सुमित्रानंदन पंत के काव्य में सांस्कृतिक चेतना-डाॅ. मुकेश कुमार

पंत की विचारधारा पर धर्म सम्बन्धी दृष्टिकोण से भारतीय धर्म का पूर्ण समर्थन नहीं मिलता। उन्होंने परम्परागत धर्म की रूढ़ियों से असंतुष्ट होकर निरीश्वरवाद की विचारधारा का समर्थन किया है और पाश्चात्य भौतिकवादी सभ्यता से प्रभावित होकर कवि ने धर्म को संकीर्ण अर्थ में न ग्रहण कर ‘मानव धर्म’ के अर्थ में लिया है। उन पर ईसाई धर्म का व्यक्ति, स्वतंत्र निरीश्वरवादी धर्म और कालान्तर में अरविन्द वादी विचारधारा का प्रभाव दीख पड़ता है।

पंत जी की दृष्टि में त्याग, विराग, अहिंसा, क्षमा, दया आदि अनेक आदर्शो की धार्मिक प्रवृत्ति ही धर्म की संज्ञा से अभिष्ठित की जा सकती है। कवि मानते हैं कि धर्म को निरपेक्ष सत्य समझना तथा उसे मनुष्यों का धर्म न बनाकर आदर्शों का धर्म बना देना धर्म की उपयोगिता को कम कर देना है। कवि धर्म के व्यापक क्षेत्र को स्वीकार करते हुए भी मानव धर्म को श्रेष्ठतर ही सिद्ध करते हैं। धर्म के विविध पहलुओं पर विचार करने पर ईश्वर की असीम सत्ता को स्वीकार करते हैं और उसे असीम दिव्य एवं घट घट व्यापी मानते हैं। विशुद्ध भगवद्‌ भक्ति को ही ईश्वर के साक्षात्कार का मार्ग समझते हैं।

त्योहार दो प्रकार के होते हैं धार्मिक त्योहार और राष्ट्रीय त्योहार | धार्मिक त्योहार में गणेश चतुर्थी, राम नवमी, होली, मकर संक्रान्ति, दीपावली आदि को स्थान दिया जाता है। राष्ट्रीय त्योहार में पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी, राष्ट्रीय नेताओं की जन्म जयंतियाँ, शिक्षक दिन आदि को स्थान दिया जाता है। इन त्योहारों और उत्सवों का आयोजन युगों से होता चला आया है। उत्सव और त्योहार मानव मन की किंचित उदास भक्ति भावना को जागृत कर उसे पवित्र करते हैं। सभी एक ही रंग में एक ही भाव में निमग्न होकर जीवन की कटुता, दुःख और कसक भूलने की कोशिश करते हैं।

पंत जी के काव्यों में कई उत्सवों और त्योहारों का सुन्दर वर्णन उपलब्ध होता है । जिसमें दीपावली, होली, मकर संक्रान्ति, स्वतंत्रता दिवस आदि प्रमुख हैं| इसके अलावा शरदोत्सव, वसंतोत्सव आदि उत्सवों का वर्णन भी पाया जाता है।

दीपावली –

हिन्दू त्योहारों में दीपावली अत्यंत महत्वपूर्ण है और सारे भारत में हिन्दू लोग इसे बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह त्यौहार दो दिन मनाया जाता है। अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी और अमावस्या के दिनों यह त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। माना जाता है कि चतुर्दशी को भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। इसी दिन हनुमान जयंती भी मनायी जाती है। अमावस्या को नरकासुर के वध से उत्साहित जनता ने दीपमालाओं से उस रात्रि को दीप्तिमान किया था। इसी दिन वामन भगवान ने बलि राजा के कारागार से लक्ष्मी और अन्य देवों को मुक्ति दिलाई थी। लंकापति रावण को मार कर रामचन्द्र जी सीता सहित इसी दिन अयोध्या पधारे थे। पंत जी ने अपने काव्य में दीपावली का वर्णन कुछ विशेष अर्थ में किया है। वे दीपावली के दिन जन मन को दीप्तिमान करने की प्रेरणा देते हुए लिखते हैं-

“दीप जलाओ, दीप जलाओ,

जीवन के जगमग स्वप्नों से

दीपों का आकाश सजाओ।”

