सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के काव्य में चित्रित प्रेम-भावना-डाॅ. मुकेश कुमार

कवि अज्ञेय के काव्य में प्रेम की अवधारणा को स्पष्ट किया गया है। अज्ञेय की प्रेम-भावना में निरन्तरता है। उन्होंने प्रेम का प्रतिफलन विशुद्ध मानवीय रूप में किया तथा प्रेम-भावना में नैसर्गिकता के पक्षघर रहे। अज्ञेय के काव्य में प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र प्रणय-भाव से ही नहीं, अपितु व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी की गई | अतः इनके काव्य में विद्यमान प्रणय, वात्सत्य प्रेम, जनमानस के  प्रति प्रेम, प्रकृति-प्रेम, दार्शनिकता की ओर उन्मुख प्रेम तथा निराशाजनित प्रेम को स्पष्ट रूप से दर्शाके प्रेममाव को सम्पूर्ण रूप में प्रतिपादित करने का प्रयास किया गया है।

मानव जीवन में प्रेम का सर्वोच्च स्थाना माना गया है। प्रेम के बिना मनुष्य का जीवन अधूरा है। जहाँ प्रेम है वहाँ सब कुछ है प्रत्येक जाति, वर्ण एवं आयु के व्यक्ति का समाज के किसी दूसरे प्राणी से प्रेम-भाव स्वाभाविक है। जीवन जीने के लिए प्रेम की डोरी से अधिक शक्तिशाली अवलम्ब अन्य कोई नहीं | प्रेम मानव जीवन की सार्थकता प्रदान करता है।

अज्ञेय की प्रेम भावना में निरन्तरता है तथा आदि से लेकर अन्त तक वे पूर्णत्व की तलाश करते हैं। जिस प्रकार सावन के अन्धे को सर्वत्र हरियाली ही दिखाई देती है उसी प्रकार प्रेम रस में पगे मन को प्रकृति भी अपने मनोभावों के अनुरूप ही दिखाई देती है तथा प्रेम में मिलन की चाह को और अधिक बलवती बना देती है-

“प्यार के उन्‍्माद से भर, पंडुकी भी स्वर बदल कर,

सघन पीपल-डाल पर से थी बुलाती प्रणय-सहचर-

छा रहा सब ओर था अनुराग का कलहास।

वह मिलन की प्यास।”

जब किसी के प्रति प्रणय-भाव जागृत होता है तो प्रिय होने की चाह भी जन्म लेती है। अज्ञेय का प्रेमी-हृदय भी इस चाह से अछूता नहीं रहा है-

ओ उपास्य! तू जान कि कैसे अब होगा निर्वाह

इस प्रेमी उर में जागी है प्रिय होने की चाह|”

प्रेम के अनेक रूपों में अज्ञेय सराबोर हुए हैं, परन्तु प्रणय में रसानुभव हुआ वह अन्यत्र नहीं-

“गये दिनों में औरों से भी मैंने प्रेम किया है-

मीठा, कोमल, स्निग्ध और चिर-अस्थिर प्रेम दिया है।

आज किन्तु, प्रियतम! जागी प्राणों में अभिन व पीड़ा-

यह रस किसने इस जीवन में दो-दो बार पिया है।”

कवि अनुभव करता है कि उसके हृदय में प्रियतमा को पाने की चाह जन्म जन्मांतरों से चली आ रही है, परन्तु कभी भी उसने उसे सच्चे अर्थों में प्राप्त नहीं किया-

“प्रत्येक जीवन में तुम आती हो, एक अप्राप्य निधि की तरह

मेरी आँखों के आगे नाच जाती हो-मैं कभी तुम्हें पहुंच नहीं पाता।“

जब पुरूष अनुनय-विनय कर नारी को पाने में असमर्थ रहता है

तो उसका अहं जाग उठता है और वह कहता है-

“तोड़ दूँगा मैं तुम्हारा आज यह अभिमान |

तुम हंसों, कह दो कि अब उत्संग वर्जित है-

छोड़ दूं कैसे भला मैं जो अभीष्सित है?”

