राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और उनकी राष्ट्रीयता-डाॅ. मुकेश कुमार

साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, दीपक भी होता है। राष्ट्रीय साहित्य रूपी विशाल दीपक में अनेक बत्तियाँ अपना प्रकाश फैला रही थी | जन आक्रोश को उत्पन्न एवं विस्तार दे रही थी। इन अनेक बत्तियों में एक महत्त्वपूर्ण बाती थी मैथिलीशरण गप्त जी। गुप्त जी का जीवन वृत्त, व्यक्तित्व एवं कृतित्व तीनों एक दूसरे के पोषक थे। उनके पारिवारिक परिवेश ने कवि को वैष्णव व्यक्तित्व दिया तो इस वैष्णव व्यक्तित्व से अतीत के गौरव के गान, वर्तमान से खिन्‍नता तथा भविष्य के संकल्प को जमाया। ऐसे अनेक व्यक्तित्वों की वाणी में औज, स्वाभिमान, संघर्ष चेतना जैसे गुण और उनमे जन्मे साहित्य से राष्ट्रीय काव्यधारा साहित्य का प्रादुर्भाव होता है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी साहित्य एवं भाषा जगत्‌ के विलक्षण नक्षत्र थे। युग का निर्माण युग निर्माता करते हैं और युग निर्माता वे कहलाते हैं जो उनकी जीवन-गाथा तथा उनके कार्य-कलाप तत्कालीन युग के इतिहास का अकाट्य अंग बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति ही युग के मुख्य सूत्रधार और निर्माता कहलाते हैं।

“वह दिन था 3 अगस्त 1886 जब हिन्दी साहित्य के प्रखर नक्षत्र, माँ भारती के विशद्‌ पुत्र कालजयी कवि स्व. मैथिलीशरण गुप्त का जन्म बुन्देलखण्ड जिले झांसी के चिरगाँव नामक स्थान पर हुआ था। आप गहोई वैश्व जाति (कनकने) के सेठ रामचरण और माता काशीबाई की पाँच संतानों में तीसरे नम्बर की संतान थे | आपके पूर्वज मूलतः बुन्देलखण्ड के पद्मावती गाँव के रिहायशी थे, जो बाद में मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले के भांडेर नामक स्थान पर बस गये। यह स्थान चिरगाँव से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है | पाँच पीढ़ियों के बाद यह परिवार चिरगाँव में आकर बस गया। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के पिता अपने दो छोटे भाईयों श्री घनश्याम दास और श्री भगवान दास के साथ एक संयुक्त परिवार में रहते थे | इस परिवार की गणना अत्यन्त धनी परिवारों में होती थी। घी और साहूकारी के पारम्परिक व्यवसायों के अतिरिक्त दस के बारह गाँवों की जमींदारी थी। इसके अतिरिक्त चिरगाँव और झांसी में भी काफी अचल सम्पत्ति थी।”

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा चिरगाँव के एक विद्यालय में हुई | यह विद्यालय उनके घर के अहाते में ही स्थित था। इसी विद्यालय में अध्ययन के दौरान मुन्शी अजमेरी से उनकी मित्रता गहरानी शुरू हुई थी जो मृत्यु तक बरकरार रही | गुप्त जी की प्रारम्भिक शिक्षा पं. दुर्गाशंकर की छत्रछाया में सम्पन्न हुई ।

गुप्त जी ने 12 वर्ष की आयु में बृजभाषा में प्रार्थना गीत के रूप में अपनी पहली कविता लिखी | 1890 से 1903 के बीच उन्होंने दोहे चौपाई और छप्पय के रूप में कविताएँ लिखी | 1904 में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली ‘वैश्य प्रकारक’ पत्रिका में उनकी पहली कविता छपी | बाद में उनके काफी कविताएँ “सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई |

वर्ष 1907 में तत्कालीन हालातों ने गुप्त जी को राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित किया। उन दिनों मंडला जेल में बन्दी ‘तिलक’ ने एक नारा दिया था-स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।’ इस नारे ने भी मैथिलीशरण गुप्त जी को भारत-भारती लिखने के लिए उत्प्रेरित किया | उन्होंने 1912 के सितम्बर के पहले हफ्ते में भारत-भारती की कविताएँ पूरी कर ली थी। वर्ष 1914 ई.में इसका प्रकाशन हो सका |”

भारत-सरकार ने 1955 ई. में गुप्त जी को पद्मभूषण से सम्मानितकिया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 1962 में उन्हें एक अभिनन्दनग्रंथ भेंट किया और उसी वर्ष काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस द्वारा डी.लिट्‌. की (मानद उपाधि) से सम्मानित किया गया। इलाहाबाद में 1962 में जनवरी के दूसरे हफ्ते में सरस्वती की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन किया गया। इसअवसर में गुप्त जी को अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इलाहाबाद से श्री रायकृष्ण दास के पास बनारस गये और खजुराहो होते हुए चिरगाँव लौटे | इसी समय उन्हें दिल का एक दौरा पड़ा किन्तु शीघ्र ही वे स्वस्थ हो गये।

अन्ततः 12 दिसम्बर 1964 को रात्रि । बजकर 27 मिनट पर उन्हे दिल का एक और दौरा पड़ा और साहित्य का जगमगाता ध्रुव तारा अस्त हो गया। मृत्यु शैय्या पर सिरहाने से प्राप्त राष्ट्रकवि जी द्वारा लिखित कुछ पंक्तियाँ प्राप्त हुई-

“प्राण न पागल हो तुम यों,

पृथ्वी पर है वह प्रेम कहाँ ?

मोहमयी छलना भर है,

भटको न अहो अब और यहाँ

ऊपर को निरखो अब तो,

बस मिलता है चिरमेल वहाँ

स्वर्ग वही, अपवर्ग वही,

सुख सर्ग वही, निज वर्ग जहाँ |।”

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी भारतीय संस्कृति के अतीत के भव्य भावों एवं चरित्र के चतुर चितेरे हैं। वे अतीत के गौरव गायक हैं, वर्तमान के सूक्ष्म द्रष्टा हैं और भविष्य के कुशल सास्थी हैं।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने ‘भारत-भारती’ के अतीत खण्ड में वीरता का वर्णन किया है। जिसमें भारतीय वीर अपनी मातृभूमि की कर्मवीर बनकर रक्षा करते हैं | जिनके चेहरे पर सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी की वीरता दिखाई देती है। अर्थात्‌ मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम के पुत्र लवकुश को पात्र मानकर वीरता का परिचय दिया है-

“थे कर्मवीर कि मृत्यु का भी ध्यान कुछ धरते न थे,

थे युद्धवीर कि काल से भी हम सभी डरते न थे।

थे दानवीर कि देह का भी लोभ हम करते न थे

थे धर्मवीर कि प्राण के भी मोह पर मरते न थे।।“

अतीत काल में भारतवासी पूर्णतया स्वतंत्र थे। देश में धन-धान्य का अभाव नहीं था| शिल्प कला अपने पूर्ण विकास को प्राप्त कर चुकी थी-

“कामरूपी वारिदों के चित्र से,

इन्द्र की अमरावती के मित्र से

कर रहे नृप-शोध गगन स्पर्श हैं

शिल्प कौशल के परम आदर्श हैं।।”

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने सुरमनिवन्दित अपनी मातृभूमि कोभवानी का स्वरूप देते हुए लिखा है-

“जय-जय भारत-भूमि भवानी |

अमरों ने भी तेरी महिमा बारम्बार बखानी |

तेरा चन्द्र-वदन वट विकसित शान्ति-सुधा बरसाता है।

मलयानिल-निश्वास निराला नवजीवन सरसाता है।

हृदय हरा कर देता है यह अंचल तेरा धानी।

जय-जय भारत-भूमि भवानी | |

मैथिलीशरण गप्त जी की राष्ट्रीयतावाद के औचित्य को ठीक तरह समझकर ही जनता ने उन्हें राष्ट्र कवि का पद दिया है | उसकी महत्ता इस बात में है कि उन्होंने भारत को एक देखा और एक देखने की सबल प्रेरणा दी। भाषा, प्रदेश या प्रान्त की सीमाओं से वे परे थे –

