हिन्दी साहित्य के विकास में धर्मनगरी काशी का योगदान -डॉ0 मुकेश कुमार

हिन्दी साहित्य के विकास में धर्म नगरी काशी का महत्वपूर्ण योगदान है। इसी प्रकार से हिन्दी जगत्‌ में लम्बी कतार काशी के साहित्यकारों की हैं। आदिकालीन कवि दामोदर पंडित से लेकर संत कबीर, रैदास, गोस्वामी तुलसीदास, भारतेन्दु मण्डल, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, लाला भगवानदीन, बाबू श्यामसुंदरदास, प्रेमचंद, प्रसाद, डॉ0 बच्चन सिंह, डॉ0 शंभुनाथ सिंह आदि ने काशी में रहकर हिन्दी साहित्य को गौरव प्रदान किया।

 “आचार्य रामानंद ने भी यहाँ डेरा डाला। उन्होंने अपने शिष्यों को भक्ति का उपदेश दिया। तमिल भक्त यहाँ की भाषा के अतिरिक्त संस्कृत को भी अपनाए थे। आचार्य रामानंद के अधिकांश शिष्य भाषा वाले हैं। उन्होंने स्वयं की भाषा (हिन्दी) में रचना की थी। रामानंदी लोग प्रेम को महत्त्व तो देते हैं। रामानन्द के शिष्यों में कबीर, रैदास जैसों ने संस्कृत को बिल्कुल छोड़ दिया। किन्तु गोस्वामी तुलसीदास ने संस्कृत नहीं छोड़ी। हिन्दी के रचनाकार भी वे संस्कृत से जुड़े हैं। शायद इसी से तुलसी संस्कृत वालों में भी प्रतिष्ठित हैं। तुलसीदास बीच-बीच में संस्कृत का भी प्रयोग करते हैं।”’

दामोदर पंडित जी ने ‘तक्ति व्यक्ति प्रकरण” गद्य की रचना की प्राकृत पैगलम्‌ इन्हीं के द्वारा रचित एक काव्य ग्रन्थ है जो कि काशी के राजकुमारों को बाजार की भाषा सिखलाने के लिए रची गयी थीं काशिकेय के मतानुसार काशीश्वर रानी की प्रशंसा इसी काव्य का अंश है। संत कबीरदास का प्रादुर्भाव एक घटना है। संवत्‌ 1456 (1398) में काशी में जन्मे स्वामी रामानंद के शिष्य कबीरदास ब्राह्मण विधवा कन्या के पुत्र थे। जिनका पालन-पोषण नीरू—नीमा नामक जुलाह ने किया बौद्ध सिद्ध जाति-पाति के विरोध और बाह्याडंबर की मुखालिफत का रास्ता बना चुके थे। बौद्ध-सिद्धों के दोहा कोशों और चर्यागीतियों, कबीर की साखियों और पदों में अनेक समानताएँ मिलती हैं- जाति-पांति का वैसा ही आक्रोश विरोध, बाह्याडंबर के प्रति वैसी ही फटकारें आदि का कबीर साहित्य में वर्णन मिलता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें वाणी का डिक्टेटर बताया व आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अनुसार इनकी भाषा पंचमेल खिचड़ी है। कबीर की रचना बीजक (सबद, साखी, रमैनी) का सम्पादन इनके शिष्य धर्मदास ने किया संवत्‌ (1576) 1448 में इनका देहांत हो गया।

संत रैदास का प्रादुर्भाव 1388 ई0 को काशी नगरी में हुआ। यह रामानंद के बारह शिष्यों में से थे। संत रैदास भी कबीर परम्परा के संत माने जाते हैं। एक ही नगर एक ही विचारधारा के होने के नाते दोनों के मिलने-जुलने की कल्पना की जा सकती है। संत रैदास जी लिखते हैं–

