सुमित्रानन्दन पंत जी के काव्य का क्रमिक विकास-डाॅ. मुकेश कुमार

विकास सृष्टि का शाश्वत नियम है। प्रकृति और मानव दोनों ही परिवर्तनशील प्रकृति से प्रभावित होकर विकास की ओर अग्रसर होते हैं। गैटे ने कहा है कि “प्रकृति अपनी उन्‍नति और विकास में रुकना नहीं जानती और अपना अभिशाप प्रत्येक अकर्मण्यता पर लगाती है।

(Nature know no cause in progress and development and attaches her curse in all in action)समय की ललकार मानव को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहती है।

पंत जी की विकासशील प्रवृत्ति-पन्‍जी के काव्य में उनकी परिवर्तनशील विचारधारा के दर्शन होते हैं। आप ने आरम्भ में छायावादी कविता का खड़ी बोली से काव्य श्रृंगार किया। इस कविता के द्वारा उन्होंने इतिवृत्तात्मकता में प्राण भरे, उसे अनुभूति दी, तीव्रता और गहनता प्रदान की, कल्पना के पंखों पर उड़ना सिखाया, प्रकृति उनके काव्य की चिन्तन वस्तु बन गई। वे उसके बाहुपाश में आबद्ध होकर आत्म-विभोर हो उठे और किसी भी प्रकार से उससे सम्बन्ध तोड़ने को तैयार थे। उनकी हर्ष विभोर वाणी पुकार उठी-

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,

तोड़ प्रकृति से भी माया।

बाले! तेरे बाल जाल में,

कैसे उलझा दूँ मैं लोचन!

भूल अभी से इस जग को।

यही कवि समय की पुकार के अनुसार परिस्थितियों से प्रभावित होकर मानव प्रकृति के अनुसार प्रकृति के रूप की अवहेलना करके मानव सौंदर्य की ओर आकर्षित होता दिखाई दिया। प्रकृति के स्थान पर उसे मानव श्रेष्ठ प्रतीत होने लगा-

सुन्दर है विहंग सुमन सुन्दर,

मानव तुम सबसे सुन्दरतम |

 गुंजन’ में उसने स्पष्ट रूप से मानव को अपने गीतों का सर्वस्थ बनाया-

तुम मेरे मन के मानव।

मेरे गानों के जाने।

मेरे मानस स्पन्दन,

प्राणों के चिर पहचाने |कवि ने मानव की महत्ता के साथ उसके जीवन की विविध समस्याओं को अंकित किया है। इस प्रकार प्रकृति का अनन्य आराधक प्रगतिवाद का शंख फूंकता हुआ ग्रामीण-जीवन और श्रम-जीवियों के आँसुओं की व्यथा को अपने काव्य में संजोने लगा | इसके उपरान्त कवि मानवीय जीवन की समस्याओं का माधान खोजने के लिए अरविन्द दर्शन से प्रभावित होकर काव्य रचना में निरन्तर संलग्न है। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि यह पन्‍की विकासशील प्रवृत्ति है।

पंत जी के काव्य का क्रमिक विकास-

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि पंत जी एक विकासशील क्रांतिकारी कवि हैं। विकासक्रम की दृष्टि से उनके काव्य को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) छायावादी युग (1918 से 1934)

(2) प्रगतिवादी युग (1934 से 1946)

(3) आध्यात्मिक या अरविन्द युग (1946 से आज तक)

यहाँ पर पंत जी के काव्य में जो तीन युगों का उल्लेख किया गया है, इसका अभिप्राय यह नहीं कि कवि का काव्य इन तीनों सीमाओं में कठोरता से बंधा हुआ है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पहले कवि की छायावादी दृष्टि अधिक रही, फिर प्रगतिवादी और अन्त में अरविन्दवादी| किसी भी कवि के काव्य को कतिपय निश्चित सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है। यहाँ हमारा इतना ही अभिप्राय है कि पंत जी के काव्य में आरम्भ में छायावादी प्रकृति विशेष रही, फिर प्रगतिवाद की प्रबलता रही है और बाद में अरविन्दवाद का प्राचुर्य |

छायावादी युग

छायावाद के युग में परम्परा से आई हुई तथा स्थूल प्रकृति के वर्णन के प्रति उत्क्रांति की आग सुलगी, जिसकी नैसर्गिक लपटों में स्थूल में स्थूल भस्मीभूत हो गया और सूक्ष्म दिव्य ज्योति की भाँति प्रस्फुटित हुआ। इस दिव्य लोक में प्रकृति का अन्तः स्थल स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा। जैसा कि पंत ने स्वयं लिखा है, “जब मैंने पहले लिखना आरम्भ किया था, तब मेरे चारों ओर केवल प्राकृतिक परिस्थितियाँ तथा प्राकृतिक सौन्दर्य का वातावरण ही ऐसी सजीव वस्तु थे, जिससे मुझे प्रेरणा मिलती थी। मेरी प्रारम्भिक रचनाएँ “वीणा नामक संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई। इन रचनाओं में प्रकृति ही अनेक रूप धारण कर चपल, मुखर, नुपूर बजाती हुई अपने चरण चढ़ाती रही है। समस्त काव्य में प्राकृतिक सुन्दरता के धूप-छाँह से बने हुए चित्र हैं। पंत जी की छायावादी प्रकृति, वीणा, ग्रन्थि, पललव और गुंजन काव्य कृतियों में उपलब्ध होता है। इन रचनाओं में कवि का प्रकृति के प्रति भारी आकर्षण रहा है। वह अपनी नैतिक भावनाओं की अनुभूति भी प्रकृति के आँचल में देखता है। उसकी आत्मा का प्रकृति से अटूट सम्बन्ध है। अपने आत्मीय भावों की ओर संकेत करते हुए कवि कहता है-

