रघुवीर सहाय के काव्य-सर्जना में जीवन संघर्ष-डाॅ. मुकेश कुमार

रघुवीर सहाय स्वाधीन भारत के उन महत्त्वपूर्ण रचनाओं में से थे, जिनकी रचनाओं में स्वातंत्रयोत्तर भारत के विविध रूप और समस्याएँ सम्पूर्णता से उद्घाटित हुई हैं। उनकी रचनाएँ गतिशील जीवन यथार्थ से हमेशा सार्थक संवाद बनाए रही हैं। सहज और सामान्य के प्रति उन्मुखता उनकी रचनाओं का केन्द्रीय स्वर है। ये रचनाएँ जीवन कीn छोटी से छोटी वास्तविकता को अपने में समाहित करना चाहती हैं। अपनी रचनाओं में रघुवीर सहाय ने मानव जीवन और उसके विविध आयामों को सम्पूर्णता में व्यक्त किया है। उन्होंने लोकतंत्र, साम्प्रदायिकता, जातिप्रथा, स्त्रियों की स्थिति आदि राजनीतिक, सामाजिक समस्याओं का गहराई से विश्लेषण किया है।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रघुवीर सहाय दूसरे सप्तक के महान कवि हैं। रचनाकार अपनी काव्याभिव्यक्ति के द्वारा पहचाने जाते हैं। कविताओं के दायरे में समाज का कितना बड़ा हिस्सा सम्मिलित है, इसी पर कवि की महानता का आधार रहता है। उन्होंने लगभग सारी विधाओं में जीवन के सारे पहलुओं को अभिव्यक्ति दी है। कविता, कहानी, नाटक, निबंध आदि हर विधाओं में अपने रचनाकर्म को उभारा है। तेजी से बदलते हुए समय में नई वास्तविकताओं के नए अनुभव की अभिव्यक्ति रघुवीर सहाय जी की कविताओं में अधिक है। यही काव्य गुण उन्हें अपने दौर का प्रतिनिधि कवि बनाता है।

“साहित्यकार की सफलता उसकी रचना–क्षेत्र की व्यापकता के आधार पर किया जाए तो निश्चित ही रघुवीर जी एक सफल साहित्यकार है। जिस प्रकार एक पौधे को फल-फूलों से लदा वृक्ष बनाने के लिए वातावरण सहयोगी होता है, उसी प्रकार रचनाकार का परिवार, वातावरण एवं परिस्थितियाँ उसके मन मस्तिष्क को परिपक्व बनाती हैं और वह समाज को अपनी कृत्तियों के द्वारा लाभान्वित करता है। साहित्यकार साहित्य को अपने विचारों एवं मतों को प्रकट करने का मा६यम बनाता है।

कवि रघुवीर सहाय जी के पाँच स्वतन्त्र संग्रह और दो सम्मिलित संग्रह प्रकाशित हुए हैं। कवि की रचनाओं का समावेश “दूसरे सप्तक’ में रचित है। इन कविताओं में कवि ने यथार्थ के प्रति जागरूक रहकर समाज में यथार्थ को समझाने का प्रयास किया है। कवि ने प्रकृति के सतत्‌ बदलते हुए मनोरम्य चित्र को दर्शाया है | वसंत ऋतु के स्वागत में प्रकृति अपने बदलते हुए रंगों से मदमदाती हुई फूलों और सुवास के चारों ओर अपना हर्ष दर्शाती है। कविता में कवि ने प्रकृति के साथ अपनेपन की झलकियाँ प्रस्तुत की हैं। यथा-

“सब ऋतुओं का सुख, खिंच आए

इस फागुन के पास

सरस फलों की मीठी आशाओं की उड़े सुवास

नव आशाओं का मानव को वसंती उपहार

मिले प्यार में सदा जीव हो, नहीं कभी हो घर।।”

महान रचनाकार रघुवीर सहाय ने स्नेह प्रेम की पीड़ा को परखा है। प्रेम की गहराई को नापकर देखा है। पारम्परित लकीरों पर चलकर सिर्फ आँसू बहाना नहीं चाहते कविता में कवि की याचना की झलक मिलती है-

“युक्ति के सारे नियंत्रण तोड़ डालें

मुक्ति के कारण नियम सब छोड़ डाले

अब तुम्हारे बंधनों की कामना है|

कवि रघुवीर सहाय जीवन के प्रतिकूल परिस्थितियों को नकारते नहीं बल्कि निराशा पर विजय प्राप्त करके नई आशा का संचार करना चाहते हैं क्योंकि वे जीवन में समझौता करके माध्यम मार्गी नहीं बनना चाहते हैं-

“तुम चलों चुपचाप होकर

ताकि खा जाओ न ठोकर

और आँखों को गड़ा दो क्षितिज के पार,

क्योंकि बसता है क्षितिज के पार भी संसार |“

‘सीढ़ियों पर धूप में” रघुवीर सहाय का प्रथम काव्य संकलन है। इसमें कविताओं के अतिरिक्त कहानियाँ, लेख और टिप्पणियाँ भी संकलित है। कवि ने प्रतिकार शक्ति का उपयोग करने का आह्वान करके समाज के दलित  एवं पीड़ित लोगों को अन्याय का विरोध करने का आह्वान देते हैं-

जब तक यह न हो बोध

मुझ में भी क्रोध

और लूँगा प्रतिशोध और जब तक प्रतिशोध न हो

कष्ट गहन

करो सहन

ओरे मन |

कवि रघुवीर सहाय परमात्मा को भी जगत्‌ के दुःख दर्दो के लिए आड़े हाथों लेते हैं। परमात्मा द्वारा दिये गये कष्ट भी अनेक हैं। परन्तु दुःख के बाद सुख का अनुभव होना निश्चित है-

“वे जीवित रहते हैं, जीवित ही रहने के लिए नहीं

तू देता है कष्ट और कुछ तू दे ही क्या सकता है [९

“आत्महत्या के विरुद्ध कवि रघुवीर सहाय का दूसरा काव्य संकलन है। युग की बदलती हुई राजनीति को देखकर कवि ने इतिहास के साथ कदम मिलाया । इतिहास और साहित्य का अटूट रिश्ता होता है। इतिहास घटी हुई घटनाओं का वास्तविक रूप चित्रित करता है, तो साहित्य इतिहास की यथार्थता को मानवता का चोला पहनाता है | समाज की मनोदशा में पीसता हुआ हर एक नागरिक जीवन संघर्ष का मुकाबला करता है। मानव परिस्थिति से संघर्ष करते हुए थक जाता है और दम तोड़ देता है। कविता ‘कोई एक मतदाता’ में कवि ने संघर्षरत शब्दों के द्वारा कविता में प्रस्तुत किया-

“जब शाम हो जाती है तब खत्म होता है मेरा काम

जब काम खत्म होता है, तब शाम खत्म होती है

रात तक दम तोड़ देता परिवार

मेरा नहीं, एक और मतदाता संसार का।”

कवि ने तत्युगीन समाज का हूँ – बहु चित्रण करके मतदाता, जिसकी आँखों में स्वतंत्र भारत का सुनहरा सपना है| वह सूझता हुआ मृत्यु की शरण पाता है।

“हँसो हँसो जल्दी हँसो’ महान रचनाकार का तीसरा काव्य संग्रह है। इसमें लोकतंत्र के भीतर डर के बल पर टिकी हुई व्यवस्था में एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में जीने की स्थितियों को खत्म हो जाने का अकेलापन है।

“रघुवीर सहाय ने अधिकतर रचनाएँ समाज और उसके आम-आदमी को ध्यान में रखकर की है। अपने साहित्य में वे किसी कल्पना की उड़ान नहीं भरते बल्कि एक साधारण आम आदमी की तरह कड़वी सच्चाईयों से जूझते दिखाई देते  कभी अकेले असहाय से, तो कभी साहस के साथ |

कवि इस समाज में विभिन्‍न मोर्चे और स्तरों पर चलने वाले संघर्ष का प्रतिनिधित्व सम्पूर्णता से करते हैं। जो वर्तमान शोषण व्यवस्था में जिन्दा रह सकने के लिए संघर्षरत है। ‘सेब बेचना कविता में सेब दागी न होने पर खरीददार बड़े रुआब के साथ सेब बेचने वाले से पूछता है। दूसरी ओर सेब बेचने वाला अपने बचाव के लिए शाशैरिक असमर्थता के बावजूद विश्वास दिलाने की कोशिश करता है, पर वह कुछ बोल नहीं पाता। हाँ पर उसकी खांसी जरूर सीना थामें उसकी स्थिति का ब्यान करने लगती है। उसकी शाशैरिक असमर्थता निरन्तर शोषण के शिकार का दुष्परिणाम है।