जाती ओछा पाती ओछा, ओछा जनमु हमारा।

रामरराज की सेवा कीन्‍न्हीं, कहि रविदास चमारा।

गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत्‌ 1554 ई0 में हुआ इनके गुरु नरहरिदास माने जाते हैं। सगुण काव्य में रामकाव्यधारा के प्रतिनिधित्व माने जाते हैं ‘रामचरितमानस’, वरवै रामायण, ‘रामललानहछ्‌’, ‘जानकी मंगल, पार्वती मंगल कृष्णागीतावली, विनय पत्रिका, कवितावली आदि रचनाओं का सृजन किया काशी में इनके बड़े स्नेही भक्त भदैनी के एक भूमिहार जमींदार टोडर थे। जिनकी मृत्यु पर इन्हों ने काफी दोहे लिखे। आचार्य गोस्वामी जी घर छोड़कर कुछ समय काशी में रहे और संवत्‌ 1680 में काशी में स्वर्गवास हो गया।

संवत्‌ सोरह से असी, असी गंग के तीर।

श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।”

गोकुलनाथ काशी के दरबारी कवि थे। इनकी रचनाएँ चेतसिंह, चन्द्रिका, राधाकृष्ण विलास, राधा नख-शिख आदि प्रमुख है। गिरिधरदास भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के पिता थे और ब्रजभाषा के बहुत ही प्रौढ़ कवि थे। इनका नाम तो बाबू गोपालचन्द्र था पर कविता में अपना उपनाम ये गिरिधरदास “गिरधर’ रखते थे। “इनका जन्म पौष कृष्ण 45 संवत्‌, 1890 में हुआ इनक पिता इन्हें ग्यारह वर्ष की अवस्था में ही छोड़कर परलोक सिधारे। भारतेन्दु जी ने इनके लिखे चालीस ग्रंथों का उल्लेख किया है। संवत्‌ 1947 ई0 में वे परलोवास हो गए।” आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ भारतेन्दु से होता है। इनका जन्म 1850 ई0 को काशी नगरी में हुआ था। भारतेन्दु सम्पन्न परिवार के थे। पारिवारिक सम्पन्नता के साथ उनमें बौद्धिक सम्पन्नता भी थी। उन्होंने हिन्दी गद्य को अनेक रूप दिए – निबंध, नाटक, इतिहास, आत्मकथा, उपन्यास, यात्रा-वर्णन आदि में ढाला। पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही भारतेन्दु ने साहित्य सेवा प्रारम्भ कर दी। अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने ‘कविवचन सुधा’ नामक पत्रिका निकाली जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएँ छपती थी। वे बीस वर्ष की अवस्था में- ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने “कविवचन सुधा” 1868 ई0 ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन” 1873 और 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए ‘बाल बोधिनी’ नामक पत्रिकाएँ निकाली। साथ में उनके सामान्तर साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी की। भारतेन्दु जी ने सामाजिक व राष्ट्रीय प्रेम को आधार बनाकर अपनी रचनाओं का सृजन किया। वे भारत के प्राचीन गौरव कीझांकी इन पंक्तियों के माध्यम से करते हैं। वे कहते हैं-

“भारत के भुज बल इच्छित,

भारत विद्या लहि जग सिच्छित

भारत तेज जगत विस्तारा

भारत भय कंपिथ संसारा।।”*

मातृभाषा की सेवा में उन्होंने अपना जीवन ही नहीं, सम्पूर्ण धन भी अर्पित कर दिया। हिन्दी भाषा की उन्नति उनका मूलमंत्र था-

“निज भाषा उन्नति लहै, सब उन्नति को झूठा।

बिना निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से ले करहू, भाषा माहि प्रचार।।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवनकाल में ही कवियों और लेखकों का एक जन मण्डल चारों ओर तैयार हो गया था। हिन्दी साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु मण्डल के नाम से जाना जाता है। इन सभी ने भारतेन्दु के नेतृत्व में हिन्दी गद्य की सभी विधाओं में अपना योगदान दिया ये लोग भारतेन्दु की मृत्यु के बाद भी लम्बे समय तक साहित्य साधना करते रहे। भारतेन्दु मण्डल में बालकृष्ण भट्ट, बदरी नारायण उपाध्याय चौधरी ‘प्रेमघन”, प्रताप नारायण मिश्र, ठाकुर जगमोहन सिंह, अम्बिकादत्त व्यास, राधाचरण गोस्वामी ।