हाय! मेरे सामने ही प्रणय का,

ग्रन्थ बन्धन हो गया वह नव कुसुम |

मधघुप सा मेरा हृदय लेकर किसी,

अन्य मानस का विभूषण हो गया।। अपने छायावादी युग की कविता में प्रकृति के उपरान्त कवि नारी सौन्दर्य की ओर आकर्षित होता है। यही भावना वाणी में प्रस्फुटित होकर बहने लगती है-

स्नेहमयी सुन्दरतामयि

तुम्हारे रोम-रोम से नारि

मुझे है स्नेह अपार।

इस प्रकार कवि ने प्रकृति से ऐसे मुख मोड़ा कि प्रकृति के समस्त गुण ऐसे जाने पड़ने लगे, जैसे उसने मनुष्य से उधार लिया है-

सीखा तुमसे फूलों ने,

मुख देख मन्द मुस्काना।

तारों ने सजल नयन हो,

करूणा किरणें बरसाना |

पंत जी की छायावादी कृति पल्‍लव और गुंजन में रहस्यवादी भावना के भी दर्शन होते हैं-

देख वसुधा का यौवन भार

गूँज उठता है वह मधुमास।

विधुर उर के मृदु उद्गार

कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छवास |

जाने सौरभ के मिस कौन

संदेश मुझे भेजता मौन |”

प्रगतिवादी युग

शैने: शनैः कवि के हृदय के ऊपर सांसारिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। अपने चारों ओर होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न को देखकर उसका हृदय अपने युग के आदर्शों के प्रति विश्वास खो बैठा। वह बुद्धि के पास दौड़ा हुआ गया। फिर भी निराशवादी नहीं बना। बाह्य निश्चेष्टाओं और सूनेपन के कारणों को बुद्धि से सुलझाने का उसने प्रयत्न किया। फलस्वरूप उसकी रचनाएँ भावात्मक रहकर बौद्धिक हो गयी। “ज्योत्सना’ में भावना और बुद्धि का समन्वय मिलता है तो ‘युगान्त’ से ‘ग्राम्या’ तक बुद्धि ही बुद्धि के दर्शन होते हैं। इस युग में कवि मानव का अनन्य उपासक बन गया। कविवर पंत की ‘युगान्त’ कृति एक युग के अन्त और दूसरे के जन्म को संकेत देती है। प्रकृति का अनन्य आराघक कवि मानव के वैभव, सौंदर्य और बुद्धि-कौशल के गीत गाने लगा। उसे मानव सम्पूर्ण गुणों से सुसज्जित दिखाई देने लगा-

पृथ्वी की प्रिय तारावलि

जग के वसनन्‍्त के वैभव।

तुम सहज सिकक्‍सुन्दर हो,

चिर आदि और चिर अभिनव |”

कविवर पंत का हृदय मानव के उत्पीड़न और उनके दैन्य भरे रूप को देखकर कराह उठा| वह आकाशी कोमल कल्पनाओं का आंचल छोड़कर पृथ्वी पर गया, उसने अपने प्रगतिवादी काव्य में श्रमिक, किसान और निर्धन व्यक्तियों का चित्रण किया। पूँजीपतियों के शोषण से उत्पीड़ित श्रमिक-जीवन का एक चित्र देखिए-

वे नृशंस है, वे जन के श्रम बल से शोषित,

दुहरे धनी जोंक जंग के, भू जिनसे घोषित |

दर्पी, हठी निरंकुश, निर्मम कलुषित कुत्सित,

गत संस्कृति के गरल लोक जीवन जिसने मृत |”

इसी प्रकार कवि ने निर्धन वर्ग के प्रति सहानुभूति प्रकट की है।

कवि पूँजीवादी एवं सामन्ती मान्यताओं, रूढ़ियों और परम्पराओं को संसार से समाप्त करके नए विचार, नए भाव, नया जीवन और नई संस्कृति का स्वागत करते हुए घोषणा करता है-

द्रत झरो जगत के जीण पत्र,

दे स्त्रस्त-ध्वस्त! हे शुष्क शीर्ण |

हिम-ताप-पीत, मधुवात भीत,

तुम बीत-राग, जड़ पुराचीन |”