इस तथ्य में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि अलगाव प्रेम को द्विगुणित कर देता है। अज्ञेय ने भी अपनी प्रिया से दूर होने पर कुछ ऐसा ही अनुभव किया है-

“जब मैं तुम से विलग होता हूँ तभी मुझे

अपने अस्तित्व का ज्ञान होता है।

जब तुम मेरे सामने उपस्थित नहीं होती तभी

मैं तुम्हारे प्रति अपने प्रेम का परिणाम जान पाता हूँ।*

अज्ञेय अपने प्रेम को प्रकट नहीं करना चाहते। उनके अनुसार प्रेम की महानता कम हो जाती है-

“जान लिया तब प्रेम रहा क्या ? नीरस प्राणहीन आलिंगन

अर्थहीन ममता की बातें अनमिट एक जुगुप्सा का क्षण ।”

अज्ञेय ने अपने काव्य में यह स्पष्ट कह दिया है कि लज्जा आकांक्षा को और अधिक आकर्षक कर देती है। तभी तो प्रणय क्रीडा में रत कपोत और कपोती को देखकर वे कह उठते हैं-

“चंचु-द्वय की मंजुल क्रीड़ा, हर चुकी कपोती को क्रीडा

जागी अपूर्णता की पीड़ा।

लज्जा तो आकांक्षा को आकर्षक करने ही को है-

और प्रणय का चरम प्रस्फुटन आत्म-व्यंजना ही तो है।”

कपोती की लज्जा अज्ञेय को स्वाभाविक मर्यादा का आभास भी कराती है जब मानव प्रेम होकर भी प्रेम प्रकट करने में लज्जा अनुभव करता है-

…हाय तुम्हारी नैसर्गिकता। मानव-नियम निराला है-

वह तो अपने ही से अपना प्रणय छिपाने वाला है।”

प्रेम की पवित्रता का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि यह यज्ञ की ज्वाला है, खाला जी का घर नहीं है, इसमें अपनी आहुति देनी होगी । प्रेम के अनुभव को कटु कहने वालों को अज्ञेय जी रोगी की संज्ञा देते हैं-

“वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-

वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहनकारी हाला है।

मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-

मैंने आहुति बन कर देखा, यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है |”

अज्ञेय प्रेम में नैसर्गिकता के पक्षपाती रहे हैं| पक्षियों के छल-प्रपंच रहित प्रेम में वे निमग्न हो जाते हैं। निम्न पंक्तियों में खग-युगल के प्रेम में परस्पर विश्वास का सुन्दर चित्रण कि किस प्रकार पंछी यह देखकर आश्वस्त हो जाता है कि उसकी प्रिया भी उसके प्रेम में मतवाली है तथा दाना-पानी की खोज में उड़ जाता है-

“प्रात होते

सबल पंखों की अकेली एक मीठी चोट से

अनुगता मुझ को बना कर बावली को-

जाकर मैं अनुगता हूँ-

उस विदा के विरह के विच्छेद के तीखे निमिष में भी युता हूँ-

उड़ गया वह बावला पंछी सुनहला

कर प्रहर्षित देह की रोमावली को |”!

यह प्रेम तो मात्र संसार का है जिसमें प्रेमी-युगल इस संसार में रहने वाली संसारी हैं, परन्तु अज्ञेय के प्रणय का विरह-पक्ष अपरिमित है तथा इसमें संयोग की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। यथा-

“मैंने तुझे देखा है

असंख्य बार :

मेरी इन आँखों में बसी हुई है

छाया उस अनवद्य रूप की।

मेरे नासापुटों में तुम्हारी गन्ध

मैं स्वयं उससे सुवासित हूँ

मेरे स्तब्ध मानस में गीत की लहर सा

छाया है तुम्हारा स्वर |

और रसास्वाद : मेरी स्मृति अभिभूत है

मैंने तुम्हें छुआ है

मेरी मुट्ठियों में भरी हुई तुम

मेरी उंगलियों बीच छन कर बही हो-

कण प्रतिकण आप्त, स्पृष्ट, मुक्त?