पंत जी इस जगत को मिट्टी का दीपक और प्रेम को जीवन ज्योति मानते हैं। जिससे जन मन के अंधेरे कोने में हँसी, खुशी, गीत और स्वप्नों की ज्योति जगमगा उठे [ वास्तव में दीपावली दीप मालाओं का ही त्यौहार है। चारों ओर जगमगाते दीप मंडल और दीपमालाओं से आलोकित नगर गलियाँ चौराहे एवं नभ मंडल को देख कवि पंत भी प्रसन्‍न होते हैं। उन जलते दीपों को देख कवि को लगता है कि आज सहमस्रों नयन खोलकर घन अन्धकार सोच रहा है कि मानव जीवन का प्रागंण कैसे आलोकित होगा। मानव उर का मन्दिर कब से भीतर से तमसावृत है” वह कब और कैसे आलोकित होगा? दीपावली का सौन्दर्य ही कुछ अनोखा है। उस सौन्दर्य को चित्रित करते हुए कवि लिखते हैं –

“गृह तोरण गुम्बद मीनारें

दीपों की रेखा छवि से स्मित

कवि को लगता है कि ये दीपशिखाएँ मानव मन में पथराये हुए अन्धकार पर हंस रही हैं। फिर भी ये दीप श्री पंत जी को ‘भू जीवन की शोभा* से लगते हैं। उन असंख्य ज्योति कलियों से सब कुछ मुकुलित होता नजर आता है।

“अब नगर हाट डगरों के

शोभित गवाक्ष गृह तोरण,

रुपहली ज्योति कलियों से

मुकुलित छत गुम्बर प्रांगण ।*

पंत जी दीपावली के त्यौहार को जन मन को आलोकित करने वाले त्यौहार के रूप में देखते हैं। जो जीवन के तमस आत्मज्योति से आलोकित करने की प्रेरणा देता है। जब तक मानव का हृदय ज्योतित न होगा तब तक शत सहस्र दीपों की ज्योति से भी जन पथ विस्तृत न हो जायेगा। कवि दीपावली से यही प्रार्थना करते हैं कि –

“आभा के धब्बों से भर

भू अधियाली का अंचल,

हँसती किरणों की दीपा

जन पथ में बरसा मंगल |”

होली –

इस त्यौहार के साथ प्रहलाद की कथा जुड़ी हुई है। दैत्यराज हिरण्यकश्यपु के प्रहलाद नामक पुत्र था जो प्रभु भक्ति में निमग्न रहता था। हिरण्यकश्यपु ने अपने राज्य में प्रभु भक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया था। पर प्रहलाद पर पिता के प्रतिबंध का कोई असर न था। उसे मारने के लिए हिरण्यकश्यपु ने कई प्रयत्न किए पर सभी बेकार साबित हुए। अंत में राजा ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रहलाद को जलाने की कोशिश की पर इस प्रयत्न में स्वयं होलिका जल गई और प्रहलाद बच गया | होलिका के जलने के बाद प्रति वर्ष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होलिका उत्सव मनाया जाता है।

होली का महत्त्व सारे हिन्दुस्तान में है। लोग बड़े उत्साह से इस पर्व को मनाते हैं। यह त्यौहार फाल्गुन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस रात युवा वर्ग गाँव में से गोबर के कण्डे चुराकर ईंघन का ढेर करते हैं और शुभ मुहूर्त में इसे जलाते हैं। दूसरे दिन सुबह लोग होली खेलना शुरू करते हैं। दोपहर तक सभी एक दूसरे को अबीर, गुलाल, रंग व गोबर से रंगते हैं। यह ऐसा पर्व है जिसमें सभी लोग ऊँच नीच का भेद भूलकर एक दूसरे से समान स्तर पर मिलते हैं और रंग छिड़कते हैं।

पंत जी के काव्यों मे भी होली के रंग जगह जगह बिखरे पाये जाते हैं। वे स्वयं होली खेलना भी पसन्द करते थे। वे जब भी ऐसे अवसर पर कालाकॉकर में रहते थे तब गाँव वालों के साथ मस्त होकर आनंद मनाते थे। कविश्री ने होली का वर्णन कालाकॉकर के सानिध्य में ही किया है। फाल्गुन के इस उत्सव का स्वागत करते हुए कवि लिखते हैं –

“फाल्गुन में फूले वन के अंग, डाल पात में छाये नव रंग,

मन की चूनर रंगले, सजनी, होली खेलेगी साजन संग ।

मधु का गन्ध संदेसा पाकर लौटे बिछड़े भ्रमर छोड़ डर,

अलि निर्मोही श्याम न आये, किसको भेंदूँ फूल बाँह भर |”

होली का उत्सव रंग, दौड़ धूप, मारपीट, बकवाद और गाली-गलौज का उत्सव है| इस उत्सव का मजा ग्रामीण लोग अधिक उठाते हैं। और पंत जी ने उन्हीं लोगों की ओर ध्यान देकर उक्त त्योहार का शब्दांकन किया है। उन लोगों की मस्ती को देख कवि के मुख से अनायास निकल पड़ता है ‘मदमस्त रजक होली का दिन” कवि उनके शोरगुल और मारपीट को देख हैरान तो हैं ही पर उन्हें लगता है इस त्यौहार का रंग तो उन्हीं लोगों में दिखाई देता है।

“शोर, हँसी, हुल्लड़, हुड़दंग

धमक रहा धग्डाॉँग मृदंग

मार पीट बकवास झड़प में

रंग दिखाती महुआ, भंग

यह चमार चौदस का ढंग |”?

कवि का मानना है कि यह त्यौहार मन की कसक और कुढ़न मिटाकर कुछ समय के लिए मन बहलाने का आधार है। जहाँ दुःख, सुख, अभाव, कुण्ठा आदि को भूलकर मन के किसी काने में छिपी अज्ञात इच्छाओं को उभरने का मौका मिलता है। उर की अतृप्त कामनाएँ अपने पर फैलाकर कुछ समय के लिए अलसा लेती है।

“उर की अतृप्त वासना उभर

इस ढोल मँजीरे के स्वर पर

नाचती, गान के फैला पर,

प्रिय जन गण को उत्सव अवसर |”!

कवि मानते हैं कि होली का त्यौहार मानव मानव के बीच का अन्तर मिटाने का, प्रीति बढ़ाने का उत्सव है। इस अनोखे अवसर पर सभी, अपने स्नेह रंग से एक दूसरे को रंग दें तो जीवन सुन्दरता के रंगों से रंजित हो जाए। कवि इस त्यौहार पर यही शुभ कामना रखते हैं।

“रंगों प्रीति से घृणा द्वेष रण,

नव प्रतीति से कटुता के क्षण,

जीवन सुन्दरता के रंग से

श्री पंकिल हो भू का प्रांगण |”?

अस्तु पंत जी ने अपने काव्यों में होली के रंगों का, उसके महत्त्व का एवं उत्सव मनाने के ढंग का सुन्दर वर्णन प्रस्तुत किया है। ‘कहारो का रुद्र नृत्य’, “चमारों का नाच’, ‘धोबियों का नृत्य” आदि काव्यों में होली का उत्सव मनाने की परम्परा को अनुपम शब्दों की लड़ियों से गुंफित किया है। यही तो पंत जी की विशेषता है।

मकर संक्रान्ति –

मकर संक्रान्ति के दिन से रातें छोटी होने लगती हैं और दिन लम्बे होते जाते हैं। पुष्य माह के कृष्ण पक्ष के अन्त में उत्तरायण का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य मकर राशि में से कर्क राशि की ओर प्रयाण करता है। याने कि सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर आने लगता है। इसलिए इस त्यौहार को उत्तरायण भी कहते हैं।

कालाकॉकर के निवास स्थान दरम्यान पंत जी ने इन उत्सवों और त्योहारों का जी भर कर आनंद लूटा है। और अगर वे किसी वजह से उस उत्सव में शरीक न हो सके तो अपने निवास स्थान “नक्षत्र” की खिड़की से आँक कर लोगों की प्रतिक्रियाएँ देखने का अवसर न चूके | गंगा नहान के अवसर पर भारी भीड़ को चीटियों की पंक्तियों की तरह रेंगते देखकर उललासित कवि मन गा उठता था –

“जन पर्व मकर संक्रान्ति आज

उमड़ा नहान को जन समाज

गंगा तट पर सब छोड़ काज |”?

पंत जी ने मकर संक्रान्ति को “जन पर्वव कहकर उसकी सही अर्थ में व्याख्या की है | कवि को लगता है कि ऐसे पर्व जीवन की उदासीनता को कुछ क्षण के लिए भी स्पन्दित कर पाते हैं। जीवन के अंधकार में भटके हुए लोगों के दिलों में ये ही पर्व कुछ आलोक फैलाते हैं। इसलिए कवि को भी ये पर्व प्रिय लगते हैं –

“ये छोटी बस्ती में कुछ क्षण,

भर गये आज जीवन स्पंदन-

प्रिय लगता जनगण सम्मेलन |”*

वसंतोत्सव –

माघ शुक्ल पंचती से वसंत ऋतु का प्रारंभ होता है। यह दिन शुभ कार्यों के लिए अच्छा माना जाता है। इसे वसंत पंचमी कहते हैं। कवि पंत ने अपने काव्यों में वसंत ऋतु एवं वसंतोत्सव का वर्णन कई जगह प्रस्तुत किया है।

वसंत तो ऋतुओं का राजा कहलाता है जिसका प्रभाव प्रायः: सभी कवियों पर रहता ही है। पंत जी वैसे कवि तो प्रकृति के ही गायक रहे हैं। इसलिए उनके काव्यों में वसंतोत्सव का वर्णन होना स्वाभाविक ही है।

“वासन्ती सौन्दर्य पर्व में कवि

नव रस मूल्यों को करता वितरित,

जीवन शोभा विकसित प्रांगण को

राग-चेतना से कर सित सुरभित |”

कवि मानते हैं कि ये नस्-नारी ‘लोक-नृत्य गीतों का* उत्सव रच कर जन संस्कृति में नव स्वर भरते हैं। कवि स्वयं ऋतुपति के स्वागत की तैयारियाँ करने में जुट जाते हैं-

“आओ, कोकिल बन आओ

ऋतुपति का गौरव गाओ

प्रेयसि कविते। हे निरूपमिते |”

शरदोत्सव –

शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्र अपनी पूर्ण कलाओं के साथ-साथ अवतरित होता है। एक ऐसी मान्यता है कि इस रात में चन्द्र से अमृत वर्षा होती है। इसलिए इस रात्रि को सभी उत्साह से मनाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। शरदोत्सव को मनाने के लिए प्रेरित करते हुए कवि लिखते हैं –

“आओ हे हँसमुख फूलों, हिल मिलकर हम सब गाये

शरद चेतना के आँगन में उत्सव मधुर मनायें।

रंग पंखुड़ियों के पर फैला अम्बर में उड़ जावें,

रजत सुरभि के अलक जाल में मारुत को उलझावें।”7

गणपति उत्सव –

गणपति याने समूह का नेता, जूथ का पति जो समूह का सर्वस्व है, विघ्नहर्ता और रिद्धि, सिद्धि दाता है। भाद्र-शुक्ल चतुर्थी को यह उत्सव मनाया जाता है। इस अवसर पर गणपति की मूर्ति पूजा होती है।

मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का महोत्सव –

भारतीय संस्कृति में धर्म का सर्वोपरि स्थान रहा है। मंदिरों में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा, देवी देवताओं की विशेष दिनों में पूजा अर्चना, भजन कीर्तन और उनसे सम्बन्धित अनेक उत्सवों का आयोजन भारतीय संस्कृति को जीवित रखने में सहायक रहे हैं।

 राष्ट्रीय त्यौहार –

पंत जी के काब्यों में राष्ट्रीय भावना फूट-फूट कर भरी हुई है | पंत जी तो स्वयं राष्ट्रीय आन्दोलनों में हिस्सेदार रहे और महात्मा जी से प्रेरित हो कॉलेज छोड़ असहयोग आन्दोलन में शामिल हुए थे। ऐसे राष्ट्र प्रेमी कवि के कलम से राष्ट्र गान की धारा टपके तो कोई आश्चर्य नहीं।

संदर्भ :

  1. पंत ग्रन्थावली, भाग-2, स्वर्णधूलि, मानसी, ले. पंत, पृष्ठ 344
  2. वही, भाग-2 ग्राम्या-संस्कृति का प्रश्न, ले. पंत, पृष्ठ 69
  3. वही, भाग-6, भारतीय संस्कृति क्‍या है?, ले. पंत, पृष्ठ 429
  4. वही, भाग-3, उत्तरा-प्रस्तावना, ले. पंत, पृष्ठ 6
  5. वही, भाग-2, युगवाणी नव संस्कृति, ले. पंत, पृष्ठ 83
  6. वही, भाग-3, उत्तरा-प्रस्तावना, ले. पंत, पृष्ठ 6
  7. पंत ग्रन्थावली, भाग-3, शिल्पी, ले. पंत, पृष्ठ 224
  8. वही, पृष्ठ 224
  9. आत्मकथा (संक्षिप्त), ले. गांधीजी, पृष्ठ 6
  10. वही, पृष्ठ 6
  11. वही, पृश्ड 54
  12. गांधी साहित्य, 40 गांधी विचास-रत्न, ले. गांधीजी, पृष्ठ 59
  13. वही, पृष्ठ 56
  14. वही, पृष्ठ 64
  15. वही, पृष्ठ 62
  16. वही, पृष्ठ 62
  17. वही, पृष्ठ 67

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