कवि ने मानव जीवन की विविध समस्याओं का समाधान करने के लिए गांधीवाद का सहारा लिया है। मार्क्सवाद द्वारा कवि भारतीय समाज में आर्थिक दृष्टि से फैली असमानता को दूर करने का वर्णन करता है, क्योंकि यह वाद इसी विश्वास पर टिका है। मानव समाज रूप में अपनी आवश्यकतानुसार धन का उपयोग कर सकता है। पंत जी की कविता में क्रांति का जो स्वर दिखाई पड़ता है, वह मार्क्सवाद का ही प्रभाव है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मार्क्सवाद की प्रशंसा की है-

धन्य मार्क्स! चिर तमच्छन्‍पृथ्वी के उदय शिखर,

तुम त्रिनेत्र के ज्ञान चक्षु से प्रकट हुऐ प्रलयंकर |”

उन्होंने साम्यवाद को आरम्भ का स्वर्ण युग बताया है। कवि गांधीवाद विचारों से प्रभावित हुआ है।

आध्यात्मिक या अरविन्दवादी युग

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात्‌ कुछ तो परिस्थितियों के वात्याचक्र के  परिणामस्वरूप और कुछ अरविन्द से व्यक्तिगत परिचय होने के कारण पन्‍्त जी पर अरविन्द दर्शन का प्रभाव पड़ा और वे संसार के कल्याण के लिए मार्क्सवादी भौतिक उन्‍नति के स्थान पर सांस्कृतिक संचारण के आन्दोलन को अनिवार्य समझने लगे। उन्हें दृढ़ निश्चय हो गया है कि आर्थिक और राजनैतिक क्रांति महान लक्ष्य के लिए केवल सोपान ही हो सकती है, अन्तिम लक्ष्य नहीं |” इस प्रकार प्रगतिवादी पंत अध्यात्मवाद की ओर अग्रसर हुए। उन्होंने अरविन्द के विषय में लिखा है-

श्री अरविन्द को मैं इस युग की अत्यन्त महान्‌ तथा अतुलनीय विभूति मानता हूँ। उनके जीवन दर्शन से मुझे पूर्ण सन्तोष प्राप्त हुआ है।पंत जी आज अरविन्द-दर्शन द्वारा ही समस्त समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं। आज कवि की आस्था भौतिकवाद से हटकर अध्यात्मवाद में अपना सर्वस्व खोज रही है। इसलिए कवि का दर्शन मानव-जीवन के आत्मिक विकास के लिए व्यग्र है-

मानव का आदर्श चाहिए संस्कृति आत्मोकर्ष चाहिए |

बाह्य विधान उसे है बन्धन, यदि साम्य अन्तरमय |

कवि अरविन्द दर्शन की सहायता से भौतिकवादी मानवता में एक नवीन दृष्टिकोण को जन्म देने की बात स्पष्ट रूप से कहता है-“मैंने भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों दर्शनों के जीवनोपयोगी तत्त्वों को लेकर जड़-चेतन सम्बन्धी एकांकी दृष्टिकोण का परित्याग कर व्यापक सक्रिया सामंजस्य के धरातल पर नवीन लोकजीवन में भरे मनुष्यतत्त्व और मानवता का निर्माण करने का प्रयत्न किया है। जो इस युग की सर्वोपरि समस्या है।

आज पंत जी का काव्य नारी, प्रकृति, मानवतावाद तथा अन्तः चेतनावाद से प्रभावित है। उसमें अरविन्द-दर्शन की प्रमुख भावना स्पष्ट लक्षित होती है। स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, उत्तरा, अमिता, वाणी, रश्मिबन्ध, चिदम्बरा, लोकायतन आदि कृतियों में अध्यात्मवाद या अरविन्दवाद की पावन भावना स्पष्ट लक्षित होती है। इस प्रकार पंत जी तो छायावादी है, ही प्रगतिवादी है। आज उनका काव्य अरविन्द-दर्शन से आप्लावित होकर अध्यात्मवाद की ओर उन्मुख है।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि पंत जी एक विकासशील कवि है। उनके काव्य ने समय के अनुरूप अपने स्वरूप को बदला है। आरम्भ में उनमें छायावाद का स्वर प्रखर हुआ, फिर प्रगतिवाद की ओर आज अध्यात्मवाद का गम्भीर स्वर झंकृत हो रहा है।

संदर्भ-

  1. आचार्य दुर्गाशंकर मिश्र, रश्मिबंध और सुमित्रानन्दन पंत, “वीणा, पृष्ठ 5
  2. वही, पृष्ठ 43
  3. वही, पृष्ठ 46
  4. वही, पृष्ठ 24
  5. वही, पृष्ठ 30
  6. वही, पृष्ठ 39
  7. विश्म्भर मानव और सुमित्रानन्दन पंत, पृष्ठ 52
  8. वही, पृष्ठ 64
  9. वही, पृष्ठ 33
  10. वही, पृष्ठ 84

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *