाथा का वर्णन पढ़कर इस दिशा में कुछ ध्यान जाने अथवा सोचने का भी अवसर मिले। वे जीवन के अन्धकार पक्ष की ओर ध्यान ले जाना आवश्यक नहीं समझते थे।

भारतीय शिक्षा की उस प्राचीन परम्परा का हरिऔध जी ने अपने साहित्य में अनुमोदन किया है जिसके द्वारा समाज में विनय की भावना का समुचित विकास होता है। शिक्षा संस्कारवान होनी चाहिए। वैदिक शिक्षा होनी चाहिए। शिक्षा का यह लक्ष्य होना चाहिए कि वह प्रत्येक व्यक्ति को इस योग्य बना दे कि वह अपने अभ्युदय के साथ समाज तथा देश की उन्नति का भी ध्यान रखे। शिक्षा द्वारा व्यक्ति को नीस-क्षीर का विवेक प्राप्त हो जाए। शिक्षा सम्बन्ध में हरिऔध जी का विचार है इसका हम सामाजिक विचारसरणि में विस्तार से विवेचनकर चुके हैं। समाज, जाति और देश के उत्थान के लिए वे शिक्षा का देशव्यापी प्रचार चाहते थे। इस सम्बन्ध में उन्होंने कविताएँ भी लिखी। ‘वैदेही वनवास’ में ‘सुतवत्ती सीता’ सर्ग में सीता द्वारा लक्-कुश की शिक्षा का जो चित्र उपस्थित किया गया वह आधुनिक शिक्षा सिद्धांतों पर आधारित है। सीता प्रकृति के स्थूल पदार्थों द्वारा अपने पुत्रों को सूक्ष्म बातों का ज्ञान कराती है। बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था प्रकृति के वातावरण में की गई है और क्रीडा के साथ ही उन्हें जीवन के अनेक प्रकार के अनुभवों की शिक्षा की व्यवस्था हुई है-

प्रकृति पाठ को पठन करो शुचि-चित्त से।

पत्ते-पत्ते में है प्रिय शिक्षा भरी।

सोचो समझो मनन करो खोलो नयन

जीवन जल में ठीक चलेगी कृति तरी।॥”*

इसी प्रकार सेक लक्-कुश को प्रकृति प्रेम के साथ-साथ जीव प्रेम नीति के बारे में बतलाती हैं। वह मछलियों के एक निष्ठ प्रेम के बारे में बतलाती है-

जल को विमल बनाती है ये मछलियाँ

पूत फ्रेम का पाठ पढ़ाती हैं सदा।।

प्रियतम जल से बिछुड़े वे जीती नहीं

किसी प्रेमिका पर क्‍यों आवे आपदा। |”

प्रेम और कर्त्तव्य का वर्णन हरिऔध जी ने बहुत गहनता से किया है। प्रेम की तीव्रता, उत्कटता उन्हें अकर्मण्य बनाने की अपेक्षा कर्त्तव्य-परायण और कर्त्तव्य पर अश्रित हैं। ‘प्रिय प्रवास’ और वैदेही वनवास’ में ही प्रेम की अभिव्यक्ति हुई है। इसका ही संभावतः यह परिणाम है कि हरिऔध जी के लौकिक प्रेम की परिणति अलौकिक प्रेम में हुई है। इस अलौकिक प्रेम के कारण ही उनके प्रेमी सर्वभूत के हित में रत दीख पढ़ते हैं। प्रेम उन्हें कर्त्त्य की ओर भी अधिक शक्ति प्रदान करता है।

सारांश रूप से कहा जा सकता है कि हरिऔध के साहित्य मेंवसुधैव कुटुम्बकम्‌’ और राष्ट्र प्रेम की शंखध्वनि से आज के जन-जन को लोकसेवाकी भावना से जागृत किया गया है। आज के इस भौतिकवादी दौर ने स्वार्थ और संकीर्णता की दीवारों से मानव समाज को घेर अवश्य लिया है किन्तु जकड़ा नहीं। ऐसी परिस्थिति में ‘वसुधेैव कुटुम्बकम्‌ का भारतीय आदर्श व्यक्ति-व्यक्ति में प्रेम एकता उत्पन्न करता है और यहीं से भारतीय संस्कृति की पहचान होती है।

संदर्भ –

  1. कल्याण पत्रिका, संस्कार, पृष्ठ 434
  2. सम्पा. सदानंद शाही, हरिऔध रचनावली, पृष्ठ 408
  3. सम्पा. डॉ. मुकेश कुमार, हिन्दी कविता : राष्ट्रीय. चेतना एवं संस्कृति सम्पादकीय
  4. प्रो. मोहिनी टाया, मध्यकालीन हिन्दी काव्य का सांस्कृतिक अध्ययन,पृष्ठ 345
  5. सम्पा. सदानंद शाही, हरिऔध रचनावली, पृष्ठ 454
  6. वही, पृष्ठ 433
  7. वही, पृष्ठ 453
  8. वही, पृष्ठ 208
  9. वही, पृष्ठ 434
  10. वही, पृष्ठ 334
  11. वही, पृष्ठ 448
  12. वही, पृष्ठ 409
  13. वही, पृष्ठ 344
  14. वही, पृष्ठ 205
  15. वही, पृष्ठ 39

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