सियारामशरण गुप्त के काव्य में राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक नवजागरण -डाॅ. मुकेश कुमार

भारतीय संस्कृति के परम उपासक सियारामशरण गुप्त जी का जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के अर्न्गत झांसी-कानपुर राजमार्ग पर स्थित चिरगाँव कस्बे में भाद्र पूर्णिमा, बुधवार सम्वत्‌ 1952 वि. तदनुसार 04 सितम्बर, 1895 ई. को हुआ | पिता का नाम-सेठ रामचरण जो अपने समय और संस्कृति के प्रसिद्ध कवि थे। सेठ रामचरण के पाँच पुत्र थे-महारामदास, रामकिशोर, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, चारुशीलाशरण। अग्रज राष्ट्रकवि मैथ्रिलीशरण गुप्त को राष्टकवि की उपाधि प्राप्त हुई | 29 मार्च सन्‌ 1963 ई. में सियारामशरण गुप्त जी का देहान्त हो गया।

आधुनिक हिन्दी काव्यधारा के द्विवेदी युग में सियारामशरण गुप्त जी का नाम श्रेष्ठ कवियों की श्रृंखला में लिया जाता है। वे अपनी काव्य रचना “मौर्य विजय’ में स्वदेश के अतीत के प्रति स्वाभाविक रूप से अपनी भारतीय संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ मानकर उसके गरिमा का बखान करते हैं। वे कहते हैं-

“साक्षी है इतिहास, हमीं पहले जागे हैं,                                                        

जागृत सब हो रहे, हमारे ही आगे है।

शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं,

कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे है |।”’

संतकवि सियारामशरण गुप्त जी ने राष्ट्रीय नवजागरण की शंखध्वनि के स्वर को मुखरित करने वाले ऐसे गीतों की रचना की है जिसमें भारत की सांस्कृतिक एकता एवं समन्वय की भावना पैदा हो। मातृभूमि के प्रति वफादार रहे | वे कहते हैं-

“मातृभूमि की मानवता का जागृत जयकारा,

फहर उठे ऊँचे से ऊँचे राह अविरोध उदार।

साहस अभय और पौरूष का यह सजीव संचार |

लहर उठे जन-जन के मन में सत्य अहिंसा प्यार ||”

राष्ट्रकवि सियारामशरण गुप्त जी केवल अपने राष्ट्र का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण चाहते हैं। उनके हृदय में प्रेम की भावना, मानवता, उदारता, त्याग की भावना आदि दिखाई देती थी-

“इसका उदार दान,

सबको दिये हैं दान

सबका लिये हैं क्षेम

संकुचित बन्धन का

इसमें नहीं है लेश,

फैलाकर होने इसको दे तू भुवन का,

होकर स्वयं अशेष,

देश अरे मेरे देश |॥*

सियारामशरण गुप्त जी के हृदय में भारत भूमि और भारतीय के प्रति असीम प्रेम तथा सम्मान का भाव है। अपने राष्ट्र-गौरव तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष को कवि ने अत्यन्त गौरव के साथ अपनी रचनाओं में उल्लासपूर्ण शब्दों के मा८ यम से अभिव्यंजित किया है | हमें अपने भारत देश पर गर्व है। क्योंकि भारत भूमि पर वेद, उपनिषद्‌, गीता, रामायण जैसे पवित्र ग्रंथों की रचना हुई | जिसके कारणM भारत देश विश्व का गुरू और उपदेशक बना | हमारे भारतवर्ष का इतिहास मधुर रहा है।

“धीर-वीर ये भारतीय होते हैं कैसे,

किसी देश के मनुज न देखे इनके जैसे,

है हम सबकी मातृभूमि, भयहारिणी माता,

बस तेरा ही रूप हमें जी से है भाता।

तेरा सा सौंदर्य सृष्टि में दृष्टि न आता,

तेरी शोभा देख स्वर्ग भी है सकुचाता।।”

सियारामशरण गुप्त जी कहते हैं कि सबका कल्याण करके कोई राष्ट्र अपना कल्याण करता है। कवि किसी एक जाति, राष्ट्र के कवि नहीं बल्कि जन-जन के कवि हैं। वे सब के हित के बारे में सोचते हैं। इसी बीच गुप्त जी ने एक आदर्श चिन्तन के परिवेश को उपस्थित किया। वे लिखते हैं-

“सबके लिए अभय है जग में

जन-जन में तेरा उत्थान

वैर किसी के लिए नहीं है

प्रीति सभी के लिए समान

सबका सुहित हमारा हित है

सार्वभौम हम सार्वजनीन,

अपनी इस असिच्धु धरा में,

नहीं रहेंगे होकर हीन ||

”भारत देश सदैव वसुघैव कुटुम्बकम का देश रहा है। महात्मा गांधी जी की सार्वजनीन भूमि के आधार पर गुप्त जी ने जिन आदर्शों तथा मूल्यों की स्थापना की है वे चिरकाल तक मानव की रक्षा करने में सक्षम है | कवि की लेखनी ने सभी में विश्वबन्धुत्व की भावना पैदा कर दी। वे कहते हैं-

“इस अपनी में जहाँ कहीं भी है जितने जन,

न कूल, न गोत्र, न जाति किसी में जिनका आसन,

वे सब अनेक संग हुए थे उच्च अधिष्ठित,

उस दिन के उस समारोह में स्वयं प्रतिष्ठित | |

संत कवि सियारामशरण गुप्त जी की राष्ट्रीयता का मूलाधार सुधारवाद है। अन्तरराष्ट्रीय संदर्भो में लिखा गया “उन्मुक्त’ कवि का ऐसा गीतिनाट्य है, जिसमें गाँधीवादी आदर्शों के आधार पर नवीन समाज व्यवस्था के निर्माण की ओर संकेत किया गया है। कवि ने अपनी विभिन्‍न काव्य रचनाओं में समकालीन दुर्व्यवस्था के प्रति न केवल क्षोभ व्यक्त किया है अपितु उसे दूरकर एक आदर्श समाज की स्थापना करने हेतु अपनी भावनाओं को मुखर अभिव्यक्ति प्रदान की है-

“इतना यह चारों ओर संकुचितपन है,

कितना यह चारों ओर परापहरण।

सम्पूर्ण अरक्षित आज यहाँ जीवन है,

किस नये प्रेम से वैर-विरोध-वरण है।

इस वसुधा को मैं प्यार करूँगा तब भी,

इस पर जो यह उन्मुक्त असीम गगन है।”

अतः कहा जा सकता है कि संत कवि सियारामशरण गुप्त जी राष्ट्रीयता के सजग सिपाही रहे हैं। उनका राष्ट्र प्रेम उनकी समस्त काव्य कृतियों में झलकता है | कवि की धारणा है कि अखण्ड तथा अविच्छिन्न देश की भावनाएँ ही राष्ट्रीय चेतना का आधार बन सकती है। उनकी काव्य रचनाओं में राष्ट्रीयता की शंख ध्वनि के जो स्वर झंकृत हुए हैं। वह राष्ट्र के प्रति उनका सम्पर्ण का प्रतीक है।

संदर्भ :

  1. सम्पा. ललित शुक्ल सियारामशरण गुप्त रचनावली, मौर्य विजय, पृष्ठ 67
  2. वही, खण्ड दो, नोआखाली, पृष्ठ 72
  3. वही, खण्ड एक, बापू, पृष्ठ 394
  4. वही, पृष्ठ 48
  5. वही, खण्ड एक, मौर्य विजय, पृष्ठ 47, 48
  6. वही, खण्ड दो जयहिंद, पृष्ठ 436–37
  7. वही, खण्ड दो, जय हिंद, पृष्ठ 442

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