 “भारतेन्दु मण्डल ने पत्रकारिता का आरम्भ किया। स्वयं भारतेन्दु ने पत्र निकाले। इसी मंडली ने मौलिक लेखक के साथ ही अनुवाद का भी सहारा लिया। भारतेन्दु ने संस्कृत और बंगला से कई ग्रथों का अनुवाद किया। भट्ट जी, मिश्र जी एवं “प्रेमघन ने कई निबन्ध लिखे।

भारतेन्दु ने न केवल लिखा बल्कि यात्राएं की। यात्रा की ऊर्जा से भीसाहित्य उर्जस्वित किया। नाटक लिखे नाटक को रंगमंच पर उतारतेसमय स्वयं मंच के भाग बन गए। भारतेन्दु हिन्दी के गहरे समर्थक थे। जबकि उनके समकालीन शिव प्रसाद सितारे हिन्द, हिन्दी-उर्दू’ के समर्थक थे।””

दीनदयाल गिरि का जन्म 1802 ई0 को काशी में हुआ। दीनदयाल गिरि का निवास स्थान विनायका देव के पास था। जिसके प्रमाण के लिए स्वयम्‌ इनका दोहा प्रचलित है।

सुखद देहली पै जहाँ, बसत विनायक देव।

पश्चिम द्वार उदार है, कासी को सुर सेव |”

अनुराग बाग, वैराग्य दिनेश, अन्योक्ति कल्पद्रुम तथा अन्योक्ति माला नामक ग्रंथ का उल्लेख किया।

राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिन्द” का जन्म सन्‌ 1832 ई0 को वाराणसी में हुआ। सन्‌ 1845 ई0 में “बनारस अखबार’ निकाला। मानव धर्मसार वामा मनरंजन, विद्यांकर, राजा भोज का सपना, बैताल पचीसी जैसी पुस्तकों में उर्दू मिश्रित हिन्दी को प्रश्नय दिया।

देवकीनंदन खत्री का कर्मस्थल भी काशी में ही रहा। सन्‌ 1880 में प्रकाशित “चन्द्रकांता’ सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति रही। लाखों लोगों ने इन रचनाओं के माध्यम से हिन्दी सीखी। इन्होंने काशी नगरी में रहकर ही हिन्दी का विकास किया।

बाबू राधा कृष्णयास जी का जन्म 1865 ई0 को वाराणसी में हुआ। ये भारतेन्दु के फूफेरे भाई थे। भारतेन्दु जी की इन पर विशेष कृपा होने के कारण हिन्दी सेवा में अग्रसर हुए। ‘रहिमन विलास’ “निस्सहाय हिन्दू”, “महारानी पद्मावती’ प्रताप नाटक आदि रचनाओं का सृजन किया। नागरी प्रचारिणी सभा स्थापना के प्रमुख सहयोगी तथा उसके अध्यक्ष तथा 1906 में “नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के सम्पादक भी रहे।

“काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हिन्दी सेवा के लिए की गई । विद्या से विनम्र सत्कर्म जब राष्ट्रीय हित में लगन और निष्ठा के साथ संबद्ध हो जाते हैं, तो प्रकृति ऐसे कर्मवीर का मार्ग स्वयं प्रशस्त करने लगती है न्याय पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा। ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य हमारे कर्मकोटि है, जबकि अर्थ, काम, मोक्ष हमारालक्ष्य है। धर्मग्रन्थ प्रेरणा स्रोत है तथा धर्मचरित हमारे पूर्वज प्रेरक हैं। ऐसी मनः स्थिति में लक्ष्य स्वयं सिद्ध होने लगते हैं। देव शक्तियाँ स्वयं सहायता करने को उत्तेजित हो जाती हैं। तत्र देवों सहायक सभा की स्थापन की। कल्पना-परिकल्पना एक समीचीन दृष्टि उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में करना ऐतिहासिक कृत होगी। क्वींस कॉलेज के उत्साही छात्र सर्वश्री गोपाल प्रसाद खत्री, रामसूरत मिश्र, उमराव सिंह, शिवकुमार सिंह तथा रामनारायण मिश्र कार्यकर्ताओं ने 12 मार्च 1893 ई0 में नागरी प्रचार के उद्देश्य से एक सभा की स्थापना की जिसका नाम नागरी प्रचारिणी सभा रखा गया। इन छात्रों की यह स्थापना उनके छात्रवास की परिधि तक ही सीमित नहीं रही; किन्तु वहाँ से संचालित सभा की लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती रही इसी प्रकार से श्री जीवनदास जैसे महान सेवक ने अपने निवास के एक कमर में सभा की स्थापना और संचालन की स्वीकृति दी और पुनः 9 जुलाई 1893 ई0 को नागरी की स्थापना में अनेक सदस्य जुड़े जिसमें प्रमुख बाबू श्यामसुंदरदास जी थे। इसी प्रकार से 16 जुलाई 1893 ई0 को सभा का स्थापना दिवस माना जाये यह निर्णय लिया गया। पंडित मदन मोहन मालवीय, बाबू श्यामसुंदर दास जैसों ने न्‍्यायलयों में नागरी लिपि के प्रयोग हेतु 70 हजार हिन्दी प्रेमियोंके हस्ताक्षर करवाकर वह अपने तत्कालीन प्रभाव से अंग्रेजी हुकूमत को दिये।

“नागरी प्रचारिणी सभा में पुस्तकालय भण्डार है जिसमें देश भर से प्रकाशित पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएँ आने लगी। तमाम साहित्य ने अपनी पुस्तकों का भंडार नागरी प्रचारिणी सभा को दे दिया। वर्तमान में सभा महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ, हस्तलिखित ग्रंथ अति प्राचीन पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों आदि का सीडेक्स नोएडा द्वारा स्केनिंग कराकर संरक्षित कर लिया। विश्व स्तर की इसी ‘नागरी शोध पत्रिका’ के संपादक अधिकतर विद्वान ही रहे। वर्तमान में इसके संपादक व प्रधानमंत्री डॉ0 पद्माकर पाण्डे डी0/लिट0 है। यह पत्रिका प्रतिमाह सभी विषयों के अनुसार प्रकाशित होती है। डॉ0 पद्माकर पाण्डे लिखते हैं- “सभा से हिन्दी का सबसे प्रामाणिक कोश व्याकरण, हिन्दी साहित्य का इतिहास, हिन्दी विश्वकोष आदि ग्रथ प्रकाशित है। चंदबरदायी, सूरदास, तुलसीदास, जायसी, कबीरदास, रामचन्द्र शुक्ल आदि अनेक प्राचीन और नवीन लेखकों की ग्रथावलियाँ आदि ऐसे प्रकाशन जिनका पुनमुरद्रण असंभव है। प्रत्येक विश्वविद्यालयों तथा अन्य पुस्तकालयों आदि में इनकी प्रतियाँ रखना आवश्यक है। अब इनकी इनी-गिनी प्रतियाँ ही उपलब्ध हैं|”

 इसी प्रकार से काशी नागरी प्रचारिणी सभा आज भी हिन्दी साहित्य की सेवा में लगी हुई है और हिन्दी के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है।

लाला भगवानदीन का जन्म 1866 ई0 में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर के बरबट गाँव में हुआ। लेकिन इनकी साहित्यिक कर्मसिला काशी में रही। बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल इनके प्रमुख सहयोगी थे।

बाबू श्यामसुंदर दास का जन्म 1875 ई0 में काशी नगरी में हुआ। क्वींसकॉलेज के छात्र तथा 16 जुलाई 1893 को श्री रामनारायण मिश्र एवं ठाकुरशिवकुमार सिंह के सहयोग से नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने आपको 1922 ई0 में हिन्दी-विभाग खुलनेके पश्चात्‌ विभागाध्यक्ष बना दिया। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा मनोरंजन पुस्तक माला में विभिन्न पुस्तकों का प्रकाशन तथा सम्पादन किया। आप “सरस्वती पत्रिका’ के प्रथम सम्पादक रहे। आपका सन्‌ 1945 ई0 में देहांत होगया। हिन्दी समाज आपका हमेशा ऋणी रहेगा। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 ई0 को ग्राम अगोना बस्ती जिले में हुआ। आप निबन्धकार, आलोचक साहित्य के इतिहास के ज्ञाता थे। आप 1904 से 1908 तक पी0एल0जे0 इण्टर कॉलेज में ड्राइंग मास्टर के रूप में कार्यरत रहे। सन्‌ 1908 में ‘हिन्दी शब्द सागर’ के सम्पादक रहे। सन्‌ 1939–1944 तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष रहे। सन्‌ 1929 ई0 में हिन्दी शब्द सागर की भूमिका के रूप में ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ लिखा जो एक प्रामाणिक इतिहास है व हिन्दी साहित्य की रीढ़ की हड्डी का कार्य करता है। सन्‌ 1944 ई0 में आपका देहांत हो गया। इसी प्रकार से कहानी सम्राट मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र वर्मा, करूणापति त्रिपाठी, पं० सीता राम चतुर्वेदी, सम्पूर्णनंद आदि साहित्यकारों ने हिन्दी के विकास में अपने आपको समर्पित किया।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारत में सभी विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना सन्‌ 1946 ई0 बसंत पंचमी के दिन पं० मदन मोहन मालवीय जी द्वारा की गई थी। यह एक राष्ट्रीय महत्व प्राप्त संस्थान है। इसमें पं० अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जैसे महानायकों ने अवैतनिक हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्य करके हिन्दी की सेवा की। हिन्दी साहित्य के विकास को आगे बढ़ाया। काशी धर्मनगरी में महात्मा गांधी काशी विद्यापोठ भी है जो एक राज्य स्तर का विश्वविद्यालय है। इसी के साथ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय जो सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है। यह भी काशी में सुशोभित है।

“पं0 विद्यानिवास मिश्र मुख्यतः ललित निर्बंधकार थे| उनके कई ललित निबंध प्रतिष्ठित हुए। मिश्र जी बहुत दिनों बाद काशी आये। डॉ० शंभुनाथ सिंह अज्ञेय के सप्तकों में न आकर स्वयं नव गीत का आन्दोलन चलाया ।’”’

अतः सारांश रूप में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य के विकास में काशी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिन्दी जगत्‌ में उसे काशी नगरी की चाहे शिक्षा संस्थान हो, साहित्यकार या फिर वहाँ पर आये साहित्यकारों का कर्मस्थल इनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। दामोदर पंडित से लेकर डॉ0 शंभुनाथ सिंह आदि तक काफी लम्बी परम्परा काशी नगरी के साहित्यकारों की हिन्दी के विकास में रही है। काशी में बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, महामना मदन मोहन मालवीय जैसे हुए जिन्होंने हिन्दी के विकास में चमकता सूर्य उगा दिया। काशी नागरी प्रचारिणी सभा जो सब पुरानी हिन्दी सेवी संस्था है। इनका सबसे अधिक हिन्दी के विकास में योगदान है। लिखने को तो काफी विस्तृत है। परन्तु शब्द सीमा के नियम में बंधकर मुख्य-मुख्य वर्णन किया गया। इसी प्रकार से हिन्दी साहित्य के विकास में काशी का हिन्दी जगत्‌ हमेशा ऋणी रहेगा।

संदर्भ:-

  1. युगेश्वर, हिन्दी साहित्य के विकास में काशी का योग (आलेख) हिन्दी की विकास यात्रा, पृ0 222
  2. डॉ0 बच्चन सिंह, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, पृ0 93
  3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ0 407
  4. वही, पृ0 290
  5. सम्पा0 डॉ0 नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ0 454
  6. वही, पृ0 454
  7. हिन्दी की विकास यात्रा, हिन्दी सेवी संस्था (आलेख), युगेश्वर काशी का योगदान, पृ0 889
  8. इंटरनेट से प्राप्त
  9. डॉ०0 पद्माकर पाण्डे, नागरी प्रचारिणी सभा के सौ वर्ष (आलेख) हिन्दी की विकास यात्रा, पृ0 694
  10. वही, पृ0 692
  11. युगेश्वर, काशी का योग (आलेख) हिन्दी की विकास यात्रा, पृ0 224

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