मैंने तुम्हें चूमा है

और हर चुम्बन की तप्त, लाल अयस्कठोर छाप

मेरा हर रक्त कण धारे हैं।

वाह! पर मैंने तुम्हें जाना नहीं |”

शरीर का प्रत्येक रक्‍्तकण, रोम उसी से अभिभूत है और फिर भी उसे जाना न गया। प्यार के एक अंश की प्रतीति ही तो प्रेमी को होती है और उसी एक अंश की उपलब्धि रूप, गन्ध, स्वर एवं स्पर्श में समाई हुई है। यह स्मरण कृतज्ञतापूर्ण है तथा इसकी याद रोयें-रोंये में बसी हुई है।

अज्ञेय का विरह भावनाओं तक ही सीमित है तथा सम्पूर्ण वियोग संवेदना के रूप में ही वर्णित हुआ है, उसमें परिमाण का ढांचा नहीं है। उनका विरह बाहरी नाप-तोल से सम्बन्ध नहीं रखता, अपितु हृदय में गहरे में बैठा एक कीट है जो निरन्तर कचोटता रहता है। आकाश में बादल बरसते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्मृति के आसन को अमृत-नीर से धो रहे हैं। वर्षा के रूप में भी उन्हें अपनी प्रेमिका ही दिखाई देती है-

“वह आएगी-

पहले सारे बादल सी छरहरी, अयानी, लाज-लजी, अनजानी,

फिर मानो पहचान जान यह सब उस का ही है

गहराते उद्दाम हठीले यौवन से इठलाती

खुल-बन्द, खिले अंग, बेकल, सब-वौरन, मदमाती

मेरा ढांप लेगी नंग अपनी देह के बदले स्नेह से,

अभी सूखी रेत हूं पर हो जाऊंगा हरा, गति-जीवित, भरा,

बालू धारा बन जाएगी

अज्ञेय के काव्य में वात्सल्य-भावना

अज्ञेय के काव्य में वात्सल्य का अधिक खुल कर वर्णन नहीं हुआ, मात्र इसके इंगित ही प्राप्त होते हैं| परन्तु अज्ञेय के काव्य में जहां कहीं भी, जिस किसी रूप में भी वात्सल्य का वर्णन हुआ है, वह अत्यन्त स्वाभाविक सा प्रतीत हुआ है-

“ निश्चल, उदास परदों की ओट से झरे हुए आलोक को

..वत्सल गोदियों से मोद भरे बालक मचल मानों गए हों-”*

ढलते हुए सूर्य के प्रकाश की तुलना मां की वत्सल गोदियों से मचल गए बालकों से की गई है। मातृ-वक्ष हेतु तुनक-तुनक कर रोता हुआ शिशु तथा शिशु की किलकारी का माँ की नस-नस में व्याप्त हो जाना कितना स्वाभाविक है। शिशु के बदन पर मां की हंसी के प्रतिबिम्ब तथा धूप की तुलना अत्यन्त सुन्दर बन पड़ी है। एक अन्य कविता में नदी की तुलना मां से की गई है जो देखते ही बनती है-

“हम नदी के द्वीप हैं,

.वह हमें आकार देती है।

हमारे कोण, गलियां, अन्तरीप उभार, सैकत कूल,

सब गोलाइयां उस की गढ़ी हैं।

मां है वह। है, इसी से हम बने हैं।”*

मां-बेटे के परस्पर मान-मनौवल का कितना सुन्दर वर्णन है। बच्चे का हठ खिलौने से आरम्भ होता है परन्तु मां की असमर्थता ही शायद बच्चे को विवश कर देती है और अन्त में वह मात्र मिट॒टी की ही मांग करता है। इसी प्रकार नन्‍हें बुलबुल की लुभावनी अदाएं कवि को मुग्ध कर देती हैं और वह उसके साथ भी एक नया सम्बन्ध बना लेता है-

“अनार कच्चा था

पर बुलबुल भी शायद बच्चा था

रोज फिस्-फिर आता,

टुक्‌! टुक्‌! दो-बार चोंच मार जाता।

.तेरे साथ ओ बच्चा बुलबुल

एक नये सम्बन्ध में बहता है|”

अज्ञेय के काव्य में जनमानस के प्रति प्रेम-भावना साहित्य में प्रेम शब्द ‘बहुघंथी’ है। आत्मीय रिश्तों में लगाव अथवा प्रेम होना स्वाभाविक ही है, परन्तु अज्ञेय का प्रेम संकीर्णता के बन्धनों से परे पारिवारिक स्तर को बांध कर जनमानस-प्रेम के रूप में परिणत हो गया है। उनके जीवन में प्रेम है, परन्तु वह तो प्रेम की व्यापकता को खोज रहे हैं-

“ पर मैं अखिल विश्व का प्रेम खोजता फिरता हूँ

क्योंकि मैं उसके असंख्य हृदयों का गाथाकार हूँ।

..पर मैं अखिल विश्व की पीड़ा संचित कर रहा हूँ-

क्योंकि मैं जीवन का कवि हूँ |”?

कवि का जनमानस के प्रति प्रेम केवल अपने देशवासियों तक ही सीमित नहीं है अपितु वह तो “वसुघधैव कुटुम्बकम्‌’ के नारे पर विश्वास रखता है। वह सत्ता की होड़ में हो रहे विभिन्‍न राष्ट्रों के मध्य युद्ध का विरोध करता है-

“बन्दूक के कुन्दे से

हल के हत्थे की छुअन

हमें अब भी अधिक चिकनी लगती,

संगीन की धार से

हल के फाल की चमक

अब भी अधिक शीतल

और हम मान लेते कि उधर भी

मानव मानव था और है

उधर भी बच्चे किलकते हैं और नारियां दुलराती हैं… ।/४

वह जानता है कि इस मानव-लोक में आजीवन संघर्ष करना पड़ता है, परन्तु फिर भी वह इसे छोड़ना नहीं चाहता-

“इनसान है कि जनमता है

और विरोध के वातावरण में आ गिरता है

उसकी पहली सांस संघर्ष का पैंतरा है

उसकी पहली चीख एक युद्ध का नारा है

जिसे यह जीवन भर लड़ेगा।”*

अज्ञेय के काब्य में प्रकृति प्रेमभावना

प्रकृति सभी की सहचरी है| किसी युग की काव्यानुभूति के निर्माण में प्रकृति का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है क्‍योंकि काव्य के माध्यम से मानव-जीवन को सम्पूर्ण रूप से व्यक्त किया जाता है तथा प्रकृति इस समग्रता के बाहर कभी नहीं हो सकती | कवि अज्ञेय ने भी इस तथ्य का पूरा ध्यान रखा है। वह तो प्रकृति को खुले मन से अपना बन्धु स्वीकारते हैं-

“बन्धु हैं नदियां : प्रकृति भी बन्धु है

और क्‍या जाने, कदाचित्‌

बन्टू

मानव भी |”

प्रकृति की गोद में अज्ञेय जी को अपूर्व शान्ति प्राप्त होती है। वे प्रफुल्लित कर देने वाली ममतामयी प्रकृति मां के सौन्दर्य में खो कर शहरी जीवन की बेचैनी को भूल जाना चाहते हैं-

“क्षण भर भुला सकें हम

नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट

और न मानें उसे पलायन

क्षण भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,

पौधे, लता-दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-फुनगे,

फुनगी पर पूंछ उठाकर इतराती छोटी सी चिड़िया।”

कवि ने सुबह-सवेरे प्रकृति के रूप का अत्यन्त मादक वर्णन किया है, प्रकृति-प्रेम में पगे वे कहते हैं-

‘भोर की स्निग्ध बयार जगी,

तृण बालाओं की मंगल रजत-कलसियों से

कुछ ओस बूंद झरे,

चिड़ियों ने किया शोर

आकारों में फिर रंग भरे,

गंधों के छिपे कोश बिखरे…|””

इस प्रकार कवि इन प्राकृतिक दृश्यों से एकाकार हो जाना चाहता है। प्रकृति-प्रेम में रंगा वह आगे बढ़ते रहने का इच्छुक है। इस यात्रा में उसे केवल एक पहाड़ी युवती के साथ की इच्छा है-

“नीला नभ, छितराये बादल, दूर कहीं निर्झर का मर्मर

चीड़ों की ऊर्ध्वग भुजाएं भटका सा पड़कुलिया का स्वर,

संगी एक पार्वती बाला, आगे पर्वत की पगडण्डी :

इस अबाध में में होऊं बस बढ़ते ही जाने का बन्दी |”

जब मन में प्रणय का भाव जागृत होता है तो प्रकृति-प्रेमी को प्रकृति भी अपने मनोभावों के अनुकूल जान पड़ती है अर्थात्‌ उसका प्रेम इतना गहरा है कि प्रकृति उसके हर्ष तथा विषाद की साथी बन जाती है-

“सखि! आ गए नीम को बौर!

हुआ चित्रकर्मा वसन्‍त अवनी-तल पर सिरमौर |

आज नीम की कटुता से भी लगा टपकने मादक मघु-रस

क्यों न फड़क उठे फिर तड़पती विहलता से मेरी नस-नस |”

कवि का प्रिय तो उसके पास नहीं है, परन्तु ऐसे मादक प्राकृतिक

वातावरण में उसे प्रिय के साथ व्यतीत किए गए क्षण स्मरण हो जाते हैं-

“क्षणफ-भर अनायामस हम याद करें!

तिरती नाव नदी में,

धूल भरे पथ पर असाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,

हंसी अकारण खड़े महा-वट की छाया में,

बदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलक-लट,

चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े…”

अज्ञेय का प्रेमदार्शनिकता की ओर

प्रत्येक युग की निरन्तर बदलती परिस्थितियां एवं संदर्भ बुद्धिजीवी विशेषतया चिन्तकवर्ग के मस्तिष्क में नवीन प्रतिक्रियाओं के उद्भव का कारण बनते हैं। सामान्य व्यक्ति भी परिवर्तित मूल्यों से प्रभावित होता है परन्तु चिन्तकवर्ग में यह प्रभाव सम्पूर्ण मानवता के परिप्रेक्ष्य में दार्शनिक स्तर तक पहुंच जाता है | नये मूल्यों की खोज में सम्पन्न दृष्टि ही नवीन दर्शन की जन्मदात्री है। यह नवीन दर्शन मानव-जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करता है। प्रत्यूक मानव के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जो देश व काल की सीमाओं से परे हैं, परन्तु कौन इन क्षणों को दुहरा सका है अथवा अपने जीवन में ला सका है। यह तो स्वयं ही आ जाते हैं-

“होते हैं क्षण : जो देश-काल मुक्त हो जाते हैं।

होते हैं : पर ऐसे क्षण हम कब दुहराते हैं?

या क्‍या हम लाते हैं?

उनका होना, जीना, भोगा जाना

है स्वैरसिद्ध, सब स्वतःपूर्त

…हम इसीलिए तो गाते हैं|”

अज्ञेय के काव्य में निराशाजनित प्रेमभावना

प्रेम में निराशा अथवा वेदना का भी महत्वपूर्ण स्थान है, यह कविता और जीवन दोनों का सत्य है। कवि अज्ञेय भी इससे बच नहीं पाए और जीवन में सम्पूर्णता तथा उदात्तता लाने के लिए जीवन के हर पहलू को अनुभव करना आवश्यक भी है। अज्ञेय-काव्य में निराशाजनित प्रेम के बिना पूर्णता का अभाव रह जाता। प्रेम में निराशा प्रेमी के लिए परीक्षा-काल है| जिसने सदा संयोग का ही अनुभव किया, वह प्रेम की सत्यानुभूति कर ही नहीं सकता। कवि अज्ञेय के जीवन में प्रेमजनित निराशा अनायास ही आ गई जिसका पूर्वानुमान उन्हें कदापि नहीं था-

“क्या खण्डित आशाएं ही हैं धन अपने जीवन का?

क्यों टूट नहीं जाता है धीरज इस कुचले मन का?

कहते हैं, घटनाओं की पहले घिरती छायाएं-

क्यों नहीं मिलन क्षण में ही फिर मेरा माथा ठनका?

कवि को विश्वास है कि जब उसके हृदय का संताप चर्म सीमा पर पहुंच जाएगा तो प्रिय से उसका तादात्म्य स्थापित हो जाएगा तथा वह उदात्तता के शिखर पर अधिष्ठित हो शान्ति अनुभव कर सकेगा-

“जब विरह पहुंच सीमा पर आत्यन्तिक हो जाता है-

होकर वह आत्म-भरित तब प्रियतम को पा जाता है।

सागर जब छलक-छलक कर भी शून्य जमा पाता है-

तब किस दुस्सह स्पन्दन से उसका डर भर आता है।”

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप से हम कह सकते हैं कि अज्ञेय प्रेम के जीवंत क्षणों के उपासक हैं। वे प्रेम में पगे प्रत्येक क्षण का भरपूर आनन्द लेना जानते हैं। अज्ञेय का प्रेम व्यक्तिनिष्ठ ही नहीं रहा अपितु काल, स्थान, परिवेश की संकीर्णता को लांघकर अत्यन्त व्यापक हो गया है। शोषित जनसमुदाय से कवि को लगाव है तथा प्रेम की व्यापकता में अज्ञेय विश्वबन्धुत्व के कवि सिद्ध होते हैं।

संदर्भ

  1. सम्पा. कृष्णदत्त पालीवाल, अज्ञेय रचनावली, विश्वप्रिया, पृष्ठ संख्या 64
  2. वही, पृष्ठ संख्या 62
  3. वही, पृष्ठ संख्या 63
  4. वही, पृष्ठ संख्या 70
  5. वही, पृष्ठ संख्या 80
  6. अज्ञेय, सदानीरा भाग-4, विश्वप्रिया, पृष्ठ संख्या 39
  7. सम्पा. कृष्णदत्त पालीवाल, अज्ञेय रचनावली, विश्वप्रिया, पृष्ठ संख्या 82
  8. सम्पा. कृष्णदत्त पालीवाल, अज्ञेय रचनावली, एकायन, पृष्ठ संख्या 494
  9. अज्ञेय, सदानीरा भाग-4, विश्वप्रिया, पृष्ठ संख्या 39
  10. अज्ञेय, सदानीरा भाग-4, मैंने आहुति बनकर देखा, पृष्ठ संख्या 470
  11. अज्ञेय, सदानीरा भाग-4, रात होते प्रात होते, पृष्ठ संख्या 48–482
  12. अज्ञेय, सदानीरा भाग-4, ओ निःसंग ममेतर, पृष्ठ संख्या 34
  13. आषाढ़स्य प्रथम दिवसे, पृष्ठ संख्या 498
  14. पार्क की बेंच, पृष्ठ संख्या 472
  15. नदी के द्वीप, पृष्ठ संख्या 24॥
  16. कच्चा अनार बच्चा बुलबुल, पृष्ठ संख्या 488
  17. कवि, पृष्ठ संख्या 436
  18. युद्ध विराम, पृष्ठ संख्या 446
  19. पक्षघर, पृष्ठ संख्या 457
  20. बन्धु हैं नदियां, पृष्ठ संख्या 235
  21. हरि घास पर क्षण भर, पृष्ठ संख्या 235
  22. रात कटी, पृष्ठ संख्या 3
  23. गोप-गीत, पृष्ठ संख्या 457
  24. एकायन, पृष्ठ संख्या 79
  25. हरि घास पर क्षण भर, पृष्ठ संख्या 236
  26. होते हैं क्षण, पृष्ठ संख्या 493
  27. एकायन, पृष्ठ संख्या 409
  28. पृष्ठ



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