“वही पंचनद, राजस्थान

प्राप्त जिन्हें हैं गौरव गान

वही बिहार, उड़िसा, बंग।

हैं अक्ष्य भारत के अंग।

युद्ध मध्य, पांचाल, पुलिन्द

चेदि, कच्छ, काश्मीर, कुलिन्द,

द्रविड़, मद्र, मालव, कर्णाट,

महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, विराट

कामरूप, किंवा आसाम,

सातों पुरियाँ चारो धाम,

टक-कटक तक एक अभंग

दुःख में, सुख में, सब है संग ।।”

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने नारी पर पुरुष के अत्याचार की निन्दा की है और रक्षित बनाने की माँग प्रस्तुत की है। ‘साकेत’ की ‘सीता’ और उर्मिला, ‘यशोघरा’ विष्णु प्रिया’ की विष्णुप्रिया आदि प्राचीन संस्कृति सम्पन्न पौराणिक या ऐतिहासिक व्यक्ति होने पर भी नवयुग के आदर्शनुकूल स्वाभिमान और स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है। कभी-कभी बौद्धिक तर्कों के साथ अपने अधिकारों की माँग करती है-

“वेदी के समक्ष, साक्षीकार सब वेदों को

ग्रहण किया था यह वाणि क्‍या इसलिए,

कौन योग पूर्ण होगा त्याग कर मुझको

धर्म के विरुद्ध ही तुम्हारा यह धर्म है |।”*

नारी ममता की मूर्ति है। प्राचीन भारत की नारी विशेष स्वतंत्रता की अधिकारिणी है | वे ज्ञान-विज्ञान तथा सामाजिक जीवन के विभिन्‍न क्षेत्रों में दक्षता प्राप्त थे। वे पवित्रता की मूर्ति थी | मर्यादा में रहकर जीवन यापन करती थी | वह त्याग की मूर्ति थी। आजकल की श्रीमती जैसी नहीं थी-

“है प्रीति और पवित्रता की मूर्ति सी वे नारियाँ,

है गेह में वे शक्तिरूपा, देह में सुकुमारियाँ,

गृहिणी तथा मन्त्री स्वपति की, शिक्षित है वे सती,

ऐसी नहीं हैं वे कि जैसे आजकल की श्रीमती ||”

प्राचीनकाल में गुरुकुल शिक्षा दी जाती थी | जिससे विद्यार्थियों को संस्कारवान बनाया जाता था। गुरुदेव का वन्दन किया जाता था। नित्य कर्म किया जाता था ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता था और जो आज देखा जाए न तो गुरुकुल शिक्षा रही और न ही ब्रह्मचर्य का पालन आज हर वस्तु बाजारीकरण बन गयी। इसी संदर्भ में कवि ने कहा है-

“विद्यार्थियों ने जागकर गुरुदेव का वन्दन किया,

निज नित्यकृत्य समाप्त करके अध्ययन में मन दिया।

जिस ब्रह्मचर्य-व्रत बिना हैं आज हम सब रो रहे।

उसके साहित्य वे धीर होकर वीर भी हो रहे | [7९

सारांश रूप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने काव्य सर्जन के माध्यम से समाज को राष्ट्रीय एवं संस्कृति का पाठ पढ़ाया । जो आज भी प्रासंगिक है।

संदर्भ –

  1. गुप्त स्मारिका, पृष्ठ 405–406–409
  2. वही, पृष्ठ 408
  3. वही, पृष्ठ 44॥
  4. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, भारत-भारती (अतीतखंड), पृष्ठ 42
  5. साकेत, पृष्ठ 22
  6. मंगलघाट, पृष्ठ 33
  7. हिन्दु, पृष्ठ 46
  8. विष्णुप्रिया, पृष्ठ 42
  9. भारत-भारती-अतीत खण्ड, पृष्ठ 59
  10. वही, पृष्ठ 6॥

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