साहित्य, मीडिया और आजीविका-डाॅ. मुकेश कुमार

संसार जगत में मीडिया, बना हुआ है दर्पण।
अशेष नहीं इससे कुछ भी, सब कुछ इसके अपर्ष।।
भाषा भी कहाँ अछूती, संग इसके वही है।
हिन्दी के प्रचार में, मीडिया रची बसी है।।
सामाजिक जीवन मनुष्य के साथ अटूट ढंग से जुड़ा हुआ है। इस जुड़ाव के परिणामस्वरूप ही
मनुष्य और समाज के बीच कुछ सुनिश्चित और अपरिहार्य सम्बन्ध स्थापित होते हैं। हम यह भी कह सकते हैं
कि सामाजिक जीवन मनुष्य निर्माण का आधार होता है। मनुष्य के निर्माण में उसकी दो क्षमताएँ सहायक होती
हैं-बौद्धिक क्षमता तथा संवेदनात्मक क्षमता। साहित्य मनुष्य की संवेदनात्मक क्षमता का परिणाम है। यह बात
यहाँ दोहरा देनी चाहिए कि मनुष्य के अनुभव, अनुभूति और संवेदना का विस्तार उसकी सामाजिक अवस्था में ही
होता है। अर्थात् किसी भी कला के सृजन का प्रत्यक्ष या परोक्ष आधार समाज ही है। साहित्य और मीडिया का
आपसी सम्बन्ध गहरा है। साहित्य का भी समाज पर प्रभाव पड़ता है और मीडिया का भी। साहित्य में जो पत्र-
पत्रिकाएँ आएं वह सब मीडिया की ही देन है। आज के अन्तरताना युग में मीडिया का विस्तार देश के कोने-कोने में
फैल गया जिससे जो उपलब्ध साहित्यिक किताब नहीं थी वह इंटरनेट पर दिखाई देती है। आज घर बैठे ही अपनी
परीक्षा की तैयारी कर सकते हैं। इसी प्रकार से साहित्य का मीडिया के साथ गहरा सम्बन्ध है।

आज मीडिया की क्रांति का युग है। प्रतिपल दुनिया बदल रही है। कम्प्यूटर युग ने संसार क्रांति
में बड़े वेग से कार्य किया है। समाज का कोई ऐसा पहलु नहीं है जो इस क्रांति से अछूता है। मीडिया के सभी
माध्यम भी इसमें समाहित है। चाहे वह दूरदर्शन हो, आकाशवाणी हो समाचार पत्र हो, पत्रिकाएं हों या सिनेमा हो।
हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए सम्पूर्ण विश्व में प्रयास हो रहे हैं। भारत वर्ष में इसके प्रचार-प्रसार के लिए
उन्नीसवीं व बीसवीं सदी में अनेक संस्थाओं ने लेखकों, कवियों ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिनमें साप्ताहिक
पत्रिकाएँ उदन्त मार्तण्ड को सर्वप्रथम श्रेय जाता है। ”सन् 1893 में स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी
साहित्य सम्मेलन प्रयाग 1910, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास 1918 आदि अनेक संस्थाओं ने हिन्दी के
उज्ज्वल भविष्य के लिए अद्वितीय कार्य किया है।“1 हिन्दी के प्रचार-प्रसार में जितना महत्त्वपूर्ण योगदान
समाचार पत्र-पत्रिकाओं का है, उससे कहीं अधिक सिनेमा व आकाशवाणी ने कार्य किया है। हिन्दी सिनेमा के
कारण हिन्दी भाषा जितनी लोकप्रिय हुई है उतनी शायद ही किसी अन्य माध्यम से हुई हो। हिन्दी के प्रचार-प्रसार
में अपनी सशक्त भूमिका निभायी है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय व उसके बाद बने धार्मिक व देशभक्ति से
ओत-प्रोत सिनेमा का योगदान अविस्मरणीय है। आकाशवाणी के माध्यम से हिन्दी सम्पूर्ण भारतीयों की
लोकप्रिय भाषा बनी। हिन्दी के देश भक्ति के तराने पूर्व से पश्चिम तक व उत्तर से दक्षिण तक बड़ी श्रद्धा के साथ गाए गए। आज हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। विदेशी भी हिन्दी का प्रयोग करते हैं।
हिन्दी के उपयोग और विश्व में इसके प्रचार-प्रसार के लिए अब आवश्यक प्रौद्योगिकी उपलब्ध है। विश्व में
हिन्दी का बढ़ावा-बढ़ता जा रहा है। हिन्दी इस दृष्टि से काफी समृद्ध भाषा है। ”विश्व में अब वही भाषा लोकप्रिय
होगी जिसका व्याकरण विज्ञान संगत होगा। जिसकी लिपि के टाईप का विकास चाल्र्स विल्किन्स और पंचानन
कर्मकार के द्वारा 1770 ई. मंे किया गया। हिन्दी मंे पुस्तकों, पत्रिकाओं, समाचार पत्रों की बाढ़ सी आ गई।“2
राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव से बढावा देने में हिन्दी फिल्मों का बड़ा हाथ है। लोग
हिन्दी फिल्मों के संवाद रटकर देश के किसी भी कोने में वार्तालाप का सिलसिला प्रारम्भ कर लेते हैं। कैमरे के
आविष्कार के कारण फिल्मों के निर्माण का सिलसिला चल पड़ा। ”दादा साहेब फाल्के ने राजा हरिश्चन्द्र नामक
मूक फिल्म बनायी। यह फिल्म 3 मई 1913 को मुम्बई मंे दिखाई गयी। आज हमारे देश में औसतन 100 हिन्दी
फिल्में हर साल बनती हैं।“3 ये हिन्दी और अहिन्दी भाषी दोनों क्षेत्रों में देखी जा सकती है। फिल्म की तरह रेडियो
भी इस व्यस्त समाज में सामाजिक स्नेहक की भूमिका निभाता है। वह लोगों को बातचीत का आधार प्रदान
करता है। सूचना, शिक्षा मनोरंजन के साथ-साथ वह विकास में सहभागिता के अवसर भी लोगों को प्रदान करता
है। भले ही देश में केवल चालीस प्रतिशत लोगों की मातृभाषा हिन्दी हो, रेडियो के कारण ही दो तिहाई से अधिक
आबादी हिन्दी कार्यक्रमों को सुन समझ सकती है। विकास के प्रारम्भिक दौर में जब निरक्षरता सबसे बड़ी चुनौती
थी तब आकाशवाणी ने ही अनपढ़ किसानों को खेती बाड़ी की आधुनिकतम जानकारी उपलब्ध कराकर हरितक्रांति को सफल बनाने में अपना योगदान दिया। अनेक कवि,लेखक, पत्रकार और नाटयकर्मी हिन्दी के सशक्त मंच के रूप में आकाशवाणी ही प्रयोग करते हैं। अन्य देशों में हिन्दी भाषा को सिखाने का कार्य करते हैं। वही अहिन्दी भाषी लोग उनकी सहायता से हिन्दी भाषा सिखने काकार्य कर रहे हैं। टेलीविजन भी प्रौद्योगिकी की ऐसी देन है जिसने घर-घर में बिना बुलाये मेहमान की तरह अपना
कब्जा जमा लिया है। उसके कारण लोगों की वेशभूषा चाल-ढाल, बोलचाल भोजन सम्बन्धी आदतें सोने की
अवधि और परिवार में पारस्परिक संवाद पर गहरा असर पड़ा है। उपग्रह चैनलों के कारण हिन्दी के कार्यक्रमों का
विस्तार न केवल देश में बल्कि विदेशों में तेजी से हो रहा है।

कार्यक्रमों मंे हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अधिकतर बढ़ाया गया। टाइपराइटरों व मशीनों का
बड़ा योगदान है। हिन्दी में टंकण की सुविधा के लिए गोदरेज की टंकण मशीनें बड़ी कारगर सिद्ध हुई। इसके बाद
इलेक्ट्रोमेकेनिकल टेलीपिं्रटर भी देवनागरी में बनाए गए। ”अस्सी के दशक में इलेक्ट्रानिक टाइप-राइटर,
इलेक्ट्रानिक टेलीपिं्रटर और कम्पयूटरों का प्रयोग बढ़ा।“4 हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए इस नयी प्रौद्योगिकी
को अपनाने की आवश्यकता महसूस की गई। भारत सरकार ने इस दिशा में बड़ा योगदान दिया और पहल की
टाइपराइटर, टेलीपिं्रटर और कम्प्यूटरों के लिए कुंजी पटल तैयार किये। भारतीय भाषाओं के लिए टेक्नोलाॅजी
विकास परियोजना के माध्यम से कई नये कार्यक्रम शुरू हुए।

कम्प्यूटरों पर कार्य करने के लिए अब हिन्दी के अनेक साफ्टवेयर उपलब्ध हैं। आफटेक
लिंग्विस्ट, रिक्रप्ट मौजेक के अतिरिक्त लीला जैसे कार्यक्रमों को उपयोग काफी हो रहा है। हिन्दी, अंग्रेजी जानने

वाले विदेशियांे और हिन्दी सीखने वाले लोगों के लिए इस पैकेज का विकास सी-डेक पुणे ने किया है। मंत्र, लीप,
आई.एस.एम. आदि अन्य पैकेज उपलब्ध हैं। रेलवे मंे सुलिपि और पर्यटन केन्द्रों मंे तेजी से बढ़ रही है।
भारत के सरकारी अमलों की वेबसाइटों पर अब हिन्दी भी स्थान पा रही है और इन्टरनेट

(अन्तरताना) पर बहुत कुछ जानकारी हिन्दी मंे
उपलब्ध है। मीडिया भी इन्टरनेट पर हिन्दी वालों का बराबर ध्यान रख रहा है। ‘अमर-उजाला’, ‘दैनिक-जागरण’
आदि हिन्दी के दैनिक समाचार पत्रों के इंटरनेट संस्करण इसकी पुष्टि करते हैं। इसके अतिरिक्त हिन्दी की
प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाएं भी इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं। ”सन् 2004 में राजेन्द्र यादव के सम्पादकत्व मंे
निकलने वाले कथामासिक ‘हंस’ का भी इन्टरनेट संस्करण आना शुरू हो गया।“5 पर खेद की बात यह है कि
भारत में राष्ट्रपति की बेवसाइट अभी हिन्दी में नहीं है। अब की बार माननीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी ने
सांसद में हिन्दी भाषा को अपनी मातृभाषा मानकर हिन्दी भाषा में शपथ ग्रहण की। ”राजभाषा विभाग की
बेवसाइट पर पत्रिकाओं की सूची भी दी गई है। जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा प्रकाशित होने वाली 48 पत्रिकाआंे
के नाम हैं।“6 सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय की बेवसाइट भी हिन्दी में है। ”भारतीय रिजर्व बैंक की मूल अंग्रेजी
बेवसाइट की हिन्दी प्रतिकृति उपलब्ध है। बैंक आॅफ बड़ौदा ने अपना ग्राहक पंजीकरण फार्म हिन्दी में रखा है।
इसी तरह भारतीय स्टेट बैंक इलाहाबाद बैंक आदि की बेवसाइट हिन्दी मंे है। रेलवे की साइट हिन्दी में है।
भारतीय जीवन बीमा निगम की हिन्दी साइट में वर्णनात्मक सामग्री हिन्दी में दी गई है।“7 साहित्य अकादमियों
की ओर देखा जाये तो राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी सबसे आगे है। यहाँ हिन्दी मंे साइट के साथ-साथ हिन्दी
मंे भी पुस्तकों की खोज की सुविधा भी है।

हिन्दी के उपयोग और विश्व के प्रचार-प्रसार के लिए अब आवश्यक मीडिया, प्रौद्योगिकी
उपलब्ध है। विश्व की अब वही भाषा लोकप्रिय होगी जिसका व्याकरण विज्ञान संगत होगा। जिसकी लिपि
कम्प्यूटर की लिपि होगी। हिन्दी इस दृष्टि से काफी समृद्ध है। हमें इसे और अधिक समृद्ध बनाने में महत्त्वपूर्ण
योगदान देना होगा।

संदर्भ-
1. हिन्दी भाषा-डाॅ. मीरा दीक्षित, पृष्ठ संख्या 72
2. हिन्दी भाषा-डाॅ. मीरा दीक्षित, पृष्ठ संख्या 73
3. हिन्दी भाषा-डाॅ. मीरा दीक्षित, पृष्ठ संख्या 74
4. हिन्दी भाषा-डाॅ. मीरा दीक्षित, पृष्ठ संख्या 75
5. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास-डाॅ. बच्चन सिंह, पृष्ठ संख्या 310, 280-281
6. दैनिक जागरण-14-9-2014 व दैनिक सवेरा टाईम 14-9-2014

7. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, हिन्दी की विकास यात्रा, पृष्ठ संख्या 822

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