“लोग भूल गये हैं! इस काव्य संग्रह की रचनाएँ समाज में मानवीय रिश्तों की पहचान खो जाती है | कवि महसूस करता है कि अन्याय और दास्ता के पोषक और समर्थक व्यक्तियों ने मानवीय रिश्तों को इस हद तक बिगाड़ दिया है कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला जन हर मौके पर अपने आप को पराजित पाता है। ‘दयाशंकर’ शीर्षक कविता में कवि ने समाज के कटु यथार्थ का वर्णन किया है। इस कविता के शीर्षक में चित्रित गरीब तो और भी भयावह है। दयाशंकर बेचारा जो अपने परिवार के लिए दो वक्‍त की रोटी जूटा नहीं पाता, पत्नी को बुआ कहाँ से खिलायें। किसी तरह पत्नी बच्चों से अलग बचाकर चार पुए बनाकर अपने पति को खाने के लिए देती है, मानो पुए ही उनका मधुर सपना हो, पर जैसे ही वे खाने बैठते हैं, बच्चे जग जाते हैं। इस कविता में कवि ने जिस प्रकार दयाशंकर की आर्थिक स्थिति उसकी पत्नी की इच्छाओं और भावनाओं का चित्रण किया है, वह जीवन के कटु संघर्ष का यथार्थ है।

“कुछ पते कुछ चिटिठयाँ” : इस काव्य संग्रह की कविता “दयावती का कुनबा’ शीर्षक कविता में नारी की करूणा स्थिति का यथार्थ चित्रण है। ‘रघुवीर सहाय ने दयावती के जीवन की लम्बी कहानी को संक्षिप्त रूप दिया है| दयावती के पिता अपने सिर का बोझ कम करने के लिए दयावती को किसी वर के हाथ में देता है।

एक अन्य कविता “कस्बे में दिन ढले’ काव्य में कवि ने भारत के छोटे से कृषक परिवार का चित्र अंकित किया है। कवि का ध्यान गाँव की लड़की सुलगाती हुई लालटेन छाये हुए कोहरे किसी को बेध्यान नहीं कर पाया है-

“युवती के चेहरे पर

लालटेन की आभा

अब और कोर रे में

खोया हुआ आँगन

करती हूँ पार उसे रोशनी लिए युवती |”

कवि समाज के विभिन्‍न वर्ग के लिए हमदर्दी है। “रघुवीर सहाय स्वाधीन भारत के उन महत्वपूर्ण रचनाकारों में से थे। जिनकी रचनाओं में स्वातंत्रयोत्तर भारत के विविध रूप और समस्याएँ सम्पूर्णता से उद्घाटित हुई है। उनकी रचनाएँ गतिशील जीवन यथार्थ से हमेशा सार्थक संग्रह बनाए रही है।”

वस्तुत: रघुवीर सहाय स्वतंत्र भारत के उन विरले रचनाकारों में से है, जिन्होंने न केवल समकालीन जीवन के यथार्थ को सम्पूर्णता से साक्षात्कार किया, बल्कि उस यथार्थ को बदलने की कोशिश की | उनकी रचनाओं में एक ओर यदि सामान्य: मनुष्य की पीड़ा, बेबसी एवं यंत्रणा का चित्रण है, तो दूसरी ओर इन मनुष्य विरोधी स्थितियों का प्रतिरोध भी है। उनकी रचनाएँ मनुष्य विरोधी स्थिति की पहचान करती है और फिर उसे बदलने के लिए प्रेरित करती है।

संदर्भ :

  1. डॉ. मोहिनी टाया, रघुवीर सहाय का जीवन एवं रचना संसार, पृ. सं 34
  2. सम्पा. अज्ञेय, दूसरा सप्तक, पृ. सं 44॥
  3. वही, पृष्ठ संख्या 443
  4. वही, पृष्ठ संख्या 450
  5. रघुवीर सहाय, सीढ़ियों पर धूप में, पृ. सं 82
  6. वही, दादा तुझे क्‍या मतलब’ पृ. सं 95
  7. वही, आत्महत्या के विरुद्ध, पृ. 72
  8. वही, पृ. 32
  9. डॉ. अनन्त तिवारी, रघुवीर सहाय की काव्यानुभूति और भाषा, पृ. 46
  10. डॉ. मोहिनी टाया, रघुवीर सहाय का जीवन एवं रचना संसार, पृ. 49

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